कहानी : मैं किसी के लिए कुछ नहीं हूँ
गीताश्री
17 मार्च 2026
“अब भी क्या गले न मिलोगी? अभी तक वही हिचक... मिल लो यार, क्या पता अगली मुलाक़ात हो न हो।”
उसकी पसीजी हुई हथेलियाँ छूट रही थीं मुझसे। वो गले लगने या लगाने को बेताब था। विदा की बेला में ये बातें मेरे सीने के पार हो गई थीं। मैं कार के गेट खोलकर सीट पर आधी अंदर धँस चुकी थी। मैं उठकर खड़ी न हो सकी। हथेलियाँ छूटीं और मैंने गेट बंद कर लिया। उसे निराशा हुई होगी। उसकी प्रतिक्रिया का नहीं पता। अँधेरा गहरा गया था। जहाँ से हम अलग हुए थे, वहाँ अँधेरा था। उसने अपनी गाड़ी से मुझे बॉर्डर तक ड्रॉप किया और वहाँ से आगे मुझे दूसरे प्रदेश की गाड़ी ले जाने के लिए पहले से खड़ी थी। मैं एक लंबी यात्रा पर निकली थी, जिसकी वापसी की तारीख़ तय नहीं थी।
मैं अपने कुछ सहपाठियों से मिलने के लिए निकली थी। सबसे पहले दूर रहने वाले कौशल पाठक से मिलना था। वहाँ से आगे बढ़ना था। कौशल बार-बार आग्रह कर रहा था कि एक बार पूर्वोत्तर घूम जाओ। बहुत सुंदर है यहाँ सब कुछ।
मुझे नहीं पता कि मैंने सबसे पहले कौशल से मिलने का क्यों सोचा। इतनी दूर...! उसका मनुहार ही खींच ले गया। उसकी आवाज़ समय के पार से आती हुई लगती थी।
दुनिया भी भीड़ में जैसे सब सहपाठी खो गए थे, कौशल भी खो गया था। वो तो भला हो फ़ेसबुक का कि उसने मुझे तलाश लिया। कई सहपाठी जुड़ते चले गए। हमारा ग्रुप बन गया था और हम अब एक-दूसरे से मिलने को बेताब थे। बस बेताब थे, कोशिश नहीं हो रही थी। इसलिए मैंने सबसे पहले ये क़दम उठा लिया। मैं सरकारी नौकरी से वी.आर.एस. ले चुकी थी। मुझे अपने दो शौक़ पूरे करने थे—पहला अकेले घूमने का और दूसरा गायन सीखने का।
अनदेखी, अनजान जगहों की यात्राएँ और गायन। इससे पहले कि मेरी आवाज़ में दरारे पड़ जाएँ, कुछ गाने गाऊँ और यू-टयूब पर डाल दूँ। यात्राओं के वी-लॉग बनाऊँ, रोमांच जगाऊँ कि लोग घूमने निकल पड़े।
हाँ, तो मैं बता रही थी कि जब मैं कार में बैठी तो पता नहीं उसने देखा या नहीं, मैं रो रही थी। उससे बिछड़ने का ग़म था या इस बात पर कि कल फिर मुलाक़ात हो न हो। इतनी दूर अरुणाचल प्रदेश वो बिज़नेस करने आया और यहीं बस गया।
मैं नहीं चाहती थी कि वो मेरे आँसू देखे। उसके मन में मेरी एक बिंदास छवि थी, वो बनी रहे। वैसे भी शायद ये मेरी बढ़ती उम्र का असर है, बात-बात पर रोना आने लगता है। मैं कितनी हँसोड़ थी। हम अपनी छवि के क़ैदी होते हैं तो अपनी भावनाओं की उपेक्षा करते हैं। उन्हें अनदेखा करते हैं। हम बाहर कुछ और भीतर कुछ और जी रहे होते हैं। छवियाँ—दिलफ़रेब होती हैं, कई दिल तोड़ देती हैं और कई अवसर गँवा देती हैं; बाद में बहुत अफ़सोस देती हैं कि हम क़ैद में रहे और बाहर ज़िंदगी खड़ी थी, रिहाई के इंतज़ार में। मैं अपनी छवि की क़ैदी थी। हँसोड़, बिंदास और बेफ़िक़्र। ज़िंदगी और रिश्तों के प्रति लापरवाह।
मैं बिंदास होते हुए भी इतनी रिज़र्व कैसे रह सकी? ख़ुद पर भी हैरानी होती है। शायद इमेज की परवाह रही। मुझसे कोई छूट न ले ले। कोई हल्का न समझ ले। मुझे फ़्लर्ट नहीं करना, न करने देना है।
मेरी सखियाँ कहती थीं—”हिस्ट्री डिपार्टमेंट का कौशलवा तुम पर लाइन मारता है, तुम देखती नहीं हो।”
“हट्ट… दुर्र…” करके मैं उन तमाम ‘लाइन’ को ‘बेलाइन’ कर चल देती। ठीक उसी अंदाज़ में जैसे ऋषि कपूर गाते हैं—‘पर्दानशीं को बेपर्दा न कर दूँ तो… तो… तारा मेरा नाम नहीं।’
चौंक गए? मेरा नाम तारा है… तारा शर्मा।
सब कुछ उड़ा देने के लिए तेज़ हवा की तरह तारा शर्मा की हँसी काफ़ी थी।
मैं आज कौशल से अलग होते हुए पीछे मुड़कर देखती हूँ। गाड़ी दौड़ रही है जंगल के बीच से। आँखें पोंछते हुए मैंने घड़ी देखी, शाम के छह बजे ही इतना अँधेरा है, तेजपुर से शेरगाँव जाते हुए।
इन्हीं रास्तों से होते हुए मुझे त्वांग में प्रवेश करना था, जहाँ मेरी एक सहेली इंतज़ार कर रही थी।
कौशल पीछे छूट चुका था। मैंने पलटकर देखा नहीं था। उसे भी लौटना था। क्या देर तक वो मुझे जाता हुआ देख रहा था।
शायद!
