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मेरी रचनात्मकता, मेरे द्वंद्व

कहते हैं कला आत्मा का फूल होती है। हाँ होती है, पर यह फूल किसी सरोवर में नहीं, किसी दलदल में, किसी कीचड़ में ही खिलता है। उसकी ख़ूबसूरती देखकर आप क़तई अंदाज़ा नहीं लगा सकते कि वह किन परिस्थितियों में प्रस्फुटित हुआ है?

हमारे लेखन का हमारे जीवन से उतना ही गहरा रिश्ता होता है, जितना किसी वृक्ष का उसकी मिट्टी, वहाँ के मौसम और वहाँ के हवा-पानी से। हम क्या हैं, कैसे हैं, क्यों हैं—इसका निर्धारण बहुत कुछ हमारे बचपन में हो चुकता है। अपने प्रयत्नों से हम बाद में इसे घटाते-बढ़ाते रहते हैं।

हमने काफ़्का को बहुत पढ़ा है। हम उनकी बहुत बातें करते हैं। उनकी हताशा की, उनकी निराशा की, उन्हें लिखते वक़्त मौत जैसा एकांत पसंद था, वगैरह-वगैरह। काफ़्का को मैं जब भी पढ़ती हूँ, अपने भीतर इतने गहरे गिर जाती हूँ कि मुझे वहाँ से निकलने में बहुत वक़्त लग जाता है। काफ़्का ऐसे क्यों थे? क्यों वह निराशा का आख़िरी तल पसंद करते थे? इसके पीछे के कारण को जानने के लिए चलिए आपको उनके बचपन में ले चलती हूँ...

काफ़्का के पिता बहुत ग़ुस्से वाले और क्रूर थे। काफ़्का उनसे बहुत डरते थे। जब काफ़्का सात या आठ बरस के थे, एक रात उनके पिता अपनी पत्नी के साथ सेक्स करना चाहते थे। उन्होंने काफ़्का को दूसरे कमरे में जाकर सोने का हुक्म दिया, पर काफ़्का अपनी माँ के साथ ही सोना चाहते थे। उन्होंने दूसरे कमरे में जाने से इनकार कर दिया और रोने लगे। उनके पिता इतने क्रुद्ध हुए कि उन्होंने पकड़ी उनकी बाँह और बालकनी में बाहर धकेलते हुए अपने कमरे का दरवाज़ा बंद कर दिया। सेक्स के बाद दोनों को नींद आ गई, वे काफ़्का को भूल गए। सुबह तक काफ़्का ठंड में नीले पड़ गए थे और बालकनी में बेहोश पड़े थे।

इस घटना ने काफ़्का को हमेशा के लिए बदल दिया। उन्होंने एक ही रात में बर्फ़ जैसी ख़ामोशी और मौत जैसे सन्नाटे को जी लिया था।

चलिए मैं अब आपको अपने बचपन में ले चलती हूँ। बचपन से जवानी तक की कहानी बहुत तवील है। इस तवील कहानी को कम लफ़्ज़ों में कैसे कहूँ?

मेरे भीतर बचपन के कई दृश्य हैं... कुछ उन सपनों के, जिन्हें मैंने जिया ही नहीं था... भीतर की दीवारों पर उनके हल्के-हल्के तैरते चित्र उभरते थे... जैसे जीवित स्मृतियाँ हवा में तैर रही हों। यहाँ मेरी आत्मा की न जाने कितनी कहानियाँ दफ़्न हैं... अपने भीतर के दर्पण में अपना चेहरा नहीं दिखता था... एक उलझी-सी परछाई किसी बच्ची की... अँधेरे का द्वार खटखटाती हुई...

हम घर में ख़ूब सारी लड़कियाँ थीं, अनचाही और अनसमझी। घर में हमारी ख़ूब बेक़द्री होती थी। हम दिन भर फटी हुई गेंद की तरह उनके जूतों जैसे शब्दों की मार से ख़ुद को बचाने की व्यर्थ कोशिशों में पूरे घर में छिपते रहते थे। हमने पैदा होने का पाप कर लिया था और अब बाक़ी का जीवन सज़ा की तरह कटने वाला था। सारा दिन घर की चक्की में पिसने के बावजूद, किसी की आँखों में अपने लिए रत्ती भर भी प्रेम हमने देखा नहीं था। दो भाई थे, जो अपने पुण्यों के प्रताप से पैदा हुए थे। इसी प्रताप से सारा घर उन्हीं की सेवा में जुटा रहता था। ‘बेटे, मिट्टी के भी अच्छे।’ सब उनकी बलाएँ लेते। माँ और दादी हर वक़्त एक-दूसरे से लड़तीं और अपना ग़ुस्सा हम पर निकालतीं, कभी गालियों की शक्ल में, कभी मार की शक्ल में। माँ बहुत मारतीं और मार मैं इसलिए भी ज़्यादा खाती थी कि मुझे ठीक से पापड़ बनाना नहीं आता था। माँ उँगलियाँ तोड़ डालतीं। इतना ठोंकती कि दिनों भीतर-बाहर दुखता था।

अपने लिए एक अच्छा वाक्य सुनने को हम तरसते। हमारे हर काम में उनको सैकड़ों नुक्स दिखते। इसी बेक़द्री के कारण ढेला भर आत्मसम्मान भी मुझमें पैदा हो न पाया। सुंदरता की तो छोड़िए, किसी ने कभी यह तक न कहा कि तुम खाना अच्छा बना लेती हो या कपड़ों में स्त्री अच्छी कर लेती हो। हम ‘कुछ नहीं’ थे और ‘कुछ नहीं’ से ‘कुछ’ होने की कोशिशों में जीवन के न जाने कितने बरस खप गए।

