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नए साल की रात, 'पहल' की विरासत और अजित पुष्कल की स्मृतियाँ

शाम के सात बज चुके थे और अब इस समय पर लखनऊ के लिए बस पकड़ने का आशय यह होता कि रात के लगभग बारह बजे के आस-पास या उससे थोड़ा ज़्यादा समय पर ही लखनऊ पहुँच पाता। ऐसे में सिविल लाइंस से वापस लौटना ही सबसे बढ़िया निर्णय हो सकता था और मैंने उसी का चुनाव किया। रास्ते भर इयरफ़ोन के तारों से कान तक मेहदी हसन और ग़ुलाम अली की आवाज़ बार-बार रिपीट मोड पर लगातार आ रही थी और यह इसलिए भी ज़्यादा था क्योंकि चुंगी से शास्त्री पुल को पार करने में जहाँ पहले दस से पंद्रह मिनट लगता था, वहाँ अब माघ मेला के नज़दीक होने के कारण ऐसा जाम लगा था कि चालीस मिनट के ऊपर हो गए थे। जब पुल क्रॉस किया तब तक लगभग आठ बज चुके थे और अब तो वापस घर जाने के लिए हनुमान गंज से ऑटो रिक्शा मिलना मुश्किल ही था क्योंकि ठंड के दिनों में ग्रामीण क्षेत्रों से लगे क़स्बों में आठ बजे के बाद आवागमन लगभग बंद हो जाता है। ऐसे में झूँसी गोविंद (निषाद) भाई के रूम पर रात बिताना ही उचित लगा। वैसे भी उनसे मिले लगभग चार महीने से ऊपर हो गए थे। अंतिम बार ढंग से अगस्त में मुलाक़ात हुई थी और सच कहूँ तो मुझे उनके कमरे पर जाना अच्छा भी लगता है।

हाँ तो हम—यानी मैं शिवम (चौबे) और गोविंद रात के दस बजे के क़रीब अलोपीबाग़ चुंगी के पास मिले। हमें झूँसी ही जाना था। हम साथ निकले। जैसे ही स्कूटी पुल पर चढ़ी—गंगा के ऊपर से उठा कोहरा पुल को अपनी आगोश में ले चुका था। मुझे ‘गैंग ऑफ़ वासेपुर’ फ़िल्म का डायलॉग—“इतना गोली मारेंगे कि इलाक़ा धुआँ-धुआँ हो जाएगा…”। यह बोलकर पहले मैं, फिर हम दोनों हँसने लगे। दृश्यता दो मीटर भी नहीं रह गई थी। हम पुल पर ओझल हो चुके थे। जब सामने पेड़ दिखा तो लगा कि पुल अब ख़त्म हो गया। अब प्रतीक (ओझा) को बुलाते हैं—वह छह बजे से ठिठुरती ठंड में बैठा हुआ है।

