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कामकला पर उद्धरण

काम के परवश होने पर भी युवती, नायक से स्वयं संभोग की इच्छा प्रकट करे। क्योंकि स्वयं अपनी ओर से संभोग में प्रवृत्त होने वाली नायिका अपने सौभाग्य को खो बैठती है, अपनी प्रतिष्ठा नष्ट कर देती है, किंतु नायक की ओर से संभोग क्रिया का प्रयोग (उपक्रम) किए जाने पर अनुकूलता तथा उत्सुकता से स्वीकार कर ले।

वात्स्यायन

दाम्पत्य जीवन में संभोग-सुख को आनंदमय बनाने के लिए चौंसठ कलाओं का ज्ञान आवश्यक है।

वात्स्यायन

जब नायक-नायिका परस्पर शतरंज आदि खेल-खेल रहे हों, तो नायक नायिका से किसी बात पर बनावटी झगड़ा कर ले और झगड़ते हुए उसका हाथ इस प्रकार पकड़ ले कि मानो उसका पाणिग्रहण (विवाह) कर रहा।

वात्स्यायन

जिस प्रकार 'राजा है' अर्थात् राजा की विद्यमानता को जानकर दूर रहने वाली प्रजा, राजा के अनुशासन का उल्लंघन नहीं करती, उसी प्रकार कामशास्त्र को बिना पढ़े ही लोग कामशास्त्र के अनुशासन का पालन करते हैं।

वात्स्यायन

काम (कामकला) को कामसूत्र से तथा कामकला में निपुण नागरिक जनों से सीखना चाहिए।

वात्स्यायन

आलिङ्गनादि प्रासाङ्गिक सुख से अनुविद्ध; स्तनादि विशेष अंगो के स्पर्श से जो फलवती अर्थप्रतिति, अर्थात वास्तविक सुखोपलब्धि होती है—वह 'काम' है।

वात्स्यायन

यदि किसी कारणवश युवती सम्मत कलाओं की शिक्षा प्राप्त कर सके, अथवा विश्वसनीय योग्य शिक्षिका मिल सके या सीखने का अवसर मिले, तो उसे कामकला के किसी एक अंग की ही शिक्षा ग्रहण कर लेनी चाहिए।

वात्स्यायन

यदि पत्नी आलिंगन, चुम्बन आदि को प्रसन्नता से स्वीकार कर ले, तो मुख में ताम्बूल रखकर उसे दे। यदि वह उसे स्वीकार करे, तो प्यार भरी मीठी-मीठी बातों से आग्रह करे, गिड़गिड़ाए और क़सम दिलाकर पान लेने के लिए प्रार्थना करे।

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यदि पत्नी विवाह के पूर्व परिचिता है, तो उन्मत्तयौवना पत्नी का दीपक के प्रकाश में आलिंगन करना चाहिए और यदि विवाह के पहले दोनों का पूर्व परिचय हो, तो अभुक्तपूर्वा लज्जाशील बाला का अंधकार में आलिंगन करना चाहिए।

वात्स्यायन

चेष्टाओं और इशारों द्वारा अपनी भावनाओं को प्रकट कर चुकी नायिकाएँ, उचित स्थान और उचित समय पर नायक के आग्रह को मना नहीं कर सकतीं, और नायक की प्रार्थना स्वीकार कर संभोग के लिए तैयार हो जाती हैं।

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शास्त्र के मर्म को समझने वाली ऐसी अनेक गणिकाएँ, राजकुमारियाँ और अमात्यों एवं धनिकों की कन्याएँ भी हैं, जो कामकला एवं संगीतकला में स्वभावतः निपुण होती हैं।

वात्स्यायन

पति पत्नी को चौंसठ कलाओं की शिक्षा दे, उसके प्रति अपने अनुराग को प्रदर्शित करे और पहले मनोरथों, अभिलाषाओं और कल्पनाओं की चर्चा करे तथा 'भविष्य में जीवन भर मैं तुम्हारे अनुकूल रहूँगा, तुम्हारे कहने पर चलूँगा' इस प्रकार की प्रतिज्ञा भी करे और सपत्नियों (सौतों) के भय को दूर करे तथा यथासमय कन्याभाव से मुक्त युवती पत्नी के साथ बिना उद्विग्न किए रतिक्रीड़ा का उपक्रम करे।

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स्त्री-पुरुष का संभोगसुख, लज्जा और लोकभय से परतंत्र होता है अर्थात् उनमें लोक-लज्जा और लोक-भय होता है, वे स्वतंत्र रूप से संभोग में प्रवृत्त नहीं होते। अतः उसके लिए उपायों की अपेक्षा होती है और उन उपायों का ज्ञान शास्त्र से होता है।

वात्स्यायन

पुरुषों की भाँति स्त्रियों को भी कामशास्त्र और तदङ्गभूत सङ्गीतशास्त्र आदि विद्याओं का अध्ययन करना चाहिए।

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जो पुरुष नवविवाहिता कन्या के मनोभावों को समझता है, बिना सहसा (बलात) उपसर्पण (संभोग करने की चेष्टा) करता है—उससे कन्या भयभीत, त्रसित और उद्विग्न रूप से द्वेष करने लगती है।

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जिस प्रकार धर्म के ज्ञान के लिए धर्मशास्त्र और अर्थज्ञान के लिए अर्थशास्त्र का अध्ययन आवश्यक है, उसी प्रकार कामकला के ज्ञान के लिए कामशास्त्र का अध्ययन आवश्यक है।

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नायिका को अपनी ओर आकृष्ट करने के लिए, नायक नायिका की विश्वासपात्र सहेलियों तथा धाय की लड़की से मेल-जोल बढ़ाए। क्योंकि वे नायिका के मनोभावों को अच्छी तरह समझकर, उससे नायक के गुणों की प्रशंसा कर, नायक की ओर उसे आकृष्ट कर सकती हैं।

वात्स्यायन

जब नायक को यह विश्वास हो जाए कि मनोभिलाषित कन्या मुझे चाहती है, तो वह उस कन्या की प्राप्ति के लिए उपाए करे।

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