मैं उससे शेरगाँव में ही मिली थी।
अपने शहर ईटानगर में नहीं मिलना चाहता था। और मुझे भी त्वांग जाने का मन था। वह लंबी दूरी तय करके वहाँ पहुँचा था।
कौशल ने वहाँ पहले से ही एक होम स्टे में दो कमरे बुक करा लिए थे। मुझे वहाँ पहुँचकर समझ आया कि उसने ये जगह ठहरने के लिए क्यों चुनी। यक़ीनन उसे मेरा नदियों और किताबों से प्रेम याद था।
होम स्टे के सामने एक छिछली, नीली नदी बह रही थी। उसे पार करके जंगल में प्रवेश करते हैं। वो मुझे अलग ही दुनिया दिखाना चाहता था।
नदी पार करते हुए घना जंगल दिखा तो मैंने मुँह बिचकाय—”कहाँ लिए जा रहे हो यार।”
“चलो तो सही देवी तारा... वहाँ तुम ख़ुद से मिलोगी...। अँधेरे के पार उजाले रहते हैं।”
“वाह, तुम तो कविया गए हो जी।” मैंने उसे छेड़ा। मेरे भीतर की लड़की तारा जग गई थी।
कौशल हँस रहा था। मैंने शाम के सुरमई उजाले में उसका चेहरा देखा। कितना मेंटेन कर रखा है ख़ुद को। वही कौशल, हिस्ट्री डिपार्टमेंट वाला।
जंगल की पगडंडी से गुज़रकर ऐसी जगह पहुँची जो मेरे लिए अकल्पनीय थी। जंगल कैफ़े था, घने पेड़ों के साये में साँसे लेता हुआ, कॉफ़ी की तरह महकता हुआ। पेड़ों पर लटकती किताबें दीख रही थीं। मानों वे शाखों पर उगी हो।
उन्हें देखते हुए मैंने पूछा—”क्या अब भी किताबों के प्रेमी बचे हुए हैं दुनिया में? लगता है, यहाँ कोई पढ़ता नहीं वहाँ पेड़ों पर लटका देते हैं।”
रेस्तराँ में औरतें रसोई में लगी थीं और लड़के वेटर का काम कर रहे थे। कौशल ने अचानक मेरा हाथ पकड़ा और रेस्तराँ के बग़ल में बने मचान की सीढ़ियों पर खींच ले गया। हम मचान पर अकेले बैठे थे, बाक़ी पर्यटक नीचे बैठकर खा-पी रहे थे। शाखों पर लटकती किताबों को मैं छू सकती थी।
“अरे देखो... यहाँ गांधी जी भी लटके हुए हैं।”
“फ़िराक साब और बशीर बद्र भी यहाँ लटके मिलेंगे। तुमने सिर्फ़ गांधी को देखा।”
“हाँ, मैंने सिर्फ़ गांधी को देखा और उन्हीं को देखना चाहती हूँ...। गांधी की ज़रूरत है देश को... मेरा वश चले तो समूचे जंगल में गांधी जी के पोस्टर लटका दूँ।”
मैं थोड़ी गंभीर हो गई।
“यार... तुम सीरियस मत हो... हम कोई ऐसी बहस नहीं करेंगे जिससे देश और राजनीति आए... ठीक है।”
“वो देखो, बशीर साब लटक रहे, उनको पढ़ो... कभी यूँ भी आ मेरी आँख में कि मेरी नज़र को ख़बर न हो...।”
“ऐ सुनो... तुम तो व्यापारी हो न। बड़े व्यवसायी... तुम तो सत्ता की भाषा बोलोगे ही...। गांधी से दूरी बनाकर शायरी में डूबो तुम... पूरा समाज मदांध हो चुका है।”
“मिल कर रहने में ही भलाई है। तुम व्यापारियों की हालत क्या जानो। हम हर तरफ़ से मरते हैं। चुनाव हो तो चंदा दो, स्थानीय दबंगों को चंदा दो, छात्र आंदोलन करे तो भरो... नगर में कोई आयोजन हो तो विज्ञापन दो...। मिलकर नहीं रहेंगे तो इतिहास दोहराएगा और अब और नहीं।”
मैं उसके अंतिम वाक्य पर ठहर गई। “इतिहास दोहराएगा...” इसका क्या मतलब।
हमारी कुकीज़ और कॉफ़ी ख़त्म हो चुकी थी। उसने इशारा किया कि हमें चलना चाहिए। हम मचान से चुपचाप उतरे, उसने बिल चुकाया। हम जंगल की पगडंडियों से चुपचाप गुज़रने लगे। मैंने महसूस किया कि व्यक्तिगत संबंधों की मधुरता ऐसी बहसें ख़त्म कर देती हैं।
नदी पार करते हुए, उसने मेरा हाथ थामा और उस पार जाकर चट्टानों पर बैठ गए थे। हमारे पैर नीले पानी में डूबे हुए थे। उसने झुककर एक अंजुरी जल उठाया और मेरे ऊपर फेंकने लगा। कितना शीतल पानी। नवंबर की हल्की ठंड में जो मेरा आंतरिक तामपान बढ़ा था, उसे ठंडक पहुँची।