सभी बहनों ने परिस्थितियों से समझौता कर लिया था। वे कभी शिकायत नहीं करती थीं, पर जाने क्यों सिर्फ़ मैं ग़ुस्से और दुख से भरी रहती थी। मेरे पास वहाँ से भागने का एक ही वसीला था—किताबें। किताबें मुझे उस दुनिया की सैर करवाती थीं, जो हमारी दुनिया से बेहद मुख़्तलिफ़ और असरदार थी। क्या पता वे मुझमें कोई उम्मीद जगाती हों। 25 पैसा किराये पर कोई भी किताब मिल जाती थी, मैंने कोई भी किताब से पढ़ना शुरू किया—गुलशन नंदा से लेकर अमृता प्रीतम तक, रवींद्रनाथ टैगोर से लेकर गुरुदत्त तक।

मेरी माँ को किताबों से शदीद नफ़रत थी। उनकी नज़र में यह वक़्त की बर्बादी थी। शादी के बाद यह थोड़े काम आएगा? खाना बनाओ, क्रोशिया काढ़ो, पापड़ बनाओ, स्वेटर बनाओ, कपड़े सिलना सीखो। हम यह सब भी करते थे। मैं बहुत तेज़ी से काम करती क्योंकि मुझे अपने लिए समय बचाना होता।

मेरे भीतर न जाने क्यों किताबों की भयानक भूख थी। मैं उन्हें छूकर देखती, सूँघ कर देखती, उन्हें क़रीने से रखती। खोलकर कहीं से भी पढ़ने लगती। राशन के लिफ़ाफ़े खोलकर पढ़ती, जो काग़ज़ जहाँ से मिल जाता। समझ में आने का सवाल नहीं था, साथ रहने का सवाल था। मेरी इस कमज़ोरी को सब समझते थे। चूल्हे पर दाल चढ़ाकर, पीढ़े पर बैठकर जब मैं गर्दन झुकाए किताब पढ़ती तो माँ पीछे से आकर किताब छीन लेतीं और चूल्हे में झोंक देतीं, किताब जल जाती। कभी बाहर आँगन के किसी कोने में पकड़ लेतीं तो किताब छत पर फेंक देतीं, मैं भाई से मिन्नतें करती रहती कि छत से उतार दो। एहसान करते हुए वह उतार देते। किराए की किताबें थीं, फट जातीं या जल जातीं तो पैसे भरने पड़ते और फिर पैसे भी किससे माँगे?

किताबों से मुहब्बत होने के कई कारणों में से एक था, मेरा एक हिस्सा निहायत घरेलू काम निपटा रहा होता, दूसरा हिस्सा किरदारों के साथ जाने कहाँ-कहाँ की सैर कर आता, जाने कितनी ज़िंदगियाँ जी आता। वे अपनी हक़ीकत से फ़रार होने में मेरी मदद करतीं।

मैंने लिखना उसी वक़्त शुरू किया था। छोटी-छोटी कविताएँ या जिसे तुकबंदी भी कहते हैं, खाना बनाते हुए पीढ़े के नीचे कोई कॉपी और पेन रख लेती, कॉपी के पिछले पन्नों पर लिखती और बाद में फाड़ कर फेंक भी देती। कभी अपनी उन कविताओं से प्रेम नहीं हुआ, वे मेरी ही तरह ‘कुछ नहीं’ थीं।

क़िस्सा कोताह यह कि मैंने मैट्रिक किया ही था कि मेरी शादी कर दी गई, मेरी इच्छा के ख़िलाफ़। बहुत रोई-गाई, किसी को सुनाई नहीं दिया। ससुराल मायके से भी बदतर। ज्वाइंट फ़ैमिली। सात ससुर, सात सास, उनके बेटे-बहुएँ। मेरी सास के छह बच्चे, उनकी मैं सबसे बड़ी बहू। कुछ पास-पास, कुछ साथ-साथ रहते। हरेक सास को अपने किए का हिसाब देना होता। सब नज़र रखतीं हमारे कामों पर। ख़ूब सारा खाना बनता। दिन भर कोयला झोंक-झोंक कर सिगड़ी जलाते और अपने दिनों को कोयले की राख से माँजते। हर दिन का चेहरा धीरे-धीरे और मैला होता जाता। भीतर फैला अँधेरा और निराशा और घनी होती जाती। अब अँधेरे का दरवाज़ा खटखटाती बच्ची भी नहीं दिखती थी।

कहीं कोई उम्मीद नहीं थी, पर पढ़ना यहाँ भी छूटा नहीं था। किसी काम से घर से निकलती तो हिन्द पॉकेट बुक्स की पतली-पतली किताबें ख़रीद लात्ती। रात को नाईट लैंप की रौशनी में पढ़ती और अपने कपड़ों के नीचे छिपाकर रखती। फिर भी असावधानी वश किसी न किसी को दिख ही जाती और बात पूरे मोहल्ले को पता चल जाती। मोहल्ला कहीं बाहर नहीं था, घर ही मोहल्ला था। मैंने तो कभी अपनी बहनों से भी दिल की बात नहीं की थी, यहाँ भी चुपचाप अपना काम करती रहती। उन्हें पर छूट थी कि वे किसी भी बात पर मेरा अपमान कर सकते थे। आत्मसम्मान तो अभी तक पैदा ही नहीं हुआ था, पर भीतर तकलीफ़ बहुत होती थी। रोने के लिए जगह चाहिए हो तो बाथरूम में जाओ, नल चालू करके जितना रोना हो, रो लो फिर नहाकर बाहर निकल आओ। ये औरतों के सीने में आँसू बनाने की फ़ैक्ट्री क्यों होती है?

