Font by Mehr Nastaliq Web

गाँव पर ग़ज़लें

महात्मा गांधी ने कहा

था कि भारत की आत्मा गाँवों में बसती है। आधुनिक जीवन की आपाधापी में कविता के लिए गाँव एक नॉस्टेल्जिया की तरह उभरता है जिसने अब भी हमारे सुकून की उन चीज़ों को सहेज रखा है जिन्हें हम खोते जा रहे हैं।

उठ गइल बा

ए. कुमार ‘आँसू’

चढ़ल बसन्त में

अशोक द्विवेदी

तहरा सुधियन के

अशोक द्विवेदी

झलकेले खुशी बीच

अशोक द्विवेदी

रो-रो के सनेहिया

जौहर शफियाबादी

जरूरत गाँव में

मिथिलेश ‘गहमरी’

जर रहल बा गाँव

सूर्यदेव पाठक ‘पराग’

सब फूल हमरा

जौहर शफियाबादी

गाँव जे शहर

कृष्णानन्द कृष्ण

खेल उनकर खतम हो गइल

नागेन्द्र प्रसाद सिंह

सगरो मचल बवाल

मिथिलेश ‘गहमरी’

चाल देशी ना

जौहर शफियाबादी

मेरा प्यार बेशक

डी. एम. मिश्र

एह सियासी नगर

अशोक द्विवेदी

गाँवों का उत्थान

डी. एम. मिश्र

गाँव में

डॉ. वेद मित्र शुक्ल