मुझे इस बात का मुकम्मल तौर पर यक़ीन हो चुका है कि हिंदुओं के बीच रहते हुए; डिप्रेस्ड क्लासेज़ को बराबरी का दर्जा मिल ही नहीं सकता, क्योंकि हिंदू धर्म खड़ा ही असमानता की बुनियादी पर है।
'एक विभाजित' समूह हैं; जो उसी जाति व्यवस्था से संक्रमित हैं, जिसमें वे भी उतनी ही आस्था रखते हैं, जितनी सवर्ण हिंदू रखते हैं। अस्पृश्यों के बीच मौजूद जाति व्यवस्था ने परस्पर प्रतिद्वंद्विता और ईर्ष्या को जन्म दिया है और इसने साझा कार्यवाइयों को असंभव बना दिया है।'
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जाति के उन्मूलन की दृष्टि से देखें, तो संतों के संघर्ष से समाज पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है। मनुष्य का मूल्य स्वयंसिद्ध है, स्वतः स्पष्ट है—यह मूल्य उसे भक्ति के मार्ग पर चलकर नहीं मिलता।
हमारे आंदोलन का लक्ष्य है—अस्पृश्यों के लिए सामाजिक, आर्थिक एवं धार्मिक मुक्ति प्राप्त करना। जहाँ तक अस्पृश्यों का सवाल है, तो यह मुक्ति धर्मांतरण के अलावा और किसी ढंग से हासिल नहीं की जा सकती।
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जहाँ समानता का निषेध होता है, वहाँ बाक़ी सारी चीज़ों का भी निषेध स्वाभाविक है।
डिप्रेस्ड क्लासेज़ की समस्या तब तक हल नहीं हो सकती, जब तक कि राजनीतिक सत्ता इस तबक़े के लोगों के हाथों में नहीं आएगी। डिप्रेस्ड क्लासेज़ की समस्या; मेरे ख़याल में सबसे पहले एक राजनीतिक समस्या है, और उसे राजनीतिक समस्या के रूप में ही देखा जाना चाहिए।'
अस्पृश्यता के उन्मूलन और अंतर्जातीय भोज से ही हमारी सारी समस्याएँ ख़त्म नहीं होगी। न्यायालय, सेना, पुलिस और वाणिज्य जैसे तमाम सरकारी महकमों को हमारे लिए खोला जाना चाहिए। हमें हिंदू समाज को जातिवाद के उन्मूलन और समानता को, दो सिद्धांतों पर फिर से खड़ा करना होगा।'
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किसी भी अवस्था में कुछ आदमियों के अपराध पर, उनका पूरा वर्ग अपराधी नहीं माना जा सकता।
जब वर्णवादियों ने दलितों को एक देवता तक नहीं दिया, एक मंदिर तक नहीं दिया, न इतिहास दिया, न लिखने दिया—तब नए ग्लोबल स्पेस में दलित विमर्श अपनी जीनियोलोजी बनाएगा और उसे रोकने वाला कोई नहीं होगा।
शूद्र को रचयिता के पाँवों के समकक्ष रखा गया है। मानव शरीर में पैर ही सबसे नीचे और सबसे हेय होते हैं; चुनांचे, शूद्र को सामाजिक व्यवस्था में भी सबसे निचली पायदान दी जाती है, उसे सेवक या टहलुआ के रूप में काम करने का सबसे हीन काम मिलता है।
परतबद्ध असमानता की व्यवस्था में पीड़ित पक्ष किसी समान स्तर पर नहीं होते। ऐसा केवल तभी हो सकता है, जब व्यवस्था सिर्फ़ ऊँचे और नीचे लोगों से मिलकर बनी है।
अलग-अलग वर्गों को शरीर के अलग-अलग हिस्सों के समतुल्य बताना कोई संयोग की बात नहीं है। यह एक सोची-समझी योजना है। इस योजना के पीछे मक़सद यह है कि एक ऐसा फ़ॉर्मूला ढूँढ़ा जाए, जो दो समस्याओं को एक साथ हल कर दे। एक, चारों वर्गों के काम तय कर दिए जाएँ और दूसरी तरफ़ एक सुनिश्चित योजना के अनुसार चारों वर्गों का क्रम तय कर दिया जाए। अलग-अलग वर्गों को रचयिता की देह के अलग-अलग हिस्सों के बराबर रखने का उद्देश्य यही है।