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आत्म पर कविताएँ

आत्म का संबंध आत्मा

या मन से है और यह ‘निज’ का बोध कराता है। कवि कई बातें ‘मैं’ के अवलंब से कहने की इच्छा रखता है जो कविता को आत्मीय बनाती है। कविता का आत्म कवि को कविता का कर्ता और विषय—दोनों बनाने की इच्छा रखता है। आधुनिक युग में मनुष्य की निजता के विस्तार के साथ कविता में आत्मपरकता की वृद्धि की बात भी स्वीकार की जाती है।

दुर्दिन है आज

ओसिप मंदेलश्ताम

हिंदू वाली फ़ाइल्स

बच्चा लाल 'उन्मेष'

दर्द

सारुल बागला

मेरा गला घोंट दो माँ

निखिल आनंद गिरि

विषम राग

प्रत्यूष चंद्र मिश्र

ज़िंदा बच गया

तादेऊष रूज़ेविच

कौन?

ज़ाविएर अब्रील

स्वप्न में

रॉबर्तो बोलान्यो

अल्ताज़ोर

विसेंते उइदोब्रो

ऊब

पाब्लो नेरूदा

भव्यता के विरुद्ध

रविशंकर उपाध्याय

वह जहाँ है

अखिलेश सिंह

एक धुन

आशीष त्रिपाठी

आत्मलीन

ओक्ताविओ पाज़

एक संपूर्णता के लिए

पंकज चतुर्वेदी

एक तिनका

अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध'

भूत

ची: अे:

बिना अंत की कविता

येहूदा आमिखाई

भूमिका

मार्टिन कार्टर

दो अजनबी

महमूद दरवेश

हे ख़ुदा!

ओसिप मंदेलश्ताम

गुहा

बुलेंद एजेविद

दूसरी स्वतंत्रता

द्रागो इवानीषेविच

कल, मौत के बारे में सोचते हुए

निकोलाय ज़बोलोत्स्की

पहिया बदलना

बेर्टोल्ट ब्रेष्ट

सिर्फ़ एक जन्म

प्रसन्न कुमार महांति

हुआ यह

बेला अख़्मादूलीना

गीत

अन्तोन्यो रिनाल्दी

एक चीख़

एलिज़ावेता बाग्रयाना

असंगति

दोरा गाबे

केवल बाल पुस्तकें पढ़ना

ओसिप मंदेलश्ताम

एक गट्ठर

ओसिप मंदेलश्ताम

चीड़ के वृक्ष

किरसी कुन्नस

कुछ वैसा ही

निकानोर पार्रा

दीवार पर नाम

गियोर्गी ज्यागारोव

नौका-विहार

कोराँदो नले रोक्शलो

मैं वापस नही आऊँगा

हुआन रामोन हिमेनेज़

मुझे नहीं मालूम

अर्नेस्तो कार्देनाल

पतझड़ की शाम

सर्गेई येसेनिन