एकांत के कवि, आवारा कम्युनिस्ट दोस्त और बहन के प्रेमी
अग्रज आज़ाद
05 जून 2026
आज के दौर में साम्यवाद-समाजवाद का झंडा उठाने वाले लोग जो ख़ुद को सबसे बड़ा समतावादी दिखाने पर उतारू हैं; उन्हें देखकर कुछ सीख पाएँ या न सीखें, लेकिन उन्हें क़रीब से देखने पर यह ज़रूर पता चलता है कि वे उपभोक्तावादी संस्कृति के सबसे ज़्यादा शिकार हैं। वे इस्तेमाल करना जान चुके हैं। वे काम के वक़्त पर याद करना सीख गए हैं। उनके मीठे-मीठे शब्द किसी धीमे ज़हर से कम नहीं हैं। वे प्रेम के सबसे बड़े विरोधी हैं। वे साम्यवाद और समाजवाद के सबसे ज़्यादा धोखा देते हैं। मेरा गुज़ारिश है कि उन्हें प्रिय न बनाएँ। वे एक ख़तरनाक चेतावनी हैं। वे बौद्धिक पाखंडवाद से लोगों का ज़ेहनी कत्ल कर रहे हैं। वे सूखा ख़त्म करने नहीं, बल्कि फ़स्ल बर्बाद करने आए हैं। अपने स्वार्थ के लिए आपको याद करने वाले लोगों से दूरी बनाएँ।
अगर हम और गहराई से समझें तो आलोक आज़ाद की कविता-पंक्तियाँ बेहद अंदर तक महसूस हो रही हैं :
जो हमें सिर्फ़ रिक्तताओं में
याद करते हैं
हम उनकी स्मृतियों के ख़ाली स्थान हैं
कोई पंक्ति नहीं।
मेरे थोड़ा और मनुष्य हो जाने में जिनका योगदान रहा, वे सदा समझाते रहे कि अपेक्षा और उम्मीद अवसाद का अन्न है। मैं भूख को पहचानता था, अन्न को नहीं, जो मिला भूख मिटाने के लिए खा लिया। मेरा बीमार होना नासमझी का परिणाम था। मिठाई मुझे ख़ूब पसंद है, पर भूल गया कि अति हर चीज़ की ख़राब है। उसी तरह मैं मीठे शब्दों का भोग करता रहा, किंतु आगे चलकर उन शब्दों ने मेरे ख़ून पर लगभग क़ब्ज़ा-सा कर लिया। वे अब मेरे भीतर धीमे ज़हर की तरह तैर रहे थे।
मेरे पास अब बच पाने का कोई साधन नहीं बचा था। वे धुआँ नहीं बिजली कड़काते हुए बादल की तरह दिखते थे। वे अब मेरे ख़ून में नाजायज़ होकर तैर रहे थे। उनसे लड़ पाना बहुत मुश्किल था। उन्होंने अपनी स्मृतियों का ख़ाली स्थान तो बनाया ही था; किंतु वे साथ-साथ मेरे सबसे प्रिय, मेरे भीतर के ख़ालीपन को भी खाना चाहते थे। उन्हें चिंता थी कि मैं उनके अलावा और किसी के बारे में न सोचूँ। कितना भयानक है ये! जब आपको कोई अपने मुताबिक़ ही सोचने को कहेगा। समय ज़्यादा नहीं हुआ था कि दिल्ली में बम फट चुका था। लाल क़िला लाल लहू से लाल! चारों तरफ़ मौत का सन्नाटा।
दो दिन घर से बाहर नहीं निकला और निकला भी तो ज़्यादा दूर तक नहीं गया। मैं जहाँ भी जाने की सोचता, लगता कि कहीं वहाँ भी बम न फट जाए! डर के कितने मायने होते हैं, उस वक़्त अच्छे से महसूस हो रहा था। बहरहाल, भीतर जो धमाके हो रहे थे, मैं उनसे बच नहीं पा रहा था। अकेलापन कितना मैला हो सकता है, यह बात मैं यहाँ लिखूँ तो कहीं आप यह न समझ बैठें कि मैं दुनिया का सबसे मैला मनुष्य हूँ। मैलापन बिखेरने की ताक़त मेरे हाथों में बिल्कुल नहीं है और वैसे भी अकेलेपन को एकांत में बदलते हुए जीवित निकल आना ही जीवन की विशेष गर्माहट है। प्रेमिका के गर्म हाथ मौजूद नहीं हैं, लेकिन एक घड़ी आप महसूस करने लग जाएँ कि आपके नालायक़ दोस्तों के कंधों पर आँसुओं का कुआँ है... तब शायद कोई नई वजह मिले... एक गुज़ारिश स्वयं के भीतर से भारी पड़ने लग जाए कि अब नहीं! मुझे उन ख़ाली स्थानों की कोई आवश्यकता नहीं है। मैं स्वयंमैथुन की आँधी में उजड़ी हुई भीड़ का हिस्सा तो बिल्कुल भी नहीं हूँ।
इन वामपंथियों ने बहुत कुछ दिया, कुछ समय तक एक पहचान भी। उनके बीच कुछ मेरे जैसे लोग थे, जिन्हें देखकर लगता था कि वे क्षणिक सुख देने वाला कोई संगीत हैं। क्षणिक इसलिए क्योंकि वे मेरे थक जाने के बाद जमात से निकाले जा चुके थे या ख़ुद कहीं बेहोशी की हालत में इस्तीफ़ा देकर सो गए थे।
एकांत में पहुँच जाने के बाद शोर थमा नहीं, तब भी भीतर धमाके हो रहे थे। फिर से डर के तमाम मायने समझ आने लग गए थे। एक अजीब सी-ध्वनि को अंदर महसूस किया। यह पहले कभी सुनाई नहीं दी। शायद वासनाओं से लड़ते हुए जो धमाके हो रहे थे, यह उनकी आवाज़ थी। एकांत में शांति होनी चाहिए, लेकिन यहाँ शोर बढ़ता जा रहा था। कैसा एकांत था ये?
