कुंठा पर कविताएँ

कुंठा मानसिक ग्रंथि

अथवा निराशाजन्य अतृप्त भावना या ‘फ़्रस्ट्रेशन’ है। स्वयं पर आरोप में यह ग्लानि या अपराध-बोध और अन्य पर दोषारोपण में ईर्ष्या या चिढ़ का द्योतक भी हो सकता है। मन के इस भाव को—इसके विभिन्न अर्थों में कविता अभिव्यक्त करती रही है।

शीघ्रपतन

प्रकृति करगेती

देना

नवीन सागर

साज़िश

नवीन रांगियाल

मनःस्थिति

अष्टभुजा शुक्‍ल

कुंठाएँ, पिपासा और बारिश

जगदीश चतुर्वेदी

कुंठा

विनोद भारद्वाज