एम.ए. के ख़त्म होने के बाद पीएचडी एडमिशन के लिए भटकने के पीड़ादायक आठ महीने मैंने (प्रतीक ओझा) झूँसी में ही बिताए थे। सुबह उठते ही गोविंद के कमरे पर मुँह उठाए पहुँच जाता था और फिर नाश्ता-पानी सब वहीं होता। मेरे पास एक तो नाश्ते के लिए पैसे नहीं होते थे और दूसरा गोविंद भाई से सुबह-सुबह कुछ कविताओं की बातचीत, कुछ प्रेम-संबंधों और कहीं पीएचडी में एडमिशन न होने का फ़्रस्ट्रेशन सब साझा कर पाता था। कुल मिलाकर उनका कमरा मेरे लिए उन आठ महीनों में मुझे मज़बूत बने रहने का ताक़त देता रहा। ख़ैर, मैं पुलिस चौकी से अपनी चिर-परिचित गलियों में पैदल चलते हुए उनके कमरे तक पहुँचा। टहलते-टहलते जब पहुँचा कि अचानक मन में एक मुस्कान तैरने लगी। हम जब किसी जगह रहकर चले जाते हैं, तब यदि सालों बाद भी लौटे तो भी उस रहे हुई जगह से जुड़ी यादों को वापस महसूस कर ही लेते हैं। ख़ैर कमरे पर पहुँचा तो देखा कि ताला जड़ा हुआ था। कॉल किया तो गोविंद भाई ‘सबद’ में थे और वह शायद नौ बजे तक ही आ पाते, लेकिन जब उन्होंने नौ कहा तो मैं समझ गया कि चालीस मिनट और मानकर ही चलता हूँ। एक आस्थावादी शहर में एक्स्ट्रा समय जोड़कर सब करना अब मेरी आदत में आ गया है। अब मैं क्या करता। गोविंद भाई तो थे नहीं कमरे पर। मैंने वापस वही उपक्रम चालू कर लिया। मेहदी हसन, ग़ुलाम अली, गुलाम अली, मेहदी हसन—यह चलता रहा लगभग दस बजने में पंद्रह मिनट पहले तक।

नौ पैंतालीस पर गोविंद भाई ने कॉल किया और बोला चाय के अड्डे पर आ जाओ। चाय का अड्डा—पुलिस चौकी से अंदर घुसते ही गुड़ की चाय की एक दुकान जहाँ हम तीन अकवि (गोविंद, प्रतीक और शिवम) ख़ुद को मज़ाक़ में झूँसी केंद्रित कवियों के ग्रुप के नाम से चाय पीने आते थे। ‘झूँसी गुट’ इसका नामकरण मैंने ही किया था। प्रज्वल (चतुर्वेदी) तो आज भी कहता है कि प्रतीक को मज़ाक़िया नामकरण करने में महारत हासिल है। ख़ैर जब मैं वहाँ पहुँचा तो शिवम भी वहाँ थे और लगभग साल भर बाद झूँसी केंद्रित कविता ने मुस्कान पाई। इस साल की अंतिम शाम गुज़रने वाली थी।

मैंने (गोविंद) कॉल करके प्रतीक को बुलाया और तब तक गुड़ की चाय की दुकान बंद हो चुकी थी।‌ अब हम अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के इलाहाबाद केंद्र के पास पहुँचे तो दुकान बंद ही होने वाली थी। मैंने दो गुडांग गरम सिगरेट माँगीं, उन्हें सुलगाया और बैठते ही बतकही शुरू हो गई। फिर हमने क्या-क्या बातें की उसका ज़िक्र करना यहाँ ज़रूरी नहीं है। बस कुछ बातें कह देता हूँ। मैंने प्रतीक से कहा, “यार तुम तो अब ऑफ़िसियल कवि हो गए हो, तो एकाध कस तो ले लो।”

प्रतीक ने कहा—“अरे भैया मैं नहीं पीता।”

शिवम—“अरे इसक में आने के बाद तो गुलाब-सा खिल गया है।”

गोविंद—“हाँ, गाल तो देखो—कैसा फूल गया है। अच्छा ई बताओ कि ये बिल्ली से कुत्तों का शौक़ कब से पाल लिया।”

प्रतीक—“अरे भैया जब बिल्ली ही नहीं रही तो उसका क्या ही करेंगे।”

गोविंद—“बात तो सही है गुरु लेकिन कुत्तों पर तो कोई कविता नहीं लिखी। यह भेदभाव क्यों?”

शिवम—“हाँ-हाँ सही बात है। एक कवि को ऐसा व्यवहार करना उचित नहीं है।”

साल की ठिठुरती ठंड की इस शाम को झूँसी केंद्रित समूह का केंद्रीय विषय वे बिल्लियाँ थीं—जिनकी तस्वीर प्रतीक अमूमन व्हाट्सअप के स्टेटस पर लगाता था। जिसका सार कुल मिलाकर यह था कि अधूरे प्रेम से उपजा हुआ बिल्लियों के प्रति झुकाव कुत्तों के तरफ़ कब झुकेगा?

