दरअसल इस संक्राति-युग में भी; जो कवि मध्यवर्गीय मनःस्थिति को लेकर भावुकता से भरी हुई अनेक सफल कविताएँ लिख लेते हैं, उनके बारे में यह समझना चाहिए कि या तो वे वास्तविकता का अतिसरलीकरण करते हैं, अथवा वे उसकी उलझनों से घबड़ाकर ऊपरी सतह की रंगीनियों में रस लेते हैं।
खेल बच्चों का काम है और यह कोई मामूली काम नहीं है।
सिर्फ़ सामान्य लोग ही होते हैं, जिन्हें आप बहुत अच्छी तरह से नहीं जानते हैं।
‘सामान्यता’ एक पक्की सड़क है : इस पर चलना तो आरामदायक है, पर इस पर कोई फूल नहीं उगता।
एक सामान्य मनुष्य के मन पर सुंदर-असुंदर की जैसी प्रतिक्रिया होती है, वैसी ही प्रतिक्रिया एक कलाकार के मन पर भी होती है।
साधारण-सी चीज़ को विशेष भाव से अपना बना लेना और उसे फिर उसी उपाय से साधारण बना देना साहित्य का काम है।
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सामान्य जीवन जीने में जो परवशता है, वह अत्यंत अपमानजनक गति में निबद्ध है।
अत्यंत मामूली चीजों का भी अपना वजन होता ही है।