अनफ़्रेम्ड : लेखक, तुम्हारे शब्द तुम्हारे ख़िलाफ़ हैं
दिनेश श्रीनेत
05 नवम्बर 2026
वे कहते हैं कि लेखक के जीवन और उसकी रचनात्मकता को अलग-अलग करके देखो। वे कहते हैं कि लेखक भी मनुष्य है, उसे उसकी मानवीय कमज़ोरियों के लिए माफ़ कर दो। मस्तिष्क इसे स्वीकार करने को कहता है, मगर एक पाठक का छला गया मन उसे मानने से इनकार कर देता है। ऐसा क्यों है?
कोई भी महान् रचना कहाँ से पैदा होती है? हम महान् किताबों को पढ़ते हैं और हैरत में पड़ते हैं कि उस लेखक के पास जीवन को देखने की कैसी अनुपम दृष्टि है। यह सच है कि हमारी दृष्टि हमारे जिए गए जीवन के साथ-साथ नहीं चलती है। वह जीवन के समानांतर नहीं बल्कि आगे या पीछे चलती है। जैसे सारा जीवन युद्ध में झोंक देने वाला सैनिक जीवन के अंतिम हिस्से में युद्ध-विरोधी रचना लिखे। उसकी युद्ध और हिंसा के प्रति नफ़रत का निःसंदेह अर्थ होगा।
इसी तरह अपना जीवन अकेली गुज़ारने वाली लड़की व्हील चेयर पर बैठे-बैठे बाहर खेलने वाले बच्चों के जीवन, मनोभावों और उनकी शारीरिक गति पर एक शानदार कहानी लिख सकती है, शायद उस खेल में शामिल बच्चे भी वैसा न कर पाएँ। यहाँ पर वह एक ‘ऑब्जर्वर’ है। वह उन बारीकियों को भी देख पाती है, जिन्हें साधारण लोग नज़र-अंदाज़ कर जाएँगे। वह शायद पैरों की गति और उनके चमत्कृत कर देने वाली काव्यात्मकता को सबसे ध्यान से देख पाती हो, क्योंकि वह ख़ुद चल नहीं सकती। ठीक उसी तरह जैसे माजिद मजीदी की फ़िल्म ‘चिल्ड्रेन ऑफ़ हेवेन’ में जब बच्ची अपने लिए जूते चाहती है तो उसकी निगाहों में लोग नहीं उनके जूते समाने लगते हैं। हमारे अभावों का विस्तार बहुत बार रचना बनकर सामने आता है। वह एक दूसरी समानांतर दुनिया में अपना आकार लेते हैं।
जीवन में कभी प्रेम न हासिल कर पाने वाले शायद दुनिया की सबसे सुंदर प्रेम-कहानियाँ कह सकते हैं। राज कपूर और यश चोपड़ा की प्रेम-कहानियाँ उनके जीवन के ही अधूरे प्रेम का विस्तार लगती हैं। हमारे भीतर एक अदर सेल्फ़ होता है जो रचना में रिफ़्लेक्ट होता है, इसी अदर सेल्फ़ की वजह से क्रूर डाकू के भीतर से वाल्मीकि का जन्म होता है, पत्नी के प्रति आसक्ति के चलते उसी फटकार खाने वाले तुलसीदास मर्यादाओं का ग्रंथ ‘रामचरित मानस’ रच देते हैं।
एक संत या अपराधी के जीवन पर प्रामाणिक लेखन के लिए आपका ख़ुद संत या अपराधी होना ज़रूरी नहीं है। मगर इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि हर रचना अंततः निकलती जीवन से ही है। जीवन से बाहर किसी रचना का अस्तित्व नहीं है। फिर हम लेखक और उसके लिखे को आपस में इतनी गहराई से क्यों जोड़कर देखते हैं? क्योंकि लिखे गए शब्दों की गरिमा उनकी अर्थ-छवियों से है, जैसे : हरा सिर्फ़ एक शब्द है; मगर उसकी एक अर्थ-छाया है, जो हमारे अनुभव और तमाम लोगों के अनुभव से निकली है। इसलिए जब हरा कहा जाएगा तो एक छोटे बच्चे को अपनी माँ की हरी साड़ी याद आ सकती है। हममें से तमाम लोगों को हरी घास या वनस्पति याद आएगी। सत्य कहा जाएगा तो शायद किसी को गांधी की छवि याद आ सकती है। जब शब्द अपने अर्थ की गरिमा खो देते हैं, तो वे अपने वास्तविक पद से बहुत नीचे गिर जाते हैं; जैसे : नेता शब्द, नेताजी सुभाष चंद्र बोस भी थे और ‘नेता’ और ‘नेतागीरी’ जैसे शब्द हम आज किसी को बोलते हैं; मगर नकारात्मक अर्थों में। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि बीते कई दशकों में भारतीय राजनीति में नेताओं ने अपनी गरिमा ख़त्म की है। यानी हर शब्द का एक मूल्य है। रचना में उस मूल्य को कौन वहन कर रहा है, ज़ाहिर है एक रचनाकार शब्दों को परंपरागत अर्थों से परे ले जाकर उसे अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाता है। उस अभिव्यक्ति के पीछे लेखक का ख़ुद का जीवन-मूल्य होता है। तभी हम उन शब्दों पर यक़ीन करते हैं। इसलिए आपका लेखक भले सामाजिक अर्थों में भला इंसान न हो, मगर उसके कुछ ‘जीवन-मूल्य’ अवश्य होंगे और उन मूल्यों का रिफ़्लेक्शन उसकी रचनाओं में अवश्य दिखेगा।