मैंने तत्क्षण तय किया कि इससे अब कोई ऐसी बातें नहीं करुँगी। जाने किस इतिहास का बोझ ढोते हुए जी रहा है।
अभी तो उससे बहुत पुरानी बातें करनी है, यादें ताजा करनी है। गंभीर बहसें कहीं की नहीं छोड़ती। लोग अपने बंद दिमाग़ से बहस करते हैं और उन पर रत्ती भर फ़र्क़ नहीं पड़ता। संबंधों की मिठास नष्ट होते देखना बहुत दुखद है इन दिनों। इन बहसों ने मेरे कई प्रिय दोस्त और रिश्ते छीने हैं। जानलेवा दूरियाँ बढ़ी हुई हैं और असहमत लोग मेरा अहित करने पर तुले हैं। मुझे अब और विनाश नहीं चाहिए। उम्र ढलान पर है। रीता दीदी अक्सर कहती हैं—”तरु, तू 58 की हो गई है, 10 साल और एक्टिव रहेगी। उसके बाद...।”
रीता दीदी को मेरे अकेले होने का डर सताता है। उन्हें क्या पता कि मैं शेरगाँव के जंगल में लटकी उन पुस्तकों की तरह हूँ जो हवाओं से, बारिशों से बातें करती है।
यहाँ आने से पहले मैंने कौशल से कहा था—”हम ऐसी जगह मिले, जहाँ सन्नाटा हो।”
कौशल ने लंबा चौड़ा संदेश भेजा था—”प्रकृति की यही तो ताक़त है। वह न बोलती है, न टोकती है, लेकिन उसके पास एक अनकहा अपनापन होता है। पेड़ों की शाखाएँ जैसे सहारा देती हैं, बूँदें जैसे मन के बोझ को धो डालती हैं और हवा के झोंके जैसे नए सिरे से जीवन में ऊर्जा भरते हैं।”
“ज़िंदगी में दुःखों से बचा नहीं जा सकता। लेकिन उनसे निपटने के अपने तरीक़े हो सकते हैं। मेरे लिए प्रकृति वह शांत श्रोता है जो बिना कहे बहुत कुछ समझ लेती है। जब मनुष्य की दुनिया में शब्द और सवाल भारी लगने लगते हैं, तब पेड़-पौधे, बादल, बारिश और हवा चुपचाप सहारा बन जाते हैं।”
“शायद इसी वजह से जब भी मन बहुत परेशान होता है, मैं प्रकृति के पास चला जाता हूँ। वहाँ कोई तर्क नहीं, कोई बहस नहीं—बस एक स्नेहिल मौन होता है, जो मन को थाम लेता है।”
प्रकृति के सान्निध्य की चाहत में एक मुज़फ़्फ़रपुरिया लड़का इतनी दूर आकर बस गया। मेरे भीतर उत्सुकता जगी कि पहले तो ये असम में था, कुछ साल। हमें पता चला था कि कौशल असम चला गया है। उसके बाद सब खो गए अपनी-अपनी दुनिया में।
मैं उसे कुरेदना चाहती थी। उसके बारे में सब कुछ जानना चाहती थी। उसका सफ़र आसान न रहा होगा। जोरहाट से ईटानगर तक का सफ़र इतना आसान कहाँ रहा होगा। इन दिनों तो वो ईटानगर का जाना-माना कारोबारी है। मल्टीनेशनल कंपनी की गाड़ियों का शोरूम है। उसे स्थानीय लोग नाम से पहचानते हैं, ऐसा उसका दावा है।
“मैं दिल्ली आना चाहता था।”
“तो आ जाते, मैं मिलती वहाँ... कितना अच्छा होता।”
“किस्मत को कुछ और ही मंजूर था तारा।”
उसके चेहरे पर वक़्त की रेखाएँ गहरा गई थीं। मैंने घड़ी देखी। शाम के पाँच ही बजे थे। लेकिन अँधेरा हो चुका था।
“यहाँ इतनी जल्दी अँधेरा हो जाता है। पाँच बजे ही लगता है कितनी रात हो गई। अभी तो सारी रात बाक़ी है।”
“यहाँ सुबह जल्दी होती है... तुम पूर्वोत्तर में हो जहाँ सूरज सबसे पहले उगता है, सुबह कमरे की खिड़की से परदे हटाना, सूरज का गोला सीधे अंदर घुसेगा... और...”
वो कुछ और कहता, उसके पहले होम स्टे का मालिक तेनजिंग क़रीब आ गया। वो कुछ पूछ रहा था। अच्छी हिंदी बोलता है।
“डिनर क्या लेगा... यहाँ का राइस बीयर ट्राई करेगा...? बहुत टेस्टी होता है। हमारे घर का बना हुआ है।”
राइस बीयर... सुनते ही मुझे झारखंड की याद आई। मैंने चखा था, डर के मारे पी नहीं पाई। मुझे ऐसे नशे से हमेशा डर लगता है जो पीने वालों की चेतना पर काबू पाकर उसे हास्यास्पद बना दे।
“हाँ, लाओ... हम पीएँगे... तुम पीना, बहुत टेस्टी होता है।”
“क़तई नहीं...”
