होली पर कविताएँ

रंग-उमंग का पर्व होली

कविताओं में व्यापक उपस्थिति रखता रहा है। होली में व्याप्त लोक-संस्कृति और सरलता-सरसता का लोक-भाषा की दहलीज़ से आगे बढ़ते हुए एक मानक भाषा में उसी उत्स से दर्ज हो जाना बेहद नैसर्गिक ही है। इस चयन में होली और होली के विविध रंगों और उनसे जुड़े जीवन-प्रसंगों को बुनती कविताओं का संकलन किया गया है।

मछलीघर

हेमंत देवलेकर

गले मिलते रंग

विनोद दास

गेहूँ की सोच

प्रभाकर माचवे

जल रहा है

केदारनाथ अग्रवाल

यह फागुनी हवा

फणीश्वरनाथ रेणु

फागुनी शाम

नामवर सिंह

रंगों का उत्सव

रविशंकर उपाध्याय

होली का गीत

एकांत श्रीवास्तव