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शनिवारेर चिट्ठी : मैं आशाओं से नहीं, पुनरावृत्तियों से बना मनुष्य हूँ

ये 

यह छत की ओर खुलती खिड़की से तेज़ हवा के आने और रसोई की खिड़की से तेज़ क़दम बाहर निकल जाने की आज की बेला है। बाहर अँधेरा है तो यह रात है। लिखने की इच्छा और लिखने से बचने की इच्छा मेरे भीतर हमेशा एक ही स्रोत से निकलती प्रतीत होती है। मैं यह चिंता करता हूँ कि मैं लिखना चाहता हूँ या बस उस व्यक्ति का अभिनय करना चाहता हूँ जो लिखता रहा है। लिखना मुझे भयभीत करता है, इसलिए नहीं कि कुछ लिखा जाना है, इसलिए कि ऐसी किसी तात्कालिकता को मेरी आवश्यकता नहीं है। उसके पास पहले से ही अपनी एक पूर्णता है। मेरा प्रवेश उसकी निर्दोष रिक्तता को दूषित न कर दे। मैंने कभी-कभी सोचा है कि सृजन सृष्टि की नहीं, संकोच की कला है। जो कहा गया, वह नहीं। जो रुक गया, जो चूक गया, जो कट गया, जो स्वयं को कहे जाने से बचा ले गया। संकोच है उसका वास्तविक पदार्थ।

रात नहीं थी तो दुपहर थी। वहाँ एक स्त्री थी। वह मीडियोकर सिगरेट-बाज़ थी। कला को उसकी बदतरी में बरतती हुई। मेरी कुछ मित्र-कवयित्रियों जैसी। मैं कभी भी धूम्रपान करता हूँ तो धुएँ को पर्याप्त भीतर उतरने देना चाहता हूँ। नासिका-मुख के सब कपाट बंद। बाहर निकल सकने की उसकी तड़प को बढ़ाता हुआ। अपनी किसी ऊब के उसकी अनुचरी बन सकने तक के समय की प्रतीक्षा करता हुआ। दरमियान जीभ दाँतों को और मुँह के ऊपरी आकाश को छूती रहती है। मैं कहता हूँ कि उस स्त्री के चेहरे पर कोई विचार नहीं था और तुम चाहो तो मुझे विचार-बाज़ कहो। मैं दूसरों के भीतर विचारों की अनुपस्थिति की कल्पना करता हूँ, ताकि अपने भीतर विचारों की अधिकता को सह सकूँ।

मुझे उन लोगों से ईर्ष्या होती है जो संसार में सीधे उपस्थित हैं। वे कहीं चल रहे हैं, वे कुछ ख़रीद रहे हैं, वे खा रहे हैं, वे प्रेम कर रहे हैं, वे लिख रहे हैं। मेरे और इन क्रियाओं के बीच एक अतिरिक्त परत बनी रहती है। मैं इन क्रियाओं के घटित में असहज होता रहता हूँ। मेरा कवि होना मेरी प्रतिभा नहीं, स्वयं की उपस्थिति की मेरी कमी है। कई वर्ष पूर्व मैंने सोचा था कि कविता मुझे मेरे निकट ले जाएगी। आज संदेह करता हूँ कि उसने मुझे मुझसे और दूर कर दिया है। लिखते समय मैं एक दूसरा व्यक्ति गढ़ता हूँ। वह व्यक्ति जो अनुभव को शब्द दे सकता है। जो वास्तव में अनुभव कर रहा होता है, वह प्रायः मौन रहता है। क्या मैं वही हूँ जो लिखता है या वह जो अपने ही लिखे हुए को पढ़कर रोष करता है? जानती हो, नहीं लिखने की थकान लिखने की थकान से अधिक गहरी होती है। यह अगली दुपहर थी जब इस थके हुए व्यक्ति से मैंने कहा कि मैं कल फिर लिखने के प्रयास करूँगा। मैं आशाओं से नहीं, पुनरावृत्तियों से बना मनुष्य हूँ। 