“कब लिखी जाएगी कुत्तों पर कोई प्रेम कविता”, और मैं (प्रतीक) ग्रुप के दोनों सदस्यों की इन बातों पर केवल हँस सकता था क्योंकि कभी मैंने भी ग्रुप के किसी सदस्य का चाय पर मख़ौल उड़ाया ही था तो आज मेरी बारी थी। वो कहा जाता है न कि यदि तीन का समूह है तो एक का मज़ाक़ उड़ाया जाना तय है।

अब हमारी गुडांग गरम ठंडी पड़ चुकी थी। हमने रास्ता लिया कमरे पर जाने का।

अब आगे प्रतीक को सुनिए—फिर आगे आते हैं। आलू के पराँठे पैक करवाकर शिवम की स्कूटी से उसके रूम पर पहुँचे। पिछले साल जब मैं झूँसी में रहता था—तब कभी शिवम के घर नहीं जा पाया था। मुझे नहीं पता था कि शिवम, दिवंगत नाटककार-कवि अजीत पुष्कल के घर में रहते हैं। वह कई सालों से यहीं रह रहे थे और उन्होंने बताया कि कुछ महीनों के लिए वह घर उन्हें ख़ाली करना है क्योंकि आगे के हिस्से का पुनर्निर्माण होना है। मैं देख पा रहा था कि उस घर से शिवम के भीतर पुष्कल जी की कितनी यादें जुड़ी हैं। यह उनके लिए एक कठोर निर्णय होगा, पर यह उन्हें लेना ही है और आशा है कुछ महीनों बाद सब सामान्य हो जाएगा।

हमारे पराँठे खाने तक लगभग साढ़े ग्यारह बज गए थे, यानी बस आधे घंटे बाद नया वर्ष आने वाला था। हम साथ में नए साल की शुरुआत करना चाहते थे। लेकिन मैं (गोविंद) कहना चाह रहा हूँ कि नए साल के आने का कोई उल्लास मुझमें नहीं था। मुझे कोई फ़र्क़ ही पड़ता कि कौन-सा साल जा रहा है और कौन-सा आ रहा है। ख़ैर शिवम ने चाय बनाई कि बचा हुआ आधा घंटा जल्दी बीत जाए। और फिर हमने हाथ में चाय लेकर वापस प्रतीक का मज़ाक़ उड़ाते हुए समय के बीत जाने का इंतज़ार शुरू किया। वैसे हम प्रतीक का कोई मज़ाक़ नहीं उड़ा रहा थे—बस उसे उत्साहित कर रहे थे कि किसी एक बिल्ली के चले जाने से दुनिया ख़त्म नहीं हो जाती। अभी तो यार बालक हो। परीक्षक के तौर पर जो सुंदर बिल्ली दिखे तो उसे कहना कि तुम्हारे बाल बहुत सुंदर है—मैं इसे और घना बना सकता हूँ।

बात करते हुए मेरी (प्रतीक) निगाह कमरे में लगी पेंटिंग्स पर पड़ी। वे प्यारी थीं और ख़ूबसूरत भी। इसलिए मैंने उनकी तस्वीर गोविंद भाई के कहने पर ले ही ली। तब तक बाहर से पटाख़ों की आवाज़ आने लगी। हम समझ गए कि नया साल आ गया। हम ख़ुश थे, क्यों बस एक साल और हम यूँ ही बर्बाद करने वाले थे। एक-दूसरे से गले मिलते हुए हमें पता था कि पुराने साल की तरह नए साल में भी कुछ ख़ास अलग नहीं होने जा रहा। एक ऐसे देश में जहाँ... ख़ैर बेमतलब का हर जगह पॉलिटिकल क्या ही होना! कुल मिलाकर हमें पता था कि जीवन के आने वाले ऐसे कितने ही साल इसी तरह होने वाले हैं—उदास, दुख और पीड़ाओं के बीच छोटी-छोटी ख़ुशियाँ लिए हुए। ठीक ऐसी ख़ुशियाँ जैसी हमारे पास इस समय थी—साथ होने की ख़ुशी।

