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बेला

साहित्य और संस्कृति की घड़ी

25 अप्रैल 2024

‘नाऊन चाची जो ग़ायब हो गईं’

‘नाऊन चाची जो ग़ायब हो गईं’

वह सावन की कोई दुपहरी थी। मैं अपने पैतृक आवास की छत पर चाय का प्याला थामे सड़क पर आते-जाते लोगों और गाड़ियों के कोलाहल को देख रही थी। मैं सोच ही रही थी कि बहुत दिन हो गए, नाऊन चाची की कोई खोज-ख़बर नहीं म

10 अप्रैल 2024

हम भले होने के अभिनय से ऊब चुके हैं

हम भले होने के अभिनय से ऊब चुके हैं

तुम्हें थोड़ा-सा पिघला हुआ होना चाहिए। पिघला हुआ यानी नरम और मुलायम, ज़रा पानी-पानी-सा। दाईं आँख ने कहा।  तुम्हें थोड़ा कम झुँझलाना चाहिए। दूसरों को सुनने के दिखावटी अपार धैर्य से जन्मी खीझ को अपने द

10 अप्रैल 2024

‘बिना शिकायत के सहना, एकमात्र सबक़ है जो हमें इस जीवन में सीखना है’

‘बिना शिकायत के सहना, एकमात्र सबक़ है जो हमें इस जीवन में सीखना है’

जैसलमेर 10 मई 2023  आज जैसलमेर आया हूँ। अपनी भुआ के यहाँ। बचपन में यहाँ कुछ अधिक आना होता था। अब उतना नहीं रहा। दुपहर में साथी के साथ हमीरा जाना हुआ। दिवंगत साकर ख़ान के घर। जीवन में लय का बहुत मह