मैं ख़ुद को साफ़-साफ़ दो हिस्सों में बँटा हुआ महसूस करती। एक बाहरी व्यक्तित्व, जो अपनी ड्यूटी निभा रहा होता, दूसरा भीतर का छाया व्यक्तित्व, जहाँ अनजियी आकांक्षाएँ थीं, जो भीतर उठतीं, जिन्हें न किसी से कहा जा सकता है, न दबाया जा सकता है। बाहरी हिस्सा घर की ज़िम्मेदारियाँ उठाता, अपना काम कर रहा होता, भीतर का हिस्सा लगातार विद्रोह कर रहा होता। विद्रोह को बाहर लाने का साहस न था। अपने कायरता से नफ़रत थी। अपने आपसे नफ़रत थी–‘छिः... जा मर जा!’ मैं ख़ुद से हज़ार बार कहती।

इस तकलीफ़ से उबरने के लिए मैंने आगे पढ़ने का हौसला किया, इस तरह कि पढ़ भी लूँ, किसी को पता भी न चले। मुश्किल था पर मैंने रास्ता निकाला। पति अपने काम के सिलसिले में रायपुर से बाहर ही रहते। वह ख़ुद चाचाओं में दबाव में जी रहे थे, अपनी मदद तो कर नहीं पा रहे थे, मेरी क्या करते? मुझे उनसे कोई उम्मीद भी नहीं थी। पिछले दो सालों में मुझे समझ आ गया था कि यहाँ जो भी करना है, ख़ुद करना है और घर का काम करते हुए ही करना है। बहुत सोचकर मायके से प्रायवेट फ़ॉर्म भर लिया फ़र्स्ट ईयर का। पिताजी धमकी ज़रूर देते रहे कि बता दूँगा तेरे ससुर को पर बताया नहीं। यह सफ़र भी इतना आसान न था। फ़र्स्ट ईयर किया ही था कि पहली प्रेग्नेंसी हो गई, बेटी हुई। दो साल इसी में खप गए। सेकेंड ईयर किया ही था कि दूसरी प्रेग्नेंसी हो गई। पहला बेटा हुआ। फिर दो साल इसी में खप गए। सोचूँ-सोचूँ कि तीसरा बच्चा। वह जब एक साल का था, मैंने फ़ायनल करने का सोचा।

हमेशा की तरह, मैं सुबह तीन बजे उठकर पढ़ती तो मेरा छोटा बेटा मुझे पहलू में न पाकर अक्सर उठ जाता। उसे फ़ीड करा, रबर-पेंसिल का बॉक्स दे देती, वह उसी से खेलता रहता, मैं पढ़ती रहती। जब सब उठने लग जाते तो उसे सुला देती और फिर घर में जुतती। पेपर देने मायके जाती। पिताजी की आँखों में मेरे लिए उपहास होता। ‘जिन लड़कों को पढ़ाना चाहा, वे पढ़े नहीं, अब ये मोहतरमा पढ़ेंगी और सबको कमाकर देंगी... हुँह...’ वह ज़ोर से हँस देते। सुनकर सब हँसते थे, वैसे देखा जाए तो उस वक़्त मैं भी हँसती थी। ख़ुद को हँसते हुए सुनो तो पता नहीं चलता था, हँस रहे हैं या रो रहे हैं।

किताबें मुझमें चेतना तो जगा रही थीं, अपने होने के प्रति सजगता भी पर साहस नहीं। मैं अभी तक कायर थी। अपने ‘ससुरों’ को देखकर मेरी छाती में हौल उठता, टाँगें काँपती। कलेजा मुँह को आता। मुझे लगता ही नहीं था कि मैं इनके सामने कुछ बोल सकती हूँ। वे खाने पर अक्सर कोई कड़वा कमेंट करते या कुछ पूछते तो मेरी घिघ्घी बंध जाती। जवाब देने में साँस फूल जाती। अपनी इसी बात से मैं ख़ुद से शदीद नफ़रत करती। जब नफ़रत बढ़ जाती तो मैं ख़ुद से यही कहती—‘जा, मर जा।’ गई थी मरने एक बार, ऊपर छत से कूदने पर बच्चों का चेहरा सामने आ गया और उतर आई। अब मरने का हक़ भी मैं खो चुकी थी।

इस बीच मैंने कुछ ख़ास नहीं लिखा। कविताएँ लिखती-फाड़ती रही। फिर आया कि एम.ए. कर लेती हूँ हिंदी लिटरेचर में। गई और फ़ॉर्म भरकर आ गई। अब मायके से नहीं, यहीं से करूँगी। कलेजा मज़बूत किया। जो होना है, सो हो। कभी तो हौसला दिखाना पड़ेगा। बड़ा बवाल मचा। पास-पड़ोस के लोग सास को कहने लगे—‘तेरी बहू पढ़ लिख जाएगी तो सबसे पहले तुझे ही घर से बाहर निकाल फेंकेगी। इसको दाब के रख।’ जब उन्होंने यही बात मेरे सामने कही तो मैंने बड़ी शांति से जवाब दिया—‘जब सब घर से निकाल देंगे, तब मेरे पास आना। मैं सेवा करूँगी।’

उस समय तो वह चुप लगा गईं, पर बाद में ज़बान चलाने के ज़ुर्म के लिए ख़ूब गालियाँ खाईं ‘तेरे माँ-बाप ने तुझे यही सिखाया है?’

