अनाइस नीन के उद्धरण

अगर मुझे इसे स्वीकार करना चुनना पड़े, तो मेरा लक्ष्य यह है कि मैं वास्तव में जो हूँ उसे स्वीकार कर लूँ। मैं अपने विचारों, अपने रंग-रूप, अपने गुणों, अपनी ख़ामियों पर गर्व कर सकूँ, और इस हमेशा की चिंता को रोक सकूँ कि मैं जैसी हूँ, मुझसे उसी रूप में प्यार नहीं किया जा सकता है।
अनुवाद : सरिता शर्मा
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अपने सपनों को अंतरिक्ष में पतंग की तरह फेंक दो, और तुम नहीं जानते कि वह वापस क्या लाएगा— नया जीवन, नया दोस्त, नया प्यार, या कोई नया देश।
अनुवाद : सरिता शर्मा

मैं, मृत्यु को ज़िंदा रहकर, दुःख सहकर, ग़लतियाँ करके, ज़ोखिम उठाकर, देकर, गँवाकर स्थगित करती हूँ।
अनुवाद : सरिता शर्मा
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हम अबाध रूप से, कालक्रम से नहीं बढ़ते हैं। हम कभी-कभी असमान रूप से एक पहलू में आगे बढ़ते हैं, दूसरे में नहीं। हम थोड़ा-थोड़ा करके बढ़ते हैं। हम तुलनात्मक रूप से आगे बढ़ते हैं। हम एक क्षेत्र में परिपक्व हैं, दूसरे में बचकाने। अतीत, वर्तमान और भविष्य मिलकर हमें पीछे धकेलते हैं, आगे बढ़ाते हैं या हमें वर्तमान में स्थिर कर देते हैं। हम परतों, कोशिकाओं, ज्योति पुंजों से मिलकर बने हैं।
अनुवाद : सरिता शर्मा
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जीवन को केवल वे लोग वास्तव में जानते हैं जो दुःख उठाते हैं, हार जाते हैं, विपत्ति सहन करते हैं और एक के बाद एक हार का सामना करते हैं।
अनुवाद : सरिता शर्मा
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दरअसल मैं सामान्य, औसत, आदर्श नहीं बनना चाहती हूँ। मैं बस अपने जीवन को और पूर्णता से जीने, और अधिक आनंद लेने और अधिक अनुभव करने के लिए ज़्यादा ताक़त और साहस प्राप्त करना चाहती हूँ। मैं और भी मौलिक और स्वच्छंद विलक्षणताएँ विकसित करना चाहती हूँ।
अनुवाद : सरिता शर्मा
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हमारी संस्कृति ने सिर्फ़ मिलनसार होने को गुण बना दिया। हमने आंतरिक यात्रा, केंद्र के लिए खोज को हतोत्साहित कर दिया है। हमने अपनी जड़ को खो दिया है। उसे फिर से तलाश करना है।
अनुवाद : सरिता शर्मा
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संबंधित विषय : संस्कृति
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सपने कार्य की सच्चाई का भाग हो जाते हैं। कार्यों से फिर से सपने उपजते हैं, और यह परस्पर निर्भरता जीवन के उच्चतम रूप का निर्माण करती है।
अनुवाद : सरिता शर्मा
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हम अन्य राज्यों, अन्य ज़िंदगियों, अन्य आत्माओं की तलाश में सफ़र करते हैं, हम में से कुछ लोग हमेशा भटकते रहते हैं।
अनुवाद : सरिता शर्मा
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बेहतरीन के लिए मेरी ललक इतनी ज़्यादा है कि सिर्फ़ अद्भुत ही मुझे शक्तिशाली लगता है। कोई भी चीज़, जिसे मैं अद्भुत में नहीं बदल सकती हूँ, मैं उसे छोड़ देती हूँ। असलियत मुझे प्रभावित नहीं करती है। मैं केवल उन्माद में, भावातिरेक में विश्वास करती हूँ, और जब सामान्य जीवन मुझे रोकता है, तो मैं, इस तरफ़ या दूसरी तरफ़ पलायन कर जाती हूँ। और दीवारें नहीं चाहिए।
अनुवाद : सरिता शर्मा
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व्यग्रता प्रेम के लिए सबसे अधिक घातक है। इससे आप ऐसा महसूस करते मानो किसी डूबते हुए आदमी ने आपको पकड़ लिया है। आप उसे बचाना चाहते हैं, लेकिन आपको पता है कि वह अपनी घबराहट से आपका दम घोंट देगा।