वे 

इस रात बिना किसी उद्देश्य के घर से निकल गया। यद्यपि यह कहना पूरी तरह सत्य नहीं है। मनुष्य कभी बिना उद्देश्य के नहीं निकलता। यदि उसके पास कोई बाहरी कारण नहीं होता तो वह अपने भीतर की संदिग्ध विकलता को ही कारण बना लेता है। इस विकलता को संज्ञा दूँ तो इसके अस्तित्व को सरल बना दूँ। यह सम्यक् नहीं होगा। 

सड़क पर लोग थे। वे कहीं लौट रहे थे। कहीं लौटने और कहीं से लौटने में कितनी जद्दोजहद होती होगी! मैं एक जादू चाहता हूँ कि किसी को देखूँ तो उसकी कहानी जान लूँ। मार्केस की इवा बिल्ली होना चाहती थी और संतरे खाना चाहती थी। फिर उसने सोचा कि क्या पता बिल्ली में बदल जाने पर संतरे खाने की इच्छा समाप्त हो जाए। ये लोग, इनके जीवन के यथार्थ मेरे लिए अप्राप्य हैं। सड़क से लौटते एक आदमी की बाहरी हँसी में एक ऐसी सहजता थी जिसने मुझे लगभग असहज कर दिया। मैं अपने भीतरी सड़क पर लौटने लगा हूँ। ऐसा लग रहा कि मैं वर्षों से किसी चीज़ को बहुत गंभीरता से ले रहा हूँ, लेकिन यह नहीं जानता कि वह चीज़ है क्या! कई बार लगता है कि मेरा जीवन घटनाओं से नहीं, उनकी कल्पनाओं से बना है। जिन प्रेमों को मैंने कभी नहीं जिया, जिन यात्राओं पर कभी नहीं गया, जिन कविताओं को कभी नहीं लिखा—वे सब मेरे भीतर किसी विचित्र वास्तविकता के साथ मौजूद हैं। क्या जीवन वह है जो घटता है या वह जो कल्पनाओं में था? मैं इस प्रश्न का उत्तर नहीं चाहता। मुझे संदेह है कि उत्तर मिल जाने पर प्रश्न की सुंदरता नष्ट हो जाएगी। अब मैं एक चौराहे पर रुक कर लोगों को सड़क पार करते देखने लगा हूँ। किसी ने भी मुझे नहीं देखा है। इस अर्थ में कैसा सुख है कि इस दुनिया को मेरी आवश्यकता नहीं है। हम अपने महत्त्व के भ्रम से कितने थके हुए रहते हैं। हम क्यों चाहते हैं कि हमारा जीवन किसी कथा का केंद्र हो! जीवन तो परिधियों में भी घटता है। मनुष्य का सच्चा अनुभव केंद्रीय होना नहीं, क्षणिक होना है। यद्यपि यह लिखते हुए भी मैं नहीं जानता कि मैं इस विचार पर कितना विश्वास करता हूँ! दुनिया को कोई भी अर्थ देने की भूल पर ग्लानि करता हुआ अब कमरे को लौटती सड़क पर हूँ। संभव है कि सड़क केवल सड़क हो। संभव है कि मेरी कविताएँ इसी संभावना को स्वीकार न कर पाने से पैदा हुई हों। 