इन गालियों का मैं कोई जवाब नहीं देती, न अपने किए की सफ़ाई। मुझे सुनने भी कौन बैठा है? मुझे जो करना होता, चुपचाप कर देती। आख़िर उन्होंने यह सोचकर सब्र कर लिया कि ‘घर का काम तो करती है न पूरा, बच्चे भी पालती है, मरने दो, करने दो। अपना हाड गलाती है, हमारा क्या?’

मई में जब मेरे पेपर होते, घर की सारी बहुएँ मायके चली जातीं, मेरे पढ़ने का टाइम वही था, सुबह का। दुपहर तक घर का काम करती, तीन बजे से छह बजे तक पेपर देकर आती, आकर फिर घर का काम करती।

बस इसी तरह अपनी पढ़ाई पूरी करती रही। बच्चों को भी बड़ा कर रही थी, ख़ुद भी बड़ी हो रही थी।

उन्हीं बरसों में, उन्हीं सुबहों में लिखी कुछ कहानियाँ छप गईं और बड़ा शोर भी मच गया। मन में भरोसा जगा कि कुछ कर सकती हूँ। अब हर वक़्त वही सोच बनी रहती... क्या लिखूँ... क्या लिखूँ?

पाठकों ने बहुत प्रेम से पढ़ा, सराहा। कुछ लोग मुझसे मिलने आते। डर के मारे मैं उन्हें जल्दी भगा देती कि मेरी असलियत न जान जाएँ या अभी कोई मुझ पर चिल्लाने ही न लगे। चेहरे पर हँसी चिपका लेती कि सब मुझे ख़ुश समझें। मुझे अपने लिए तरस और दया से नफ़रत है। मैंने ख़ुद पर ‘नो एंट्री’ का बोर्ड लगाया हुआ था कि लोग बाहर से लौट जाएँ। जिस दिन मैं इस काबिल बनूँगी, बाहर आकर सबसे मिलूँगी, मैं ख़ुद से कहती।

उस ज़माने में लोग ख़त बहुत लिखते थे। ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ में एक कविता छपने से हर दुपहर डाकिया सीढ़ी चढ़कर ऊपर आता और ख़ूब सारे ख़त, घर के किसी भी सदस्य को थमा देता। वे अपना सिर धुनते कि आख़िर इतने ख़त इसे लिखता कौन है? मैंने इसकी भी कोई सफ़ाई नहीं दी। ‘नवभारत’ में एक कविता छपी तो डाकिया हमारा घर ढूँढ़ता हुआ आया और दस रुपए का नोट थमा गया। उस नोट को मैंने अपने एलबम में लगा दिया।

ज्वाइंट फ़ैमिली में बड़ी उठा-पटक चल रही थी, बिजनेस भी एक साथ था, सो बिजनेस के सिलसिले में कुछ चाचा ससुर बिलासपुर में रहते थे, पति भी वहीं रहते थे। महीने में दो बार, दो दिन के लिए आते। उन दो दिनों में सिर्फ़ बिस्तर ही शेयर होता था, अकेलापन नहीं।

पहले वह किराए के घर में रह रहे थे, फिर अपना बनवा लिया। रोटी-पानी के लिए एक स्त्री की दरकार थी। कौन जाए, कौन न जाए, इस पर घर में बातें होती थीं। वहाँ भी चाचा ससुर की फ़ैमिली थी। एक ज्वाइंट फ़ैमिली से निकलकर दूसरे में जाने की बात थी। मुझे हर जगह इसलिए भी चाहते थे कि मैं काम बहुत और तेज़ी से करती थी। पुरानी ट्रेनिंग थी। खाना बनाने के अलावा सिलाई-कढ़ाई भी अच्छी कर लेती। अक्सर दुपहर को मेरी सास अपने कपड़े मुझे सिलने को देकर ख़ुद सोने चली जाती। कभी मैं बच्चे को सुलाने के बहाने सो भी लेती घंटा भर और कभी मशीन चलाती कपड़े सिलती रहती।

एक बार उनकी एक सलवार मुझसे बिगड़ गई। मैं सलवार पर बने फूलों को एक कतार में नहीं लगा पाई। एक कतार ऊपर जा रही थी, एक कतार नीचे आ रही थी। उन्होंने आग बबूला होते हुए सलवार मेरे मुँह पर फेंकी और कहा–‘जा, इसे अपनी माँ के गां** में डाल दे।’

यह पहली बार नहीं था, पर उस क्षण पता नहीं क्या हुआ मेरे भीतर कि कुछ बुरी तरह टूट गया। मैंने बहुत गहरी नफ़रत से बिना कुछ कहे उन्हें देखा–कभी न कभी तुझे इस सबका हिसाब देना पड़ेगा। मैं क्षमा नहीं करूँगी। तू मर भी जाएगी तो मैं तेरे नज़दीक नहीं आऊँगी।

