नाव पर कविताएँ

कवियों ने नाव को जीवन

और गति के प्रतीक के रूप में देखा है। जीवन के भवसागर होने की कल्पना में पार उतरने का माध्यम नाव, नैया, नौका को ही होना है।

चाँद पर नाव

हेमंत कुकरेती

एक सूनी नाव

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

हमारी नाव

नरेंद्र जैन

आँखें

राकेश मिश्र

मेरी नाव तैयार है

बजरंग बिश्नोई

पुकार

केशव तिवारी

निरधार

मुकुंद लाठ

तब नाव नहीं थी

मोहन राणा

झील एक नाव है

प्रेमशंकर शुक्ल

डोलती नाव

ममता बारहठ

नाव

सत्येंद्र कुमार

नाव का हम क्या करते

कमल जीत चौधरी

नौका-विहार

ज्ञानेंद्रपति
बोलिए