मैं 

मुझे आज एक पुरानी कविता मिली। मैं उसे खोज नहीं रहा था। मुझे हमेशा संदेह रहा है कि जिन वस्तुओं को हम अचानक मिल जाना कहते हैं, वे वस्तुतः हमारी स्मृतियों से रचित गौण षड्यंत्र होते हैं। हम उन्हें भूलते नहीं; हम उन्हें टालते रहते हैं जब तक वे स्वयं हमारे सामने उपस्थित न हो जाएँ। नीचे मेरा पुराना नाम लिखा था, लेकिन उसे देखते हुए मुझे कोई आत्मीयता महसूस नहीं हुई। वह नाम किसी ऐसे व्यक्ति का लगा जिसे मैं कभी जानता था और अब भूलने लगा हूँ। यह विचार कि वह व्यक्ति मैं ही था, मुझे उससे निकट नहीं लाया। मेरी उलझन बढ़ गई। हम अपने अतीत को निरंतरता की तरह याद करते हैं, जबकि वह वास्तव में छूटे हुए कमरों की एक शृंखला है। हम एक कमरे से दूसरे कमरे तक चलते हुए यह भ्रम बनाए रखते हैं कि घर एक ही है। यह कविता किसी अनुभव की नहीं, उस अनुभव की कल्पना की कविता थी। 

मुझे अपने बचपन पर विश्वास नहीं है। जानता हूँ कि यह वाक्य लिखते हुए दोषपूर्ण अर्थ-आरोपण का जोखिम उठा रहा हूँ। मेरा आशय यह नहीं कि बचपन नहीं था। मेरा आशय यह है कि जिस बचपन को मैं याद करता हूँ, वह उतना ही निर्मित है जितनी कोई कविता। स्मृति और कल्पना के बीच की सीमा शायद उतनी स्पष्ट नहीं जितनी हम मानते हैं। कभी-कभी मुझे लगता है कि हम अपने अतीत के कवि भर होते हैं, उसके इतिहासकार नहीं। मुझे अपनी कविताओं को उसके साथ की कथा के साथ याद रखना पसंद है। मैंने इसके लिए कविथा (poetory) शब्द ही गढ़ लिया था। मुझे इस भूल-प्राप्त कविता के पीछे का कोई दृश्य याद नहीं। शब्द भर बचे हैं। यह अजीब है कि शब्द कई बार अनुभव से अधिक टिकाऊ सिद्ध होते हैं। अनुभव समाप्त हो जाता है। उसका मौसम चला जाता है। उससे संबद्ध भावनाएँ बदल जाती हैं। 

क्या कविता स्मृति को बचाती है? मुझे नहीं लगता। वह केवल उसके अवशेषों को संरक्षित करती है। 

यह 

आज सुबह कोई पंक्ति ज़ेहन में आई—एक साफ़ और सदाशय पंक्ति! कुछ क्षणों के लिए मुझे लगा कि यही वह वाक्य है जिसकी प्रतीक्षा मैं कई दिनों से कर रहा था। मैंने उसे लिख लिया। मेरे लिखते ही वह साधारण हो गई। यह घटना नई नहीं है। कई बार ऐसा ही होता है। कोई विचार भीतर अपनी अस्पष्टता में जीवित था और जैसे ही मैंने उसे भाषा में उतारा, उसने कुछ खो दिया। मैं यह भी नहीं कह सकता कि वह क्या खोता है। संभवतः अपनी संभावना। अपना कंपन। यही कारण, मुझे भाषा पर पूरा भरोसा नहीं है। मैं यह लिखते हुए भी भाषा का उपयोग कर रहा हूँ। इस विडंबना से बचना असंभव है। जो व्यक्ति शब्दों पर संदेह करता है, उसे अपना संदेह भी शब्दों में ही व्यक्त करना पड़ता है। और फिर भी, मेरे पास भाषा के अतिरिक्त कुछ नहीं है।

मैं सोचता था कि शब्द अनुभव को बचाते हैं। अब संदेह होता है कि वे उसे बदल देते हैं। जब मैं किसी दुःख के बारे में लिखता हूँ तो वह वही दुःख नहीं रहता जो लिखने से पहले था। वह दुःख की अदायगी है। एक संरचना। एक वस्तु, कमोबेश! हम लिखकर अपने अनुभवों को समझते हैं या उनसे और दूरी बना लेते हैं? यहाँ दोनों सच संभव हैं। 