“मैंने ज़ोर से मना किया।”
तेनजिंग हँसा, “मैम, स्मोकी फ़्लेवर है, हम लोग पुआल में छानते हैं... हमारा तरीक़ा अलग है। आप पीकर देखो...। नशा हल्का होता है।”
मैंने प्रतिवाद नहीं किया। जो होगा, देखा जाएगा। तेनजिंग खाने का ऑर्डर लेकर चला गया।
हम यहाँ सिर्फ़ एक रात के लिए रुके थे। मुझे अगले दिन त्वांग निकल जाना था। कौशल को असम के किसी शहर में जाना था। अब नियमित आना-जाना करता है, ऐसा उसकी बातों से पता चला।
“1992 में वो पहले जोरहाट गया, वहाँ नाना की दुकान थी। उसे विरासत में मिली। उसे सँभालने लगा। जब कुछ ही सालों में उसका व्यवसाय पूरा फैलने लगा, तभी राज्य में उल्फा आंदोलन ने ज़ोर पकड़ा। 1996 में उसे जोरहाट छोड़ना पड़ा। वो लौटकर गाँव वापस नहीं जा सकता था। उसे इधर ही कहीं अपने को फिर से खड़ा करना था।”
ये सब बताते हुए कौशल का चेहरा तना हुआ था। असहज हो रहा था। मैंने कहा—“कोई परेशानी है तो रहने दो।”
“कुछ यादें इतनी ज़ालिम होती हैं कि बीतकर भी नहीं बीतती। उन्हें बीत जाना चाहिए था। मुझे छोड़ती नहीं।”
मैंने ग़ौर से उसके चेहरे को पढ़ने की कोशिश की। कोई रहस्य था जिसे वो छुपा रहा था या छुपाना चाहता था।
“क्या कुछ हादसा हुआ था? रहने दो फिर...”
मैंने हौले से उसका हाथ दबाया।
कौशल कुछ पल चुप रहा।
“मुझे उल्फा वाले उठा ले गए थे।
“क्या?”
मेरा मुँह खुला रह गया। झुरझुरी हुई।
“तुम बचे कैसे?”
मुझे उसके ज़िंदा होने पर यक़ीन न हुआ। मुझे असम का वो उग्र आंदोलन याद है। बहुत ख़ौफ़ था और ग़ैर असमिया लोग राज्य छोड़कर भाग रहे थे। एक वक़्त था, जब बिहार के कई गाँव ख़ाली हो गए, मर्द कमाने चले गए बंगाल और असम। औरतें बच गईं गाँव में। ठीक वैसे ही जैसे आज सिवान और यूपी के कुछ इलाक़ों में कई गाँव ख़ाली हैं, पुरुष चले गए खाड़ी देशों में।
कुछ देर चुप रहकर उसकी ठहरी हुई आवाज़ सुनाई दी—“सौदेबाज़ी से। वो मारते नहीं थे, जैसे बिहार में रंगदारी वसूलते थे व्यापारियों से, उसी तरह यहाँ भी उस दौर में बाहरी व्यापारी को उठा ले जाते थे, धमकाते थे, फ़िरौती वसूलते थे।”
“तुम कितने में छूटे?”
मैंने हँसते हुए पूछा। माहौल हल्का करना चाहती थी।
“तुम्हें हँसी सूझ रही है... एकदम वही हँसी... जो आर्ट डिपार्टमेंट की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए छूटती थी...!”
“पाँच लाख का सौदा हुआ था, एक लाख दिया। बाक़ी किस्तों में देने की बात हुई। वो इतनी राहत देते थे...!”
“यार... पाँच लाख! उस समय तो ये बहुत बड़ी रकम थी। ओह…!” मैं हैरानी से भर गई थी।
हम दोनों कुछ देर चुप बैठे रहे। वातावरण बोझिल हो गया था। हम खुली टैरेस पर बैठे थे। चारों तरफ़ छोटे-छोटे बल्ब जल रहे थे। अँधेरे में जंगल कितना ख़ामोश और नदी कितनी वाचाल हो जाती है।
कौशल सहज हुआ।
“झिंगुरों का गान ही जंगल का गान है। मैं इन्हें अरण्य रोदन कहता हूँ। अँधेरा होते ही रोने लगते हैं... कितना शोर... सुर में शोर मचाते हैं।”
“हाँ, मैंने पहाड़ों में प्रवास के दौरान भी ये बात नोटिस की है।”
“पहाड़ों से प्रेम है या दुनिया से भागती हो तारा...।”
“मैंने बारहा सोचा है कि प्रेम विवाह आख़िर फेल क्यों हो जाते हैं? ऐसा क्या होता है जो टूटकर प्रेम करने वालों के बीच कि सारी कोमलता नष्ट हो जाती है। एक दूसरे में सिर्फ़ कमियाँ दीखने लगती हैं। यही नहीं, जो विवाह पूर्व ख़ूबियाँ नज़र आती थीं, वो कमियों में कैसे बदल जाती थीं। कैसे दोनों पार्टनर ये सोचने लगते हैं कि एक-दूसरे को बदल देंगे, अपने अनुसार ढाल लेंगे एक दिन। मेरा पति सोचता था ऐसा। और एक दिन मेरा मन बदल गया और मैं घर छोड़ गई।”
कौशल मुझे सुनता रहा चुपचाप।
“जानते हो, मुझे क़तई अफ़सोस नहीं कि फ़लाँ लड़का मुझे इतना चाहता था, मैंने उससे शादी क्यों न की। मेरी राय ख़राब हो गई है। इश्क़, प्रेम, मुहब्बत...।”
“यार तारा... कई बार मुझे लगता है कि लड़कियाँ जीवन भर वही दीवानगी ढूँढ़ती हैं, जो विवाह पूर्व होता है; जबकि साथ रहते हुए ज़िम्मेदारियों की टकराहट होती है, आकर्षण लूज होता है और इंसान बदलता है।”
कौशल मुझे समझाने के मूड में था।
“तुम भी बदले होंगे?”—मैंने पूछ लिया।
“हाँ, बिल्कुल”
“मगर मैं ख़ुश हूँ।”
“अच्छा… क्या तुम्हारी पत्नी भी ख़ुश है? तुमने पूछा है कभी? या ज़रूरत ही नहीं समझी।”
“ख़ुश रहना इतना ज़रूरी क्यों होना चाहिए?”
