मिथक पर उद्धरण
मिथक शब्द मिथ या माइथॉस
का हिंदी रूपांतरण है। इसका सामान्य अर्थ लोकरूढ़ि या अनुश्रुति है। यह पुरातन को नवीन परिप्रेक्ष्य में रखते हुए सत्य की प्रतिष्ठा करता है। यह प्रतीकों पर आश्रित होता है लेकिन स्वयं प्रतीक नहीं होता है। समाज और साहित्य में मिथकों की अपनी उपयोगिता रही है। प्रस्तुत चयन में मिथकों के प्रयोग से बुनी कविताओं का संकलन किया गया है।
जैसे उपन्यास का सच संसार के सच से ज़्यादा सच्चा होता है, उसी तरह हमारा पुराण-सत्य, हमारा मिथक-सत्य—आपके इतिहास-सत्य से कहीं ज़्यादा ऊँचा है।
प्रेम की भावना हम सभी को दूसरे व्यक्ति को जानने की भ्रामक मिथ्या धारणा देती है।
जब पृथ्वी नहीं थी, सूर्य तब भी था। किंतु उसका उदय-अस्त नहीं था, दिन-रात नहीं थे, वर्ष नहीं थे, ऋतु-परिवर्तन भी नहीं था। ये सभी पृथ्वी के आने के बाद आए। सूर्य को सार्थकता पृथ्वी ने दी। अगर पृथ्वी न होती तो सूरज अकारथ हो जाता। पृथ्वी न होती तो सौर-मंडल में मौत का सन्नटा होता। सूर्य के और भी बालक हैं ज़रूर, पर वे तो मरे हुए जन्में थे। किसी में भी प्राण-प्रतिष्ठा न हो सकी। सूर्य की जीवित संतान तो है एकमात्र पृथ्वी।
परंपरा न मिथक होती है, न इतिहास। दोनों के तत्त्व उसमें घुले-मिले होते हैं।