‘प्यासा’ फ़िल्म का विजय एक असफल कवि है। समाज की नज़रों में वह एक बुरा व्यक्ति है। वह अपने जीविकोपार्जन के लिए कोई कामकाज नहीं करता, एक वेश्या से मिलता-जुलता है; मगर उनके कुछ जीवन-मूल्य हैं जिन पर वह टिका हुआ है, यही बात हमें नायक के प्रति आकर्षित करती है। यही वजह है कि फ़िल्म में उसकी बात सीधे दिल में उतरती है।
विजय कौन है? वह हमारी सोसाइटी से असहज करने वाले सवाल पूछता है। वह प्रकाशकों या दूसरों की माँग पर अपनी रचनाओं को बदलने से इनकार कर देता है। वह प्रेम और नैतिकता में प्रेम को अहमियत देता है और गुलाबो के नि:स्वार्थ प्रेम को चुनने का साहस करता है। वह अपने सिद्धांतों और स्वतंत्रता के साथ समझौता नहीं करता है। मरने के बाद मिली लोकप्रियता विजय को आहत कर देती है।
इस फ़िल्म में इसलिए विजय का किरदार तमाम बनावटी और वाहवाही-तालियाँ लूटने वाले शाइरों से अलग एक बड़े रचनाकार के रूप में उभरता है। हमें रचना पर तभी यक़ीन होता है, जब हमें रचनाकार के मूल्यों पर भरोसा होता है। हमें लेखक से नैतिकता का सर्टिफ़िकेट नहीं चाहिए, हमें यह भरोसा चाहिए कि वह अपने शब्दों के साथ खड़ा है।
एक समय में मुझे नागार्जुन की ‘सिंदूर तिलकित भाल’, ‘बहुत दिनों के बाद’, ‘मादा सूअर’, ‘एक फाँक आँख एक फाँक नाक’ जैसी कविताएँ बहुत पसंद थीं; मगर उनकी मृत्यु के बाद जब उन पर एक बाल यौन शोषक होने के आरोप सामने आए तो मेरे लिए उन कविताओं की ध्वनि ख़त्म हो गई... वे शब्द अब खोखले बजते हैं। उनकी काव्य-धारा सूख गई मेरे लिए... वह जुए में हारे या किसी मारपीट करने वाले सड़कछाप ग़ुंडे से बदतर साबित हुए; क्योंकि ऐसे लोग कम से कम दुनिया के सामने अपने असली रूप में हैं, मगर यहाँ पर अपने जनकवि के रूप में साधारण से ज्यादा संवेदनशील का स्वाँग रचने वाला असंवेदनशील व्यक्ति एक ऐसे मासूम का लाभ उठाने की कोशिश करना जो अपने साथ किए बुरे व्यवहार को परिभाषित करने की स्थिति में भी नहीं, अक्षम्य है।
अफ़सोस है कि एक पोस्ट में समकालीन कवि और मेरे बहुत प्रिय वरिष्ठ आलोचक ने विक्टिम पर ही सवाल उठा दिए जैसा कि हमेशा से कहा जाता है। हमें पता है कि विक्टिम को आज अपनी बात कहकर कोई लाभ नहीं होगा; यहाँ तक कि वह उस व्यक्ति से प्रतिशोध की मानसिक सांत्वना भी नहीं हासिल कर सकता, ऐसे में हम उस घुटन की कल्पना कर सकते हैं, जो उसके भीतर रही होगी।
यूरोप की एक बहुत लोकप्रिय लोककथा है, हम सबने कहीं न कहीं पढ़ी या सुनी होगी : ‘लिटिल रेड राइडिंग हुड’, जहाँ एक भेड़िया नानी के वेश में मासूम बच्ची को खाने का प्रयास करता है। एक अमेरिकी विद्वान और साहित्य आलोचक जैक ज़िप्स जो लोककथाओं, मिथकों और बच्चों के साहित्य के अध्येता के तौर पर जाने जाते हैं, अपनी किताब ‘द ट्रायल एंड ट्रिब्यूलेशंस ऑफ़ लिटिल रेड राइडिंग हुड’ (1993) में कहते हैं, “लिटिल रेड राइडिंग हुड एक चेतावनी है जो युवा लड़कियों को सामाजिक और यौन ख़तरों से आगाह करती है। यह कहानी पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं की कमज़ोर स्थिति और उनके शोषण के डर को दर्शाती है।”