ये सवाल पूछने के बाद कौशल चुप हो गया। उसने इस तरह तो सोचा ही नहीं था। उसे अपने भीतर खोखलापन महसूस होने लगा था। इस तरह तो उसने कभी पत्नी से पूछा ही नहीं। सब ठीक चलता रहा। उनके रिश्तों में कब अबोलापन घुसा, पता ही नहीं चला। दो इंसान नहीं, दो मशीन साथ-साथ जी रहे थे। विचार के दो ध्रुवांत थे दोनों। कौशल, माँ-बाप की पसंद की लड़की के साथ तालमेल न बिठा पाया। अपनी पसंद की जीवनसाथी के खांचे में उसे फ़िट नहीं कर पाया, न वो होना चाही। क्या स्त्रियाँ भी इतनी बेपरवाह हो सकती हैं? क्या उस पर पति थोपा गया है? यही सब कौशल सोचता रहा सारी ज़िंदगी। दोनों एक-दूसरे के साथ ऐसे जी रहे हैं, मानों किसी बात का बदला ले रहे हों एक-दूसरे से। ये सच है कि वो दोनों दो अलग-अलग कमरो में सोने वाले, दो बेटों के माँ-बाप बन कर रह गए थे। विवाह के साथ ही उदासी उसके जीवन में ऐसे समाई कि चेहरे पर स्थायी बसेरा कर लिया।
उस वक़्त मुझे उसकी उपस्थिति उदासी से भर रही थी। मुझे लगा, मैं उस वक़्त बहुत दूर... चली जाऊँ और उसे एक अदृश्य दूरी से देखूँ। वो मुझे ख़ुद को देखते हुए न देखे, न मैं उसे। वो मेरे पास बैठकर मुझे अतीत में ढूँढ़ रहा है। हम दोनों के चेहरे पर उदासी की छाया थी।
उसी उदासी से एक आवाज़ आई, कुछ पल बाद—
“तुम मिलना चाहोगी उससे?”
“क़तई नहीं। मत मिलवाना। हाउस वाइफ़्स, सिंगल औरतों से जलती हैं या उनसे मिलकर बदल जाती हैं। तुम इस उम्र में बगावत नहीं झेल पाओगे। जाओ सुखी रहो।”
मैं ज़ोर से हँस पड़ी। कौशल मुग्ध होकर मेरी हँसी सुनता-देखता रहा।
“आज भी तुम हँसते हुए गुलाबी हो जाती हो।”
“हूं... हूं... फ़्लर्टिंग... हाँ...।”
“भक्क...। अब क्या।”
“तारा... तुम ख़ुश हो?” कौशल ने गंभीरता से पूछा।
“बिल्कुल, पहले लगता था, उसके बिना मर जाऊँगी। फिर लगने लगा, अगर साथ रही तो मर जाऊँगी।”
मैंने दोनों हाथों से ख़ुद को बाँहों में भर लिया।
“तुम भी करो ऐसे... बटर फ़्लाई बनाओ। सीने पर दोनों हथेलियों से थपथपा कर कहो—मैं ठीक हूँ, मैं ख़ुश हूँ।”
“तुम कोरियन ड्रामा बहुत देखती हो क्या कटार...।”
“कटार...” ये शब्द कुछ सुने-सुने लग रहे थे। कहीं छूटा हुआ कोई प्राचीन शब्द। क्यों, कहाँ... ये ध्यान में नहीं आया। सोचा, बाद में पूछूँगी कि किस कोने से मैं कटार लगती हूँ। मैं असमंजस में डूबी थी और वो ठहाके लगा रहा था। उसके चेहरे से उदासी की स्याही झर गई थी।
कौशल इतनी ज़ोर से हँसे जा रहा था कि मेरे हाथों के बंधन छूट गए, मैंने उसे मुक्का मारा। उसने पीठ कर दी—“लो मारो। पीठ में दर्द है, अब ठीक हो जाएगा।”
हम हँसते रहे, उस रात शेरगाँव की वादी में दो उदासीन लोग हँस रहे थे, वादी गवाह बन गई थी।
वह जंगल, नदी की एकांत रात थी। गुज़रे वक़्त के दो लोग आमने-सामने के कमरे में ठहरे थे। उन दोनों के बीच एक रात थी, किसी अभेद्य दीवार की तरह। दोनों चाहते थे, सारी रात बाहर बैठे बातें करते रहें। गुज़रे सालों की सारी कथाएँ बता डालें एक-दूसरे को। गुज़रे ज़माने की स्मृतियाँ हमेशा मोहक हो ज़रूरी तो नहीं। स्मृति में भी एक दूरी से देखने की ज़रूरत महसूस होती है, दूरियाँ मोहक होती हैं। शायद हम दोनों की स्मृतियाँ एक क़ैदी जैसी थी, वो सुखद कैसे हो सकती है? क़ैद-ए-बा-मशक़्क़त! कुछ रिश्ते, कुछ अपेक्षाएँ क़ैदख़ाना होती हैं। हमारे पास अपनी स्मृतियों पर गर्व करने लायक़ क्या है?
