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अहंकार पर कविताएँ

यहाँ प्रस्तुत चयन में

अहंकार विषयक कविताओं को संकलित किया गया है। रूढ़ अर्थ में यह स्वयं को अन्य से अधिक योग्य और समर्थ समझने का भाव है जो व्यक्ति का नकारात्मक गुण माना जाता है। वेदांत में इसे अंतःकरण की पाँच वृत्तियों में से एक माना गया है और सांख्य दर्शन में यह महत्त्व से उत्पन्न एक द्रव्य है। योगशास्त्र इसे अस्मिता के रूप में देखता है।

एक तिनका

अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध

अहम्मन्य

स्टीफन स्पेंडर

अपना अहंकार तुम गाते रहे रात भर

कृष्ण मुरारी पहारिया

मैं

जावेद आलम ख़ान

ज़िद

सुधांशु फ़िरदौस

?

पद्मजा शर्मा

अहम्

मदनलाल डागा

दंभ

सुनील झा