और यही हुआ भी। मैंने बिलासपुर जाने का निश्चय कर लिया कि उनके जीते जी वहाँ से लौटूँगी नहीं और मैं नहीं लौटी।

मेरे बिलासपुर जाने के निर्णय पर भी बड़ा वबाल मचा। मैंने अपने पति से कह दिया—अब मैं यहाँ नहीं रहूँगी मतलब नहीं रहूँगी। वे अपनी ज़िद पर अड़े रहे तो अंततः सबको मानना पड़ा।

हालाँकि वहाँ भी चाचा ससुर की ज्वाइंट फ़ैमिली थी, पर यहाँ से तो टलें। टल गए। 95 में मैं वहाँ पहुँची। बच्चों का एडमिशन कराया एक ठीक-ठाक स्कूल में और ख़ुद भी कुछ करने का सोचने लगी। सबसे पहले अपने भीतर सेल्फ़ रिस्पेक्ट तो पैदा हो। मनोविज्ञान और दर्शन में रुचि थी, पता करने लगी कि मनोविज्ञान किस कॉलेज में पढ़ाया जाता है? पता किया, मनोविज्ञान में एम.ए. का फ़ॉर्म भर दिया। अब? अलस्सुबह उठती, बच्चों को तैयार कर टिफ़िन देकर स्कूल भेजती, घर का दोनों वक़्त का खाना बनाती, रोटियों के लिए आटा गूँथकर फ़्रिज में रखती और तैयार होकर रिक्शे में बैठकर कॉलेज जाती। फ़ॉर्म प्रायवेट का भरा था, पर जाती हफ़्ते के पाँच दिन थी। उस रिक्शे पर आते-जाते मैंने ख़ूब दुनिया देखी। दो बजे तक घर वापस आती, गरम-गरम रोटियाँ सेंककर सबको खिलाती। कभी नहीं भी आ पाती, लाइब्रेरी में देर तक पढ़ती रहती। उस दिन सबका मुँह फूल जाता। मैंने उनके मुँह को देखना कम कर दिया था। मुझे मेरे काम करने की रफ़्तार बचा लेती थी। इस रफ़्तार ने किसी को ज़्यादा कहने का मौक़ा न दिया। मेरे पास तर्क था–मैं सारा काम करके जाती हूँ। दूसरी औरतें भी वहाँ थीं, पर वे पता नहीं क्या करती थीं। मुझसे तो यही कहतीं कि देखो, एक तुम हो, इतने फ़ालतू काम कर लेती हो, एक हम हैं, अपने लिए वक़्त ही नहीं मिलता।

मनोविज्ञान में दूसरा एम. ए. करते वक़्त कॉलेज की लाइब्रेरी ने मेरे लिए नया संसार खोल दिया। मैं वहाँ से ख़ूब किताबें लेती और ख़ूब पढ़ती। जब मैंने फ़्रायड और जुंग को पढ़ा, तब मेरे दिलो-दिमाग़ के दरवाज़े खुले और मैं ख़ुद को समझने की कोशिश में लगी। जुंग ने इसमें मेरी बड़ी मदद की। जुंग को मैंने बहुत प्रेम से पढ़ा, बहुत आहिस्ता, अपने भीतर उतारते हुए। उसी ने सबसे पहले मेरे अंदरूनी हिस्सों को मेरे सामने खोलकर रख दिया। मैंने अपने डर और कॉम्प्लेक्स को समझा। जुंग को पढ़ने के बाद ही मैं जान पाई, ये सब मेरे टेलेंट से इतनी नफ़रत क्यों करते हैं? मेरे प्रति इतने सख्त और कड़वे क्यों हैं? इसलिए कि वे ख़ुद अपने भीतर की संभावनाओं को खोज नहीं पाए।

जुंग के बाद मैंने ओशो को पढ़ा। प्रभावित भी बहुत हुई। फिर तो इंडियन फ़िलासफ़ी, ग्रीक फ़िलासफ़ी, वेस्टर्न फ़िलासफ़ी सब पढ़ डाली। अब मैं इंसानी मन को बेहतर समझ सकती थी। मैं समझ पाई कि तुम कोशिश करके भी न किसी दूसरे इंसान को बदल सकते हो, न बाहरी परिस्थितियों को। बदलाव की शुरुआत ख़ुद से ही करनी होगी।

कॉलेज के इन सालों ने मुझमें काफ़ी परिवर्तन किए। स्टूडेंट्स तो कभी जान नहीं पाए, कुछेक को छोड़कर कि मेरे तीन बच्चे हैं और मैं कॉलेज आती हूँ पढ़ने। प्रोफ़ेसर्स जानते थे, वे मुझसे बड़े सम्मान से पेश आते, उनसे बातें करती, उन्हीं के साथ चाय पीती। वे थोड़े हैरान होते–अच्छा, आपने यह-यह पढ़ रखा है, आपको तो बहुत पता है। आप लिखती भी हैं? मैं ख़ुद पर हैरान होती–अच्छा, तुझे यह भी पता था। तू लिखती भी है?