मैं धीमे क़दमों से उठी और दरवाज़ा खोलकर बाहर झाँका। बाहर गलियारे में रोशनी थी। दोनों तरफ़ से खुला गलियारा था, अँधेरे में डूबी, नदी की गंध और स्पर्श से गीली हवा आवाजाही कर रही थी।
कौशल के कमरे का दरवाज़ा बंद था, लेकिन अंदर से गाने की आवाज़ धीमे-धीमे आ रही थी।
पुरुष गायक की मीठी आवाज़ में एक गाना बज रहा था, भाषा पहचान गई थी। असमिया भाषा थी। मेरे स्थानीय ड्राइवर ने लगातार असमिया गाने चलाए कार में। ख़ासकर इस मीठी आवाज़ का वो दीवाना था। वो आवाज़ मेरी जानी पहचानी-सी लग रही थी।
ड्राइवर ने बताया—“ये हमारे असम के प्राण हैं... जुबिन दा।”
“ओ… हाँ… याद आया… या ली…मदद आली.. प्यार में क़ुर्बां हैं सभी…” वाले जुबिन गार्ग। फिर तो सारे रास्ते उस मीठी आवाज़ में डूबी रही, अबूझ भाषा की मिठास भला किसके भीतर न उतर जाए।
उस रात कौशल के कमरे से जो गाने के बोल जो मेरे कानों में पड़े—
‘मायाबिनी… रातिर बुकुत… देखा पालोँ तोमार छबि
धरा दिला गोपने आहि... हियार कोणत...’
ये गाना जुबिन का सबसे प्रिय गाना है। ऐसा मैंने सुना है। कौशल क्यों सुन रहा है, इस मध्यरात्रि में। कल सुबह चाय पर इस गाने के अर्थ पूछूँगी। बोल मेरे भीतर उतर रहे थे और मैं उन्हें पकड़ने की कोशिश कर रही थी…।
‘निजानर गान मोर... शेष हाबो... भाबो तोमार बुकुत…’
कुछ शब्दों के अर्थ खुल रहे थे।
रात की इस बेला में पूछना उचित न होगा। गाना ख़त्म हुआ तब मैं अंदर वापस लौटी। ‘मायाबिनी…’ मेरे ज़ेहन में धँस गई थी।
सुबह की असम टी हम पी रहे थे। इस मुलाक़ात की आख़िरी चाय।
कौशल थोड़ा डिस्टर्ब लग रहा था। उसकी आँखों में रतजगे के निशान थे। इतनी उदासी ओढ़कर कोई उम्र कैसे काट सकता है? पता नहीं क्या विवशता है। मैं उसकी समस्या में ज़्यादा उलझकर रह जाती। इसलिए रात के गाने ‘मायाबिनी...’ पर बात शुरू कर दी।
“तुम अब भी असमिया भाषा से प्रेम करते हो?”
“क्यों? ओ… तुमने कल रात गलियारे में घूम रही थी?”
उसकी आँखें हैरानी से चौड़ी हो गई थीं और भौंहें और घनी हो उठी थीं।
“मुझे भी पसंद आया… मैं सुना करूँगी—‘मायाबिनी…’ इसका अर्थ भी जानना चाहती हूँ।”
“अर्थ तो तुम गूगल में ढूँढ़ सकती हो… फ़ीलिंग नहीं…”
उसने आख़िरी शब्द धीरे से कहा। कुछ देर चुप रहा। उसकी काली चाय कप में हिल उठी।
मैं चाय के कप से गोल-गोल खेलती रही। मैंने उस पर दबाव नहीं डाला कि गाने का अर्थ समझाए। मैं गूगल में खोजूँगी या ड्राइवर से पूछूँगी।
मेरी उत्सुकता थोड़ी अलग क़िस्म की होती है, हर नई चीज़ को जानने-समझने की।
अपनी घोर उत्सुकता को दबाकर मैंने बात बदल दी।
“तुम्हें इतनी दूर नहीं आना चाहिए था। बहुत झेलना पड़ा न तुम्हें। वापसी की कोई चाहत।”
“ना...। सवाल ही नहीं। भौगोलिक दूरियाँ बहुत मायने रखती हैं। मैं इधर आकर उधर की दुनिया से, यादों से कट गया हूँ और ये बात मुझे ज़िंदा रखती है।”
“तुम किससे पीछा छुड़ाना चाहते थे?”
