मानवीय चरित्र की सभी कुरूपताओं के दर्शन करने हो, तो वरिष्ठ पदाधिकारियों का अपने अधीनस्थों के साथ व्यवहार देख लेना चाहिए।
हिंदी ही नहीं, कोई भी भाषा जब दफ़्तरों में घुसती है तो उसका एक बँधा-बँधाया शब्द-जाल विकसित होता है—वह टकलाली स्वरूप ग्रहण कर लेती है।
मैं सीढ़ियों पर परिहास की पात्र थी और मेरा कार्यालय एक रूमाल था।
कार्यालय एवं प्रेम के मामलों को छोड़कर अन्य सभी बातों में मित्रता स्थिर रहती है। अतः प्रेम में सभी हृदय अपनी भाषा को प्रयोग करते हैं। हर नेत्र स्वयं बात करे और किसी माध्यम पर विश्वास न करे।