शिवम ने मुझे पेंटिंग की फ़ोटो खींचते हुए देखा तो उन्हें जैसे कुछ सहसा याद आ गया। वह हमें बग़ल के कमरे में ले गए और वहाँ की लाइटें जला दी और कहा कि यहाँ कि पेंटिंग की फ़ोटो लो। मैंने (गोविंद) प्रतीक को एक पेंटिंग की तस्वीर लेने को कहा जिसमें कई रंगों के बीच किसी मोहक स्त्री के लाल और गुलाबी होंठ थे। मैंने प्रतीक से कनखियों से आँख मारी और बोला, “भाई होंठ इतने सुंदर हैं तो स्त्री कितनी सुंदर होगी।” मैंने प्रतीक को कुछ अतरंगी-सी तस्वीर लेने को कहा। तीनों ठहरें किताब प्रेमी। प्रतीक और मुझे शिवम ने इशारा किया कि ये कुछ पुरानी पत्रिकाएँ हैं जो कल मैंने छाँटी हैं।

किताब प्रेमी अब पेंटिंग्स पर निगाह कैसे ही जमा पाते क्योंकि वहाँ तो पूरा ख़ज़ाना पड़ा हुआ था। वहाँ अजित पुष्कल जी द्वारा उपयोग की हुईं लगभग सैकड़ों किताबें और पत्र-पत्रिकाएँ ज़मीन पर रखी थीं। ज़मीन पर इसलिए क्योंकि इन किताबों को उनका परिवार कहीं ले जाना चाहता था लेकिन शिवम ने कुछ जो काम के लगे—उन्हें रख लिया था। हम (गोविंद और प्रतीक) पूरे कमरे में निगाह दौड़ाने लगे। कितना कुछ था उस कमरे में स्वातंत्र्योत्तर कहानी कोश से लेकर मराठी लेखकों की कहानियों के अनुवाद तक। ऐसा साहित्य जो लगभग अब मिलना थोड़ा-सा मुश्किल है।

सबसे बड़ा सुख कोने में पड़े दूर से ही दिखाई देने वाली ‘पहल’ की मूल प्रतियों का समूह था। हम तो ख़ुशी से उछल-से पड़े क्योंकि इसकी मुझे आशा नहीं थी। आठवें दशक के ‘पहल’ अंक 21 से आधुनिक समय के ‘पहल’ अंक 67 के बीच लगभग ग्यारह के आस-पास अंक हमें मिलें—जिन्हें शिवम ने सँभाल कर रखा था।

यक़ीनन उन्हें सँभालना ज़रूरी भी है क्योंकि ‘पहल’ अब धीरे-धीरे अतीत हो गई है। ख़ासकर उसके पुराने अंक अब खोजने से भी नहीं मिलते। ऐसे में कुछ पुराने विशेषांकों को भी देख पाना एक सुखद अनुभव था। हालाँकि अब उनकी हालत उतनी अच्छी नहीं थी, पर फिर भी उनके सभी पृष्ठ सुरक्षित थे। समकालीन कविता विशेषांक, कहानी विशेषांक ही हमने वहाँ नहीं देखा, बल्कि विश्व साहित्य को ध्यान में रखकर निकली बांग्लादेश साहित्य विशेषांक और अफ़्रीकी साहित्य विशेषांक ने मेरा ध्यान अपनी ओर खींचा। साथ ही मैथिली कविताओं पर निकली ‘पहल’ पुस्तिका भी हमारे हाथ में थी। गोविंद भैया तो अफ़्रीकी कविता विशेषांक में डूब से गए और मैं (प्रतीक) समकालीन कविता विशेषांक का संपादकीय ही पढ़े जा रहा था और वाक्यों को शिवम और गोविंद भैया को सुनाए जा रहा था।