अनुवाद : सरिता शर्मा
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संबंधित विषय : प्रेम
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क्योंकि को मत खोजो— प्यार में कोई क्योंकि, कोई कारण, कोई स्पष्टीकरण, कोई समाधान नहीं है।
अनुवाद : सरिता शर्मा
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संबंधित विषय : प्रेम
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हर एक दोस्त हमारे अंदर एक दुनिया का प्रतिनिधित्व करता है, ऐसी दुनिया जो शायद तब तक पैदा नहीं होती, जब तक वे पहुँच नहीं जाते हैं और बस इस मेल से ही नई दुनिया पैदा होती है।
अनुवाद : सरिता शर्मा
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संबंधित विषय : संसार
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जब भी हम ऐसा कुछ करते हैं जो हमारी इच्छा या आत्मा से जुड़ा हुआ नहीं होता है— वह कष्ट का कारण बनता है।
अनुवाद : सरिता शर्मा
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संबंधित विषय : आत्मा
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आत्मनिरीक्षण खाने वाला दानव है। आपको इसे बहुत सारी सामग्री, बहुत सारे अनुभवों, अनेक लोगों, अनेक स्थानों, कई प्रेमों, कई रचनाओं का भक्षण कराना होगा, और तब यह आपको खाना बंद कर देता है।
अनुवाद : सरिता शर्मा
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संबंधित विषय : अनुभव
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जीवन बनने की प्रक्रिया है, उन स्थितियों का संयोजन है जिनसे हमें गुज़रना है। लोग तब असफल होते हैं, जब वे किसी स्थिति को चुनना चाहते हैं और उसमें रहते हैं। यह एक तरह की मौत है।
अनुवाद : सरिता शर्मा
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संबंधित विषय : जीवन
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हम जीवन का लुत्फ दो बार उठाने के लिए लिखते हैं, एक बार उस पल में और दूसरी बार उसके पुनरावलोकन में।
अनुवाद : सरिता शर्मा
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संबंधित विषय : जीवन
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हम चीज़ों को वैसे नहीं देखते हैं, जैसी कि वे होती हैं, बल्कि उन्हें वैसे देखते हैं जैसे कि हम होते हैं।
अनुवाद : सरिता शर्मा
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संबंधित विषय : चीज़ें
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लोगों को बचाया नहीं जा सकता है, उनसे सिर्फ़ प्यार किया जा सकता है।
अनुवाद : सरिता शर्मा
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संबंधित विषय : प्रेम
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गहराई से जिया गया व्यक्तिगत जीवन हमेशा उसके परे सच्चाइयों में फैल जाता है।
अनुवाद : सरिता शर्मा
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और वह दिन आया जब एक कली में फंसे रहने का जोख़िम खिलने के जोख़िम से ज़्यादा दर्दनाक था।
अनुवाद : सरिता शर्मा
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संबंधित विषय : दिन
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अगर तुम ख़ुद को सिर्फ़ संभव या उचित लगने वाली चीज़ों तक सीमित रखते हो, तो तुम ख़ुद को उससे अलग कर लेते हो, जिसे तुम सच में चाहते हो और बाक़ी जो कुछ भी बचा है, वह समझौता है।
अनुवाद : सरिता शर्मा
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संबंधित विषय : सच
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