रात हो गई है। भाषा केवल यह नहीं छिपाती कि हम क्या नहीं जानते। कई बार वह यह भी छिपा देती है कि हम कितना कम महसूस करते हैं। स्क्रीन पर कुछ वाक्य हैं और उनके बीच बहुत-सी ख़ाली जगह। पशोपेश में हूँ कि कविता शब्दों में रहती है या उनके बीच। जितना पुराना होता जा रहा हूँ, रिक्त स्थानों के प्रति कृतज्ञता उतनी ही बढ़ती जा रही है।   

वह 

मैं इस रात की छत पर हूँ। मैं छत पर हूँ और यह रात का समय है। ‘ऊपर आकाश है’ जैसा साधारण वाक्य कविता की गंभीरता को अर्थहीन कर देने पर उतारू है। ‘नीचे शहर है’ जैसा एक और वाक्य मैंने जोड़ दिया है। ‘उनके बीच मैं हूँ’। ओह, कितना क्लीशे! 

मुझे कुछ और सोचकर देखना चाहिए कविता नहीं सोच सकने के इस तत्क्षण में। मुझे कभी-कभी लगता है कि अकेलापन लोगों की अनुपस्थिति नहीं, अपने प्रति अत्यधिक उपस्थिति है। जब हम अकेले होते हैं, तब हमारे पास स्वयं से बचने के साधन कम हो जाते हैं। दूसरों के बीच हम अपने को भूल सकते हैं। अकेलेपन में हमें अपनी ही संगति सहनी पड़ती है और मैं निश्चित नहीं हूँ कि मैं अपनी संगति को पसंद करता हूँ। ओह, यह मेरी उस बात का विलोम है जो मैंने आज दुपहर किसी बड़े आदमी के हवाले से किसी साथी आदमी को कही थी! आप अकेले हैं और सुख में नहीं हैं तो अच्छी संगति में नहीं हैं। 

फिर मैं 

अधूरा वह होता है जिसे पूरा किया जा सके। 

कुछ कविताएँ ऐसी होती हैं जो अपने अपूर्ण रूप में ही अपनी अंतिम अवस्था प्राप्त कर लेती हैं। हम उन्हें समाप्त नहीं करते, किसी बिंदु पर छोड़ भर देते हैं। मैंने इस कविता को पढ़ा। मुझे इसमें कोई बड़ी कमी नहीं दिखी और यही बात मुझे असहज करती रही। जब किसी रचना में स्पष्ट दोष न हो और फिर भी वह सजीव न लगे, तब समस्या शब्दों में नहीं होती। तब समस्या शायद उस व्यक्ति में होती है जिसने उन्हें लिखा है।  यह भी संभव कि यह मेरी आत्ममुग्ध कल्पना है कि कविता की असफलता का केंद्र कवि होता है। 

किसी समय मुझे भी लगा था कि शब्दों के भीतर एक दूसरा जीवन संभव है। अब उस विश्वास की जगह एक आदत ने ले ली है। यह कहना कि मैं लिखने में विश्वास करता हूँ, अपूर्ण बात है। लेकिन मैं अब भी लिखता हूँ, सच है। मैंने कभी सोचा था कि लेखन स्पष्टता की ओर ले जाएगा। अब लगता है कि उसका काम स्पष्टता देना नहीं, हमारे भ्रमों को अधिक सूक्ष्म बनाना है। फ़िलवक़्त, ज़ेहन के ताले बंद करना चाहता हूँ। मुझे नहीं मालूम कि यह शृंखला समाप्त हुई है या नहीं। समाप्तियाँ अक्सर पीछे मुड़कर देखने पर ही दिखाई देती हैं। लेकिन इस क्षण, जब मैं अंतिम पंक्तियाँ लिख रहा हूँ, मुझे कविता के बारे में कोई निश्चित बात नहीं मालूम। इतना भर जानता हूँ कि कुछ प्रश्न ऐसे होते हैं जिनका उत्तर नहीं, केवल संगति संभव है। और संभव है कि मैं कविता से प्रेम नहीं करता। संभव है कि मैं केवल उसकी संगति का अभ्यस्त हो गया हूँ।

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