ख़ाली पीरियड में मेरे अति आग्रह पर फ़िलासफ़ी के एक प्रोफ़ेसर मुझे फ़िलासफ़ी पढ़ा देते थे, उन्होंने एक दिन कहा–‘यू डोंट नो, व्हाट यू आर। आप जितनी फ़िलासफ़ी जानती हैं, उतना तो एम.ए. के स्टूडेंट भी नहीं जानते। आप इसका उपयोग क्यों नहीं करतीं... कुछ लिख डालिए।’ यह वाक्य मुझे ‘तत्वमसि’ नॉवेल की ओर ले गया। जो मैंने एम. ए. फ़र्स्ट डिविज़न पास करने के बाद लिखा।

अब तक मेरा छोटा-मोटा अंदरूनी संसार बन पाया था, थोड़ा-थोड़ा कांफ़िडेंस आने लगा था। मैं सोचने लग पड़ी थी। अपनी जगह तलाशने लग पड़ी थी। मेरा लिखना अब तक कैथार्सिस ही था। कोई द्वंद्व नहीं, लेखन की कोई समझ नहीं, बस अपना-आप बाहर उलीचना होता। कहानी एक ही बार में पूरी हो जाती। फिर से गुज़रने का न तो वक़्त होता, न सलाहियत। जो लिखती, भेज देती। लिखकर अच्छा लगता, राहत मिलती। हर जगह लिखती... किचन में, बाथरूम में, बैडरूम में ज़मीन पर चटाई बिछाकर, नाईट बल्ब की रौशनी में, बच्चे को दूध पिलाते समय या पति के खर्राटों के बीच... लिखती जाती और रोती जाती... जाने क्या था भीतर कि ख़त्म ही नहीं होता।

हिन्द पॉकेट बुक्स से मुझे विदेशी राइटर्स के अनुवाद पढ़ने का चस्का लग गया था। उनकी दुनिया हमारी दुनिया से बेहद मुख़्तलिफ़ होती। हमारी किताबों में अक्सर दुःख, ग़रीबी, पीड़ा, संघर्ष, विद्रोह, औरतों पर तरह-तरह के अत्याचार, जिनसे मैं बख़ूबी वाकिफ़ थी, पर विदेशी लेखक किसी और ही दुनिया की बातें करते। मैं उस दुनिया को जीना चाहती। मैंने ‘हरमन हेस’ को पढ़कर जाना, ऊँची दुनियाओं के रास्ते हम निचली दुनियाओं से ऊपर उठने पर ही खोल पाते हैं। चाहे वक़्त लगे पर अपनी कीड़े जैसी ज़िंदगी से ऊपर उठना ही होगा, मैं हर वक़्त सोचा करती। फिर वे कहते हैं–‘हममें कोई है, जो सब जानता है।’ अगर वह जानता है तो इस जीवन से बाहर निकलने का रास्ता भी जानता होगा तो मैं उसी से पूछती, उससे, जिसे मैं जानती तो नहीं थी, पर वह मेरे भीतर है तो मुझे जानता ही होगा। अच्छा, थोड़ा हौसला ही दे दे कि ख़ुद का सामना कर पाऊँ, मैं उससे कहती।

ख़ुद को पहचानने की दिशा में गुरजिएफ़ को पढ़ा, पी. डी. ओस्पेंसकी को पढ़ा। उनके बताए सेल्फ़ रिमेंबरिंग और सेल्फ़ आब्ज़रवेशन के प्रयोग किए, ये प्रयोग तो मैं अभी भी करती हूँ... और भी बहुत कुछ...

उस वक़्त एक सपना मैं अक्सर देखती थी–बेहद अँधेरी रात है। एक गहरे दलदल को पार कर रही हूँ। जितना आगे बढ़ने की कोशिश करती हूँ, उतना ही और गहरे धँसती जाती हूँ। मदद के लिए पुकारती हूँ अपने भीतर से। जान पाती हूँ कि कोई है, जो मुझे देख तो रहा है पर मदद नहीं कर रहा। कहता है—‘तुम्हें अपनी मदद आप करनी होगी। तुम ख़ुद को ख़ुद ही बचा सकती हो।’ आख़िर एक पतली-सी टहनी दिखी, जो मेरे सिर के ऊपर झूल रही थी। उसे पकड़ा और पूरी ताक़त से बाहर झलांग लगा दी।

इशारे तो मिल रहे थे, पर यह बात ठीक से समझने में मुझे काफ़ी वक़्त लग गया। लिखना भी चल ही रहा था, जिसमें कैथार्सिस के अलावा थोड़ा-बहुत ज्ञान भी आ शामिल हुआ था।

ज्वाइंट फ़ैमिली टूटने लगी थी। बच्चे पढ़ रहे थे। अब मेरी चिंता में मेरे बच्चे ज़्यादा शामिल थे। मैं उन्हें वह ज़िंदगी नहीं देना चाहती थी, जो मैं अब तक जीती आ रही थी या मेरे पति जी रहे थे। दूसरों की ग़ुलामी की ज़िंदगी। वैसे भी एक स्त्री अच्छी बेटी, अच्छी बहन, अच्छी बीबी बनने से तो इंकारी हो सकती है, पर एक ज़िम्मेदार माँ बनने से कभी इंकारी नहीं हो सकती।

आर्थिक संघर्ष तो चल ही रहे थे, [इसकी कहानी भी बड़ी लंबी है पर अभी नहीं।] कई दूसरी तरह के भी थे। इन संघर्षों ने मेरे बहुत से बरस ले लिए पर इन बरसों में मैंने ख़ुद पर भी बहुत काम किया। अपना कचरा बाहर फेंकने में, ख़ुद को नया बनाने को, अपने अनदिखे हिस्से ढूँढ़ने में। अपने मास्टर लेखकों को पढ़ती तो मुझे ख़ुद पर एक अजीब-सी शर्म और तरस भी आता कि आख़िर मैंने जीवन में किया ही क्या है? क्या कभी ऐसा होगा कि मरने से पहले कुछ कर जाऊँ? कुछ बेहतरीन लिख जाऊँ? मैं उन्हें बार-बार पढ़कर उनसे लिखने की तमीज़ सीखने की कोशिश भी करती।