हाल के दिनों में आलोकधन्वा के सोशल मीडिया से जुड़े विवाद और फ़िराक़ गोरखपुरी की अलका पाठक द्वारा लिखी जीवनी (फ़िराक़ गोरखपुरी : द मैन बिहाइंड द जीनियस) पर केंद्रित अमिता शीरीं के लेख के बहाने यही सवाल दोबारा उठ खड़े हुए हैं। निःसंदेह ये सभी लोग अपनी विधाओं में बेहतरीन रचनाकार रहे हैं। इनकी लेखनी से जाने कितने लोग प्रभावित भी हुए होंगे, मगर क्या हम उनके लिखे को उनकी शख़्सियत से अलग करके देख पाएँगे? मैंने बचपन में ‘धर्मयुग’ या ऐसी ही किसी पत्रिका में फ़िराक़ का एक इंटरव्यू पढ़ा था, जिसमें उन्होंने स्टूडियो फ़ोटोग्राफरों की लानत-मलामत करते हुए कहा था कि उनका सबसे बड़ा अपराध है कि वे भैंस जैसी औरतों को सुंदर बनाकर प्रस्तुत करते हैं और बहुत सारे बेचारे युवा उनसे शादी कर लेते हैं। यह बात तब सेंस ऑफ़ ह्यूमर की तरह लिखी गई थी, मगर आज के समय में इस बात के मायने बहुत बदल जाते हैं।
साहित्य हमारे भीतर अच्छे और बुरे का विवेक पैदा करता है और बहुत बार साहित्य सामाजिक रूढ़ियों को इसलिए चुनौती देता है, क्योंकि अच्छे बुरे के बीच की रेखा समय के साथ धुंधली और रूढ़ हो जाती है। मगर किसी भी पाठक के मन में जब अपने प्रिय रचनाकार की छवि खंडित होती है तो उसे वाक़ई तकलीफ़ से गुज़रना पड़ता है, वह ख़ुद-को ठगा-सा महसूस किया होता है, अर्थशास्त्र की भाषा में कहें तो उसने ख़ुद को रचनाकार में ‘इन्वेस्ट’ किया होता है, हम क्यों उस छवि को खंडित होते देखना चाहेंगे; क्या सिर्फ़ यह कह देने से बात बन जाएगी कि रचना को रचनाकार से अलग करके देखो, कैसे देख सकते हैं भला? और उससे अहम बात कि ‘क्यों ही देखें?’
आइए इस बात को आज के दौर में पॉपुलर कल्चर के ज़रिये समझने की कोशिश करते हैं। दुनिया भर के युवा जिनका स्पाइडर मैन से परिचय हुआ है, इस संवाद से भी अनभिज्ञ न होंगे, With great power comes great responsibility... ज़्यादातर लोग इसे सैम रैमी की फ़िल्म ‘द अमेजिंग स्पाइडर मैन’ से लिया गया डॉयलाग मानते हैं, मगर यह संवाद अस्ल में सन् 1962 में अस्तित्व में आया था, जब स्पाइडर मैन कॉमिक्स में अपनी असाधारण शक्तियों का सही इस्तेमाल पीटर पार्कर नहीं सीख पाया था और अंकल बेन की मृत्यु के बाद उसे समझ में आता है कि अपनी शक्तियों का सही उपयोग करना उसकी ज़िम्मेदारी है। कॉमिक्स के अंत में एक नैरेटिव टेक्स्ट लिखा हुआ आता है, “And a lean, silent figure slowly fades into the gathering darkness, aware at last that in this world, with great power there must also come—great responsibility!”
जाने दुनिया के कितने युवाओं ने सिर्फ़ इसी वाक्य से ज़िम्मेदार होना सीखा होगा, फिर आप एक लेखक होकर अपने लिखे शब्दों के प्रति ज़िम्मेदार क्यों नहीं होंगे? नहीं हो सकते तो लिखना छोड़ दें। धरती के बोझ में थोड़ी कमी आएगी... कुछ पेड़ कम कटेंगे।
बाल यौन शोषण और यौन हमले किसी भी समाज में मूल्य नहीं हो सकते और ऐसा करने वालों की कितनी भी अच्छी रचनाएँ हिटलर के ओजस्वी भाषणों और किसी पाखंडी, बलात्कारी बाबा के सुंदर मधुर प्रवचनों से ज़्यादा महत्त्व नहीं रखती हैं। उन रचनाओं का क्या अर्थ जिन्हें लिखने वाला मनुष्यता के सामान्य स्तर से गिर चुका हो।
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बेला पॉपुलर
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