मेरा (गोविंद) तो अफ़्रीकी साहित्य विशेषांक को देखकर मन तब खिल उठा, जब मैंने देखा कि उसमें वि-औपनिवेशीकरण की प्रक्रिया पर एक बड़े अफ़्रीकी साहित्यकार का साक्षात्कार प्रकाशित था। उसे पढ़कर मैं भारत में वि-औपनिवेशीकरण के उभरे विमर्श को सरसरी तौर पर एक बार सोचा तो लगा कि यह अंक किसी हीरे से कम नहीं है।

हम इन्हें देखकर ख़ुश थे और आश्चर्यचकित भी क्योंकि अपने कुछ ही अंकों में ‘पहल’ ने हमें यह आभास करा दिया कि वह सिर्फ़ भारतीय साहित्य को ही केंद्र में नहीं रख रही थी, बल्कि उसके विषय इस उपमहाद्वीप के पड़ोसी देशों और वैश्विक साहित्य से लेकर भारत के अन्य क्षेत्रीय भाषाओं तक भी फैले हुए थे। यह यक़ीनन एक बड़ी बात थी। यह इतना आसान नहीं है जितना दिखाई देता है क्योंकि यदि इतना आसान होता तो शायद ‘पहल’ के उत्तरवर्ती पत्रिकाएँ इस तरह का विस्तृत विषयों के कैनवास को कब का बना चुकी होती। शायद यही कारण रहा कि ‘पहल’ आज भी साहित्यकारों के भीतर सम्मानित बनी हुई है।

पत्रिकाओं को पलटते हुए एक अंक में गोविंद को अजीत पुष्कल के लिए लिखा एक पत्र मिला और कुछ देर बाद मुझे भी एक अंक में उसी तरह का एक पत्र दिखाई दिया। यह कुछ अलग था। पत्रिकाओं के भीतर बहुत ही सलीक़े से रखे गए अंतर्देशीय पत्र। आज जब सूचनाओं का इतना पहाड़ है, तब पुराने सहेजे हुए पत्र देखते हुए यह महसूस होता है कि सूचनाओं की जो सुविधा हमें मिली है, उन्हें नहीं मिली थी। उनके लिए उन पत्रों में लिखे हर शब्द के मायने कितनी भावनाओं लेकर आते होंगे—यह हमारी कल्पना के भी परे है। हम तो बस अनुमान लगा सकते हैं। जो दुख हमने नहीं झेला होता उसका अनुमान झूठा अनुमान होता है। इसलिए न झेले गए दुख की कल्पना हम इकट्ठा भी नहीं कर पाते और न ही सुख की कल्पना की वास्तविकता तक पहुँच पाते हैं। यह सभी के हिस्से आता है। उन्हें भी कुछ चीज़ें उतनी ही सुलभ होंगी जितनी आज हमारे पास संदेश है। इन पोस्ट कार्ड पर लिखे पत्रों को पढ़ते हुए एक अजीब-सी अकुलाहट दिल में भर गई। हम सूचना प्रसार के जिस दौर में हैं—वहाँ पर हम अपनी भावनाएँ एक-दूसरे को साझा करने में हिचकते हैं। भयाक्रांत होते हैं कि किसी से अपनी भावनाएँ साझा करने में। फिर इस सूचना-प्रौद्योगिकी का हम क्या करें? रील्स देखें। यह सही काम है। भावनाएँ रील्स में ही भर गई हैं। हमें मनुष्य कम रील्स ज़्यादा भावुक कर रही हैं। तो इन पोस्टकार्ड को मैंने निगाहें भर-भर कर देखा। शब्दों की लिखावट में भावनाओं को उभरते देखा।