बहुत बाद में अपने ट्रामा से बाहर आने के लिए ख़ुद पर सेल्फ़ हीलिंग के कई प्रयोग किए–एन.एल.पी., पास्ट लाइफ़ रिग्रेशन, सबकांशस माइंड प्रोग्राम, हिप्नोटिज़्म, एक्सेस कांसयसनेस, शैमिनिज़्म के प्रयोग, और भी कई हीलिंग थेरेपीज़। [मेरी हीलर बेटी मुझसे कहती है—‘माँ, इन सबको क्षमा कर दो, जब तक क्षमा नहीं करोगी, आगे नहीं बढ़ पाओगी।’ इन्हें क्षमा करने में भी मैंने बहुत वक़्त लिया। कौन जाने कितना कर पाई हूँ।]

अँधेरे का द्वार खटखटाती वह बच्ची अब बड़ी हो गई थी, उसका चेहरा मुझे दिखने लगा था। वह उस जेल से बाहर निकलना चाहती थी।

अभी तक तो इल्हामी रचनात्मकता ही थी मेरे जीवन में, चाहे मैं अपने तईं कई प्रयोग भी कर रही थी, भाषा और कंटेंट के स्तर पर। कुछ नया करने की बेहिस व्याकुलता भी थी मेरे भीतर और मैं ख़ुद को बहने भी दे रही थी।

पर अब मेरे जीवन में द्वंद्व आता है... मैं क्या लिख रही हूँ? क्यों लिख रही हूँ? नहीं लिखती तो क्या मर जाती? हाँ, मर जाती। तो इसमें नया क्या है? अलग क्या है? कैसे एक नहीं, स्त्री होने की अनेक पीड़ाओं को तुम अभिव्यक्त कर सकती हो, दबे हुए इंसानी एहसासों को आवाज़ दे सकती हो। बंधी-बंधाई लीक पर लिखने से क्या मिलेगा? कुछ ऐसा करो कि अपनी ज़मीन ढूँढ़ सको, ख़ुद को पहचान दे सको, इस शरीर को कोई चेहरा दे सको। अपने बूते खड़ी हो सको। ख़ुद की आँखों में देखो तो फ़क्र हो। ऐसे बहुत से व्यक्तिगत संघर्ष सामने आते रहे।

अब मैं अपनी पहचान चाहने लगी थी... घर में, लेखन में, जीवन में। पर बचपन का ‘सेल्फ़ डाउट’ अभी भी मेरे जीवन की काफ़ी बड़ी रुकावट था। पहचान तो ठीक है, पर मैं कुछ और भी चाहती थी ख़ुद से, क्या? पता नहीं। ओशो को पढ़ने के बाद मैंने मेडिटेशन के कई प्रयोग किए... करती रही पर भीतर कोई बहुत बड़ी ख़ला है, जो संघर्षों से गुज़रने के बाद बहुत साफ़-साफ़ दिखाई दे रही है। संघर्ष ख़त्म हो गए फिर इतनी बेचैन क्यों हूँ? ख़ुद को एक नया अर्थ कैसे दूँ? नया अर्थ यानी क्या? यही सब करने तो नहीं आई थी इस धरती पर... हाँ, करना था, कर दिया। अब? मेरा अपना सफ़र? उसका क्या? अपने होने का बोध कैसे हो? क्या मैं ख़ुद को जान पाई? ख़ुद से हज़ार बार पूछो पर जवाब ‘न’ ही आता। जो भी मेरे पास है, उसे भी मैं शक की निगाह से देखती हूँ।

एक बार अश्व घोष की ‘बुद्ध चरितम’ पढ़ रही थी। बुद्ध को मैंने बहुत प्रेम से पढ़ा और अपने भीतर उतारा है। तो जब मैं उस जगह पर पहुँची, जहाँ बुद्ध को बुद्धत्व घटने वाला है और मार आता है, कहता है–

‘सारी पृथ्वी का राज ले लो पर बुद्धत्व को भूल जाओ।’

बुद्ध नहीं माने तो कहा–

‘मेरी सुंदर बेटियाँ और समस्त ऐश्वर्य ले लो पर बुद्धत्व की ज़िद छोड़ दो।’

अब भी बुद्ध नहीं माने तो उसने अंतिम शस्त्र फेंका–

‘तुम्हें क्या लगता है, तुमने बहुत बड़ा तप किया है और बुद्धत्व तुम्हें हासिल हो जाएगा? भूल जाओ। तुमने कुछ नहीं किया है। तुम्हें कुछ हासिल नहीं होने वाला।’

तब बुद्ध ने अपनी एक ऊँगली से पृथ्वी की ओर इशारा करते हुए कहा–

‘मेदिनी मेरी साक्षी है। मैंने बहुत तप किया है, बुद्धत्व मेरा अधिकार है।’

मार ख़ामोश हो जाता है। इसका मतलब ‘सेल्फ़ डाउड’ सबसे बड़ा हथियार है, जो मनुष्य को ख़ुद से हराता है। जो तुम्हारे पास है, उसी को लेकर आगे बढ़ना है, वही तुम्हारा अर्जन है।

