Font by Mehr Nastaliq Web
noImage

भास

भास के उद्धरण

श्रेणीबद्ध करें

अंधकार मानो अंगों पर लेप कर रहा है। आकाश मानो अंजन बरसा रहा है। इस समय दृष्टि ऐसी निष्फल हो रही है जैसे दुष्ट पुरुषों की सेवा।

मेरी बुद्धि धर्म और स्नेह के बीच में पड़कर झूल रही है।

मधुर पदार्थ भी अधिक खा लेने पर अजीर्ण कर देता है।

अपराधी की पूजा तो केवल वध है।

स्त्रियों का लड़कियों में अधिक स्नेह होता है।

यज्ञ, विवाह, संकट और वन में स्त्रियों का देखना है |

दुर्दशा शत्रुओं के मन में भी मंत्री भाव ला देती है।

धर्म ही मनुष्य के द्वारा यत्नपूर्वक साध्य है।

मनुष्य अपने ही दोषों से शंकित हुआ करता है।

अकुलीन कैसे इतना दयाशील होगा?

दरिद्रता मनुष्यों के लिए उच्छ्वासयुक्त मरण है।

स्त्रियों के तो पति ही अवलंब होते हैं।

साक्षियों के सामने धरोहर लौटानी चाहिए।

मार्गरूपी नदियों में अंधकार बह रहा है। गृह-माला तटों के समान प्रतीत हो रही है। दसों दिशाएँ अंधकार में डूबी हुई हैं। अंधकार को मानो नौका से पार करना होगा।

सुख की अवस्था से जो दरिद्रता की दशा को प्राप्त होता है, वह तो शरीर से जीवित रहते हुए भी मृतक के समान ही जीता रहता है।

बिना जूठा किए कौन खा सकता है?

ग्रीष्म काल में सबकी प्यास बुझाने में ही स्वयं सूखे हुए एक महान सरोवर की भाँति वह सबकी तृष्णा को शांत करके निर्धन हो गया है।

लोगों की दृष्टि में प्रभावहीन बनाने वाली दरिद्रता शंकनीय होती है।

दरिद्रता के कारण पुरुष के बंधुजन उसकी वाणी का विश्वास नहीं करते, उसकी मनस्विता हँसी का विषय बन जाती है, शीलवान की कांति भी मलीन हो जाती है, बिना शत्रुता के ही मित्र लोग विमुख हो जाते हैं, आपत्तियाँ बड़ी हो जाती हैं और जो पाप कर्म अन्य लोगों द्वारा किया हुआ होता है, उसे बी उसी का किया हुआ मानने लगते हैं।

Recitation