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शर्म पर कविताएँ

शर्म का एक अर्थ लज्जा,

हया, संकोच आदि है; जबकि एक अन्य अर्थ में यह दोषभाव या ग्लानि का आशय देता है। इस चयन में शर्म विषय से संबंधित कविताओं को शामिल किया गया है।

झेंपते हुए

महमूद दरवेश

अँधेरे का सौंदर्य-2

घुँघरू परमार

शर्म

दवीद कुगुल्तिनोफ

अकेले में शर्म आती है

रामकुमार तिवारी

सेज पर उदासी

मनोज कुमार झा

खाँटी घरेलू औरत-29

ममता कालिया

तेजि रहल लाज

चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’

बेशर्म दौर में

नित्यानंद गायेन

लाज

हंसराज

सकारात्मक

अंकिता आनंद

उस आदमी ने कहा

विशाल श्रीवास्तव

शर्मिंदा है ईश्वर

नंदकिशोर आचार्य

इज़्ज़त

दामिनी यादव

शर्म कर लो

पीयूष मिश्रा

पेंसिल

राकेश कुमार मिश्र

शब्द

आलोक कुमार मिश्रा

शर्म के पक्ष में

अशोक कुमार पांडेय

आज़ादी

उद्भ्रांत

नहीं जिनके नयनों में लाज

कृष्ण मुरारी पहारिया

शर्म थी

कैलाश मनहर

पुरानी शर्म

अनिल कुमार सिंह

इतना बेशर्म

हरि मृदुल

प्रेम और श्रद्धा

गोविंद माथुर

लज्जा

नरेश अग्रवाल