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लोकतंत्र पर ग़ज़लें

लोकतंत्र जनता द्वारा,

जनता के लिए, जनता का शासन है। लोकतंत्र के गुण-दोष आधुनिक समय के प्रमुख विमर्श-विषय रहे हैं और इस संवाद में कविता ने भी योगदान किया है। प्रस्तुत चयन ऐसी ही कविताओं का है।

बालू के देवार बा, बाबा

तैयब हुसैन पीड़ित

आनिक ने बात कोनो

विभूति आनंद

लोर हर बात के गवाही बा

सतीश्वर सहाय वर्मा ‘सतीश’

अदालतमे चिता

राम चैतन्य धीरज

आक्रोश स' भरल छै

विभूति आनंद

हम नदी ओ समुंदर रहै

आनन्द मोहन झा

गत्र-गत्र फाटल छै

विभूति आनंद

घराएने उठैत छै

विभूति आनंद

कतय छै आँच बूझल छै

आनन्द मोहन झा

'आक्थू:' हे अहांक

विभूति आनंद