“तुम पहुँच से बाहर थी हम सबके। याद है, तुम्हारे पिता के डर से उस शहर में कौन लड़का हिम्मत करता तुमसे प्रेम निवेदन करने का। सब को अपनी जान प्यारी थी।”
कौशल ने ठहाका लगाया।
“मैंने भी कहाँ किसी को इस नज़र से देखा। हम तब सोचते भी कैसे? पापा की सख्ती ने हमारी सोच को सीमित कर दिया था। हम तीनों बहने इश्क़ के चक्कर में नहीं पड़ी थी तब। बाद में पापा बदल गए थे। मैंने ख़ुद ही हम-पेशा साथी चुना।”
कौशल कहीं खोया हुआ था, मानों उसकी आँखें अतीत में धँस गई हों। कौशल वह लड़का था हमारे वक़्त का, जिसे मैंने कभी ग़ौर से देखा ही नहीं। ऐसा नहीं कि हमारी नज़रें नहीं मिलती थीं। हमारी सीढ़ियाँ एक थी। कोरीडोर एक था। हमारे विभाग के लड़कों से उसकी सबसे ज़्यादा दोस्ती थी। वजह अब समझ पा रही हूँ। मुझे इतना पता चल गया था कि वो मुझे घूरता रहता है। एक बार नज़रें टकराई तो मैंने उन आँखों में आद्रता देखी। ज़्यादा देर देखती तो कुछ और भी दीख जाता। अब देख रही हूँ, ठीक से। भरपूर। काली और सफ़ेद होती घनी भौंहो के बीच गहरी, उदास आँखें। माँ कहती थीं—“जिन लड़को की भौंहे जुड़ी हों, वे अपनी बीवी से बहुत प्रेम करते हैं। जैसे तेरे पापा मुझसे।”
माँएँ तो बहुत कुछ कहती हैं। बेटियाँ गाँठ बाँध लें तो जी न पाएँ।
मैं कहती—“ऐसा प्रेम माँ... कि आपका गायन छुड़वाकर पापा ने घर बिठा दिया। आपको जब पसंद किया था, तब उन्होंने आपको गाते हुए सुना था न। फिर आप गायिका क्यों न बनीं। ये कैसा प्रेम है माँ...।”
“हट...तुमको क्रांति सूझती है। मुझे बगावत की बू आ रही है तारा… सावधान।”
कौशल की भौंहे भी आपस में जुड़ी हुई हैं। माँ की बात सच है तो ज़रूर अपनी पत्नी से बहुत प्यार करता होगा। फिर इसकी आँखें उदास और चेहरा इतना निस्तेज क्यों है। उम्र का असर दीखने लगा है इसके चेहरे पर। बाल उड़ रहे। तोंद हल्की निकली हुई है। मेरे सामने बैठा हुआ वो कोई एक व्यक्ति नहीं, एक गुज़रा हुआ वक़्त है। ऐसा वक़्त जो अचानक गुफ़ा से निकलकर मेरे सामने खड़ा हो गया है। जो वक़्त गुज़र गया था, उससे क्या चाहती थी मैं। लड़कों का ध्यानाकर्षण या सिर्फ़ पापा की इच्छा का पालन। मुझे बड़ा अधिकारी बनना है। ताकि दबंग ठेकेदार पिता सिर उठाकर शहर में रोब मार सकें। पापा के सपनों का बोझ भारी था। वो इतने कड़क थे कि किसी लड़के से इश्क़ करती तो उसकी जान भी ले लेते। उसका पता भी न चलता, ग़ायब करवा देते। रीता दीदी के अल्पकालिक प्रेमी का हश्र क़िस्सों में सुनाई देता है। लोगों ने फ़िल्मों में देखा होगा, हमने जीवन में भोगा है। बाहुबली पिता की बेटी का जीवन आसान न था उस काल में। मेरे जीवन में उस वक़्त प्रेम के लिए कोई जगह नहीं थी। इश्क़ की उम्र में मैंने किताबों में सिर डूबो लिया था। जब सिर उठाया तो वक़्त जा चुका था। क्या-क्या याद करूँ। मेरे रिश्ते की जब मौत हो रही थी, तब पापा की बूढ़ी, क्लांत आँखें पछतावे से भरी थीं। वे आँखें मिलाने से कतराते थे। मैं कहीं कोई सवाल न पूछ दूँ।
गुज़रे वक़्त के इस एहसास ने मुझे भीतर से भारी कर दिया था। हमारी बीच गुज़रे वक़्त की ख़ास गंध मौजूद थी। नब्बे का वह साल, विश्वविद्यालय कैंपस में अमलतास, गुलमोहर और शिरीष के फूलों की रंगत। उस वक़्त की कुछ आवाज़ें सुनाई दे रही हैं... एक शहर करवट ले रहा है। गर्ल्स हॉस्टल और ब्वॉयज़ हॉस्टल के बीच की सड़क साइकिल की घंटियों से टुनटुना उठी है। शहर की बजबजाती नालियाँ, बूढ़ी गंडक की उफनती धारा, मोतीझील की चटोरी शाम, कैंपस में रिक्शे से आती बाहरी लड़कियाँ। उनके पीछे साईकिल सवारों की फ़ौज़।
इन सबकी स्मृति में एक ख़ास गंध है।
“हैलो... कहाँ गुम हो गई?” कौशल ने टोका। मैं वक़्त की पकड़ से छूटकर धम से गिरी।
“तुम्हें एक बात बताऊँ…?” जैसे कोई रहस्य खोलना चाहता हो।
“लड़कों ने तुम्हारा नाम क्या रखा था... याद है? हम तुम्हारे बारे में उसी नाम से बात करते थे। आज भी मेरे कुछ सहपाठी इसी नाम से तुम्हें याद करते हैं और मुझे छेड़ते रहते हैं। तुम एकदम कटार जैसी थी, आज भी वैसी ही हो। तुम्हारी पर्सनालिटी में जो तीखापन है, वह और किसी में नहीं।”
“मेरा नाम... क्या? तुम लड़कों ने मेरा नाम रखा और मुझे याद नहीं।”
“कटार!”
