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समय पर ग़ज़लें

समय अनुभव का सातत्य

है, जिसमें घटनाएँ भविष्य से वर्तमान में गुज़रती हुई भूत की ओर गमन करती हैं। धर्म, दर्शन और विज्ञान में समय प्रमुख अध्ययन का विषय रहा है। भारतीय दर्शन में ब्रह्मांड के लगातार सृजन, विनाश और पुनर्सृजन के कालचक्र से गुज़रते रहने की परिकल्पना की गई है। प्रस्तुत चयन में समय विषयक कविताओं का संकलन किया गया है।

कुछ कहल ना

अशोक द्विवेदी

ई का गजब भइल

जौहर शफियाबादी

तनी देख लीं ना

मिथिलेश ‘गहमरी’

आदमीयत के धरम

ए. कुमार ‘आँसू’

छोड़ दीं, चलके कहीं से कहीं ले आए दीं

सतीश्वर सहाय वर्मा ‘सतीश’

वक्त के मार सह रहल बानी

नागेन्द्र प्रसाद सिंह

भोर आके कतो

जगन्नाथ

चुप्पी मारि बैसल छी

सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी

पास आके समय

अशोक द्विवेदी

आँख उनकर आज

कृष्णानन्द कृष्ण

के बा आपन, कवन पराया

ब्रजभूषण मिश्र

उठ रहल केकर

कृष्णानन्द कृष्ण

गढ़ाइल जे रहे मुरत

कृष्णानन्द कृष्ण

जाने कइसन जादू

मिथिलेश ‘गहमरी’

जिनगी पहाड़ भेल

सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी

साँस पर राग

गहबर गोवर्द्धन

उमिर के सँवारत

कृष्णानन्द कृष्ण

आज अदिमी बिखर

ए. कुमार ‘आँसू’

चमक दमक में

अशोक द्विवेदी

जेने उनकर नजर

कृष्णानन्द कृष्ण

सब समय के धार

कृष्णानन्द कृष्ण

कतहीं चइता कतहीं

सूर्यदेव पाठक ‘पराग’

ई हवा जे बहि रहल छै

आनन्द मोहन झा

एह तरे बा समय

जौहर शफियाबादी

उमिर के लास कान्ही

नागेन्द्र प्रसाद सिंह

दरदे अबले उपहार

सूर्यदेव पाठक ‘पराग’

जब परिन्दा उड़ान पर होई

तैयब हुसैन पीड़ित

खाई बाटे गहिर भरके पाटे समय

सतीश्वर सहाय वर्मा ‘सतीश’

वार करना आ गया है

वीरेंद्र वत्स