जब यह बात समझ में आई, मैंने इस पर भी काम किया। ऐसा नहीं कि अब सेल्फ़ डाउड होता नहीं, होता है पर मैं उसकी तरफ़ देखती नहीं, मैंने उसके साथ रहना सीख लिया है। जो करना हो, कर जाती हूँ।

द्वंद्व कुछ नया सोचने, कुछ नया रचने का अब ज़्यादा है। कुछ ऐसा, जो वर्जित हो, जिसे अब तक कहा न जा सका हो। कहा भी गया हो तो उसके भीतर घुसकर नहीं। मैं चाहती हूँ, मेरा सत्य मेरे होने से निकले, वह सत्य, जो अँधेरे में द्वार खटखटाती उस बच्ची के पास है, मैं उनकी आवाज़ बनना चाहती हूँ, जिनके पास पीड़ा तो है पर शब्द नहीं हैं।

इसी सोच के तहत मैंने ट्रांसजेंडर्स पर ‘देह कुठरिया’ और लेस्बियंस पर ‘काया’ उपन्यास लिखा, जो बहुत सराहा भी गया। पर मुझे बहुत ख़ुशी नहीं हुई। कुछ और... कुछ और... और भीतर... और भीतर... ख़ुद से बार-बार कहती हूँ... बात सिर्फ़ एक किताब की नहीं है, हर बार नया ढूँढ़ना, नए तरीक़े से लिखने की कोशिश करना, तब जबकि समझदारियाँ बढ़ गईं हों, एक चुनौती ही है।

मैं बाहरी दुनिया से अलग भीतरी दुनिया में उतरना पसंद करती हूँ, बाहर की घटनाएँ बाहरी कारणों से नहीं, भीतरी कारणों से चालित होती हैं। किसी दूसरे समुदाय से नफ़रत, उनके षड्यंत्र, असमानता, शोषण, राजनीतिक समस्याएँ सबके कारण भीतरी हैं। बिना भीतर को समझे बाहरी कोई भी उपाय कारगर नहीं है। हाँ, आप करते हैं, करते रहें। इंसान जब तक ‘दो’ है, हमेशा संघर्ष रत रहेगा। उस भीतरी दुनिया को अभिव्यक्त कैसे किया जाए? मुझे वह नहीं लिखना है जो सब जानते हैं, मुझे वह लिखना है, जो मैं जानती हूँ।

समझते-समझते ही समझ पाई हूँ कि कैसे अपने संशयों से निपटूँ, इच्छाओं को आकार दूँ, विद्रोह को धार दूँ... लड़खड़ाती हुई नहीं, सीधी तनकर चलूँ। जो मेरे पास है, उस पर यक़ीन रखूँ।

भीतर की शक्तियों से समरसता बन रही है। वे मुझे आकार दे रही हैं। कोई मुझसे कहता है, जो कुछ भी मैंने सहा है, व्यर्थ नहीं गया। दर्द, भ्रम और टूटन भी मार्ग का हिस्सा हैं। टूटन भी एक अवस्था है। सत्य किसी ऊँचाई पर बैठा देव नहीं है, बल्कि जीवन के बीचोबीच स्थित है। इस सत्य का सामना करना होगा, हर बार, एक अलग तरीक़े से। अब सहारा नहीं चाहिए, दृष्टि चाहिए। मेरे भीतर से कोई कहती है–‘अब मैं तुम्हें मार्ग नहीं दिखाऊँगी, तुम स्वयं मार्ग बनो।’

मैं जब ‘कुछ नहीं’ थी, ‘कुछ होने’ के सफ़र पर निकली थी, ‘कुछ हो’ गई हूँ तो ‘कुछ नहीं’ हो जाना चाहती हूँ। जब मैं ख़ाली थी, ख़ुद को भरना चाहती थी, ख़ुद भर लिया है तो ख़ाली होना चाहती हूँ। जब साधारण थी, विशिष्ट होना चाहती थी, जब लगता है, विशिष्ट हो गई हूँ तो साधारण होना चाहती हूँ, इस यात्रा का सबसे कठिन हिस्सा है, साधारण होना।

तो इस तवील यात्रा को मुख़्तसर में कहा है। ज़ख्म सूख गए हैं, नदी में से बहुत पानी बह गया है। अब मैं ख़ुद अपने किनारे पर बैठी बहती नदी देख पा रही हूँ। क्या पता कब उठकर जाने का क्षण आ जाए? अब चलने का नहीं ठहर जाने का वक़्त है। अब पीछे लौटने का मन नहीं होता। जैसी भी यात्रा थी, मुझे ही बनाने-निखारने के लिए रची गई थी। मैं लफ़्ज़ों की शुक्रगुज़ार हूँ कि इन्होंने मुश्किल वक़्त में मुझे थामे रखा, मेरी पीड़ा अपनी छाती में लिए मुझमें से बह निकले। मैंने नहीं सिरजा इन्हें, इन्होंने मुझे सिरजा है। मुश्किलों में माँजा, जगाए रखा, नहीं तो जाने मैं कहाँ होती? इन्हीं के चलते मैं ख़ुद से प्रेम कर पाई, ख़ुद पर गर्व कर पाई।

अँधेरे में द्वार खटखटाती बच्ची जेल से आज़ाद हो आत्मसम्मान से चल रही है।

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‘अकार’ के 73वें अंक से साभार प्रस्तुत।

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