नगर, पत्तन, बड़े ग्रामों में जहाँ पर सज्जनों की बस्ती हो, सज्जन पुरुषों का सहवास हो, जहाँ पर जीविका के साधन सुलभ हों, जीवनोपयोगी सभी साधन सरलता से मिल जाएँ और सुरक्षा की समुचित व्यवस्था हो—उस स्थान पर नागरक को अपना निवासस्थान बनाना चाहिए।
अपराह्न में तीसरा पहर गोष्ठी-विहार में जाने के लिए उपयुक्त है। नागरक को वहाँ वस्त्रालंकार से सज-धज कर जाना चाहिए।
भारत में आर्य जाति के लोग पहले अरण्य-निवासी थे, फिर ग्रामवासी हुए और उसके बाद नगरवासी।
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आधुनिक और प्रासंगिक बने रहने के लिए ज़रूरी है कि पानी, वायु, मिट्टी जैसे विषयों पर कुछ-कुछ बोलते रहा जाए, पर दबाव बनाने से परहेज किया जाए। यही अच्छे नागरिक का गुण है।
सामान्य नागरिक होने का अर्थ है जीवन के घिरते हुए क्षितिजों में गाने सुनकर गुज़ारा कर लेना, बार-बार बीमार पड़ने पर भी यह विश्वास मन में रखना कि समस्या सार्वजनिक है, फिर भी साध्य है।