स्तन पर दोहे

गज बर कुंभहिं देखि तनु, कृशित होत मृगराज।

चंद लखत बिकसत कमल, कह जमाल किहि काज॥

हाथी के कुंभस्थल को देखकर, सिंह दुबला क्यों हो रहा है? और चंद्रमा को देखकर कमल क्यों विकासत हो रहा है? इन विपरीत कार्यों का क्या कारण है? अभिप्राय यह है कि नायिका के हाथी के कुंभस्थल समान स्तनों को बढ़ते देखकर सिंह अर्थात् कटि प्रदेश दुबला हो गया है। नायिका के चंद्रमुख को देखकर, नायक के कमल रूपी नेत्र विकसित हो जाते हैं।

जमाल

मतवालो जोबन सदा, तूझ जमाई माय।

पड़िया थण पहली पड़ै, बूढ़ी धण सुहाय॥

हे माता! तुम्हारा दामाद सदा यौवन में मस्त हैं। उन्हें पत्नी का वृद्धत्व नहीं सुहाता। इसलिए पत्नी के स्तन ढीले पड़ने के पहले ही वे अपना देहपात कर डालेंगे। अर्थात्

प्रेम और शौर्य दोनों का एक साथ निर्वाह वीरों का आदर्श रहा है।

सूर्यमल्ल मिश्रण

नैणाँ का लडुवा करूँ, कुच का करूँ अनार।

सीस नाय आगे धरूँ, लेवो चतर जमाल॥

हे नागर, मैं नतमस्तक होकर लड्डू-समान नेत्रों और बंद अनार जैसे दृढ़ कुचों को आपके सम्मुख समर्पण करती हूँ, आप इन्हें स्वीकार करें।

जमाल
  • संबंधित विषय : आँख

राते पट बिच कुच-कलस, लसत मनोहर आब।

भरे गुलाब सराब सौं, मनौ मनोज नबाब॥

विक्रम

सेत कंचुकी कुचन पै, लसत मिही चित चोर।

सोहत सुरसरि धार जनु, गिरि सुमेर जुग और॥

विक्रम

मोरि-मोरि मुख लेत है, नहिं हेरत इहि ओर।

कुच कठोर उर पर बसत, तातै हियो कठोर॥

विक्रम

झीनें अंबर झलमलति, उरजनि-छबि छितराइ।

रजत-रजनि जुग चंद-दुति, अंबर तें छिति छाइ॥

दुलारेलाल भार्गव

नयन रँगीले कुच कठिन, मधुर बयण पिक लाल।

कामण चली गयंद गति, सब बिधि वणी, जमाल॥

हे प्रिय, उस नायिका के प्रेम भरे नेत्र अनुराग के कारण लाल हैं। उन्नत स्तन, कोयल-सी मधुर वाणी वाली सब प्रकार से सजी हुई गजगामिनी कामिनी चली जा रही है।

जमाल

कटाछ नोक चुभी कियों, गडे उरोज कठोर।

कें कटि छोटी में हितू, रुची नंदकिशोर॥

हे सखी! प्रिय के कहीं मेरे कटाक्षों की नोक तो नहीं चुभ गई है? कहीं मेरे कठोर उरोज तो उनके नहीं गड़ गए हैं? अथवा मेरी कटि ही छोटी है जिसके कारण मैं नंदकिशोर को पसंद नहीं आई, बात क्या है?

दयाराम

ल्याई लाल निहारिए, यह सुकुमारि विभाति।

उचके कुच कच-भार तें, लचकि-लचकि कटि जाति॥

रामसहाय दास

गसे परसपर कुच घने, लसे वसे हिय माहिं।

कसे कंचुकी मैं फँसे, मुनि मन निकसे नाहिं॥

विक्रम

विधु बरनी तुव कुचन की, पाय कनक सी जोति।

रंगी सुरंगी कंचुकी, नारंगी सी होति॥

रसलीन

अगर चँदण की सिर घड़ी, बिच बींटली गुलाल।

एक दरसण हम कियो, तीरथ जात जमाल॥

अगर और चंदन के दो घड़े, जिन के मध्य में गुलाल (लाल रंग) की बीटली (गाँठ) थी, तीर्थ यात्रा को जाते हुए ऐसे दृश्य के दर्शन हुए। गूढ़ार्थ यह है कि कवि ने किसी स्त्री के अगर तथा चंदन से चर्चित कुचों को देखा, जिनकी घुंडी लाल रंग से रँगी थीं। स्वेत, श्याम, और लाल रंग से सौंदर्य प्रेमी कवि को त्रिवेणी (गंगा, यमुना और सरस्वती) के दर्शन हो गए, तब भला वह तीर्थ जाने की यात्रा का क्यों कष्ट झेलता?

जमाल