हम इधर-उधर कुछ देख ही रहे थे कि प्रतीक को अजित जी की टेलीफ़ोन डायरी मिली। उसे खोल कर देखने पर कमलेश्वर, ममता कालिया, अब्दुल बिस्मिल्लाह, हरिश्चंद्र पांडे, नामवर सिंह, ज्ञानरंजन आदि जैसे कई प्रसिद्ध साहित्यकारों का टेलीफ़ोन नंबर उनके पते के साथ लिखा मिला। यह कितना सुंदर था क्योंकि अब न तो टेलीफ़ोन है और न ही टेलीफ़ोन प्रयोग करने वाले। डायरी के फ़ोन नंबर को देखकर उसके संबंधियों, मित्रों आदि जस के तस एक याद की तरह उनकी डायरी में उभरने लगे—ऐसे कि जैसे हम किसी को टेलीफ़ोन मिलाने ही वाले हों।

जैसे ही शिवम ने इस कमरे में नागार्जुन के आकर ठहरने का ज़िक्र किया तो हमारे रोम-रोम पुलकित हो उठे। मैं (गोविंद) तो भावविभोर ही हो गया कि यह कमरा किसी तीर्थ से कम नहीं है। मैंने दीवारों को छुआ कि कोई छुअन तो उनकी अभी भी यहाँ बची होगी। अगर विरासत की अवधारणा को व्यापकता में देंखे तो ठीक से यह जगह एक विरासत है। हम इन विरासतों के प्रति बहुत उदासीन होते हैं। इलाहाबाद में ही कितनी विरासतें धूल-धूसरित हो गई हैं, लेकिन किसी विरासत को बचाने की चिंता शायद ही किसी को हो। हम तस्वीरें लेने से कैसे चूक सकते थे। सबने वहाँ बैठकर तस्वीरें लीं तो शिवम ने कहा कि अरे नागार्जुन यहाँ सोते भी थे। हम हँसने लगे। वहाँ से निकलते हुए महसूस हुआ कि नए वर्ष की इससे ख़ूबसूरत शुरुआत शायद ही किसी वर्ष हुई हो।

अब नया वर्ष आए एक घंटा हो चुका था। हम उस कमरे में वर्ष का पहला घंटा बिता चुके थे। अब रात के लगभग एक बज चुके थे और झूँसी केंद्रित कवियों का यह समूह भूतों की तरह ख़ुशी से उछल रहा था। कुछ तो था जो अलग हुआ था। हमें पता था कि इस घर का यह कोना अब पुनर्निर्माण में बदल जाएगा। यहाँ रहने वाले अजित पुष्कल की साँसों से रचा-बुना यह कमरा भले रहे न रहे उनके द्वारा उपयोग की गई किताबों, पत्रों और टेलीफ़ोन डायरी में उनकी साँसों का रचा-बुना बचा रहेगा। हमने संकल्प लिया कि हम इन पत्रों को सुरक्षित रखेंगे—पीढ़ी-दर-पीढ़ी। फिर भले ही वह इलेक्ट्रॉनिक रूप में परिवर्तित करके ही क्यों न किया जाए। इसी तरह तो किसी के जाने के कई सालों बाद भी बचता है एक रचनाकार का जीवन। उस बचे हुए की मूल प्रति, उनके ही हाथों से छुए गए वे समान सभी को हम देख पाए और संभव है कुछ का उपयोग भी कर पाए तो बड़ी बात है। रचनाकार कुछ ऐसा भी सौंप ही देता है आने वाली पीढ़ी को जो कुछ न कुछ रचनात्मक होता है। इसी भावनाओं के तंतुओं पर खड़ा साहित्य-संसार कभी जर्जर होकर गिरता नहीं। फलता-फूलता रहता है।

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यह संस्मरणात्मक गद्य प्रतीक ओझा, गोविंद निषाद और शिवम चौबे द्वारा संयुक्त रूप से लिखा गया है।

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