भास के उद्धरण

अंधकार मानो अंगों पर लेप कर रहा है। आकाश मानो अंजन बरसा रहा है। इस समय दृष्टि ऐसी निष्फल हो रही है जैसे दुष्ट पुरुषों की सेवा।
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मेरी बुद्धि धर्म और स्नेह के बीच में पड़कर झूल रही है।
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संबंधित विषय : द्वंद्व
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मार्गरूपी नदियों में अंधकार बह रहा है। गृह-माला तटों के समान प्रतीत हो रही है। दसों दिशाएँ अंधकार में डूबी हुई हैं। अंधकार को मानो नौका से पार करना होगा।
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सुख की अवस्था से जो दरिद्रता की दशा को प्राप्त होता है, वह तो शरीर से जीवित रहते हुए भी मृतक के समान ही जीता रहता है।


ग्रीष्म काल में सबकी प्यास बुझाने में ही स्वयं सूखे हुए एक महान सरोवर की भाँति वह सबकी तृष्णा को शांत करके निर्धन हो गया है।
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लोगों की दृष्टि में प्रभावहीन बनाने वाली दरिद्रता शंकनीय होती है।
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संबंधित विषय : ग़रीबी
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दरिद्रता के कारण पुरुष के बंधुजन उसकी वाणी का विश्वास नहीं करते, उसकी मनस्विता हँसी का विषय बन जाती है, शीलवान की कांति भी मलीन हो जाती है, बिना शत्रुता के ही मित्र लोग विमुख हो जाते हैं, आपत्तियाँ बड़ी हो जाती हैं और जो पाप कर्म अन्य लोगों द्वारा किया हुआ होता है, उसे बी उसी का किया हुआ मानने लगते हैं।
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