“हैं! हद है। क्या बकवास। आज बता रहे हो। अब तुम सचमुच पिटोगे।”
मैं सचमुच उसे मुक्का मारना चाहती थी।
“कब बताता, हिम्मत कहाँ होती थी। चलो, गाड़ी नीचे खड़ी है, विदा की बेला है। हिंसक कार्रवाई न करो।”
वो आगे बढ़ा और मैं उसके गले लग गई। देर तक हम उसी तरह बंधे रहे और हम अलग हो रहे थे। दोनों दो दिशाओं में जा रहे थे। उसके आख़िरी वाक्य ने मुझे डरा दिया था और मैं रो रही थी। गाड़ी भागी जा रही थी।
ख़ुद पर काबू पाने में समय लगा। बढ़ती उम्र का असर है, जल्दी रोना, जल्दी ठीक होना। व्हाट्सऐप खोला, कौशल को धन्यवाद कहूँ। एक यादगार शाम के लिए। उसने होम स्टे का भुगतान नहीं करने दिया था।
ड्राइवर से मैंने कहा—भैया, ‘मायाबिनी’ गाना सुना दो। उसके पेन ड्राइव में ज़ुबिन के सारे गाने भरे हुए थे। एक बार फिर से ‘मायाबिनी...’ गान चल रहा है। मैं उसके अर्थ के लिए त्वांग में प्रतीक्षा कर रही असमिया दोस्त अधिरा गोस्वामी को मैसेज किया।
उसने टुकड़ों में अनुवाद भेजा और मैं उसे पढ़ते हुए और गहरे दुख में डूब गई।
“मायाबिनी... जादुई रात की गोद में मैंने तुम्हारी छवि (चेहरा) देखी”
“आँधियों के शोर में मेरी आत्मा अनगिनत युगों से नाचती रही है...”
“अँधेरे ने मेरे बहुत से दिनों को निगल लिया है...”
गाने की अंतिम पंक्ति—“निजानर गाम मोरे... शेष हाबो... भाबो तोमार बुकुत...” का जो अर्थ पढ़ा, मैंने कलेजा मसल लिया।
अधिरा ने साधारण, हड़बड़ी वाला अनुवाद किया था, जिसे मैंने अपने काव्यात्मक सेंस के साथ पढ़ा। “लगता है, मेरे एकांत गीत का अंत होगा तुम्हारे सीने पर...”
आँखें मूँदकर पीछे सीट पर सिर टिकाए रही। मोबाइल हथेलियों में फँसा हुआ था। मैसेज टोन बज रहे थे। थोड़ी संयत होकर मैंने व्हाट्सऐप फिर खोला। धड़ाधड़ कौशल के मैसेज एक साथ आए थे—
“एक ख़ालीपन है खलिहान में, धान की बोरियाँ चली जाने के बाद का।”
“सूना है मचान, सारे आम टूट जाने के बाद।”
“जैसे यात्री को पार कराने के बाद किनारे पर सूनी खड़ी नाव और अकेले बैठा है केवट।”
“पता था कि यात्री के साथ एक किनारे से दूसरे किनारे तक ही रिश्ता, फिर पता नहीं क्यों अंतरंग हो जाता है नाविक। एक दिन में कई बार।”
“पता नहीं ये सब। पर लगता है कि वह यात्री फिर आएगा।”
मैं अवाक्। खिड़की के बाहर के सारे दृश्य गड्डमड्ड हो गए थे। एक मैसेज और आया और उसके बाद सन्नाटा। गाड़ी के अंदर अभी भूपेन हजारिका का गाया अति पुराना गाना गूँज रहा था—“कोहुआ बन, मोर असांत मन...।” गाने कई बार मन को भाँपकर बजा करते हैं।
मैंने काँपती उँगलियों से खोला। “वापसी के रास्ते में महसूस हो रहा है कि भीतर कुछ बदल चुका है। दुख मिटा नहीं है, लेकिन उसकी तीव्रता अब उतनी नहीं रही। जैसे प्रकृति ने धीरे से मेरे कंधों पर हाथ रखकर कह दिया हो—“चलो, अब आगे बढ़ो।”
मेरे भीतर भय की लहर दौड़ी। जब भी किसी स्त्री पर ऐसा भावनात्मक दबाव बनाता है तो स्त्री की आज़ादी ख़तरे में पड़ जाती है। मेरा रोना थम गया। जो मुसाफ़िर मंज़िल के मोह में फँसते हैं, वे यात्रा नहीं करते। मेरी यात्रा तो अभी शुरु हुई थी।
मैंने उसे मैसेज भेजा—“मैं किसी के लिए कुछ नहीं हूँ, और यह ही मेरी सबसे बड़ी आज़ादी है” [काफ़्का]
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बेला पॉपुलर
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