धीरे-धीरे मुझे अपनी बहन के प्रेमी याद आने लगे। वे कितने भयानक थे। झूठे-मक्कार! नालायक़ी की भी हद होती है! इन एडवेंचरिस्ट अपने आपको साम्यवादी कहने वाले नालायक़ों और मेरी बहन के प्रेमियों के बीच बिल्कुल अंतर न था। नालायक़ों को मैंने दो स्तरों में बाँट दिया—एक मासूम नालायक़ और दूसरे दर-नालायक।
मेरी बहन के प्रेमी और एडवेंचरिस्ट तबक़े के वे कम्युनिस्ट दूसरे स्तर के नालायक़ थे।
शोर इतना बढ़ गया कि सन्नाटे भी बेइंतहा आवाज़ कर रहे थे। एक दिन अनायास सुबह-सुबह सपना आया; जिसमें एक अख़बार का पन्ना जिस पर पीले रंग के दाग़ थे, धुंधले अक्षर में मेरी आत्महत्या की ख़बर उस पर नज़र आ रही थी। आत्महत्या हेडलाइन बन गई थी। झटका देते हुए एकदम से बेड पर उठकर खड़ा हो गया। वहाँ कोई नहीं था, सिर्फ़ सन्नाटा, सन्न-सन्न की आवाज़ और फिर सिरदर्द।
दीवार को गले लगाना पहली बार सुखद लगा। न माँ थी, न मेरी बहन और धमाके इस क़दर थे कि लगा कोई छाती पर हाथ रखता तो उसका शरीर काँपने लगता। दीवार बहुत मज़बूत थी। मेरे धमाकों को झेल पाना किसी कमज़ोर शै के बस की बात नहीं थी।
इस बीच कुछ कवि मेरा जीवन-संगीत बन गए। वे इंक़लाब में भी याद आते और विघटन में भी। वे औषधि की तरह आए और जब मैं उनसे मिला; बहुत ज़ोर से मिला, ऐसा लगा कि कुछ अदृश्य चीज़ें उनके भीतर से मेरे अंदर जा रही हैं।
मेरी बहन ने जैसे प्यार किया अपने प्रेमियों से, मैं वैसे ही अपनी प्रेमिका को प्यार करना चाहता था।
वे लोग जो मुझसे इश्क़ का अफ़साना चाहते हैं, मैं समझ नहीं पाता कि वे इतनी जल्दी में क्यों हैं! वे अगर मेरी बात मान जाएँ कि “वे बंगाली लड़कियाँ आततायी नहीं थीं!” वे तब मुझसे अफ़साना माँगने की जल्दबाज़ी नहीं करेंगे।
मैं अब थक गया हूँ उन धमाकों से, मेरी बहन के विरह की दहाड़ मारती चीख़ों से। कुछ समय से एकांत शांत हुआ है। धमाकों को शांत करने का उपचार जब मुझे मिला, तब मुझे महसूस हुआ कि एक स्पर्श मात्र से धमाकों की आवाज़ शून्य हो जा रही है। फिर भी अपने पुरुष होने पर लगता रहा कि कहीं यह उपभोग तो नहीं। उसके एक स्पर्श से कान में आवाज़ आ रही थी : “इश तुमि आमार मोनेर मानुष, शोब भालो आछे!” उसके अनपेक्षित रूप से गले लगाने पर यह पंक्ति फिर गूँजने लगती... “इश तुमि आमार मोनेर मानुष, शोब भालो आछे!”
अभी धमाकों का डर पैना है। यह चुभ सकता है। इसलिए उससे बताते भी नहीं बना कि “तुमि आमार मोनेर मानुष...” जिस तरह डॉक्टर को सामने से देखते ही आधा रोग समाप्त होने लगता है, उसी तरह सिर्फ़ उसकी झलक भर से लगने लगता है कि धमाके शून्य हो रहे हैं।
मेरी बहन जिसे मैं दुनिया में सबसे अधिक चाहता हूँ, उसकी तरह मैं तुम्हारे स्पर्श के बदले, दहाड़ मारती हुई उसकी आवाज़ें तुम्हारे भीतर नहीं चाहता। तुम्हारा हाथ थामते ही मुझे हल्का-सा महसूस हुआ कि वे दहाड़ें तुम्हारे भीतर भी तो नहीं। तुम्हारा स्पर्श बहुत कोमल है। तुम्हारे हाथों की ऊष्मा इतनी गर्म है कि मुझे पूर्णतः विश्वास है कि मेरे धमाके शून्य हो जाएँगे। फिर भी मुझे डर के मायने याद हैं और उन दर-नालायक एडवेंचरिस्ट तबक़े के कम्युनिस्टों की आँखें और मेरी बहन के प्रेमियों के नालायक़पन के कर्त्तव्य।
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बेला पॉपुलर
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