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स्वप्न पर ग़ज़लें

सुप्तावस्था के विभिन्न

चरणों में अनैच्छिक रूप से प्रकट होने वाले दृश्य, भाव और उत्तेजना को सामूहिक रूप से स्वप्न कहा जाता है। स्वप्न के प्रति मानव में एक आदिम जिज्ञासा रही है और विभिन्न संस्कृतियों ने अपनी अवधारणाएँ विकसित की हैं। प्रस्तुत चयन में स्वप्न को विषय बनाती कविताओं को शामिल किया गया है।

हमारी ख़्वाहिश

रामप्रसाद बिस्मिल

साध-सपना हिया

ए. कुमार ‘आँसू’

आदमीयत के धरम

ए. कुमार ‘आँसू’

नैनन से आँसू

ए. कुमार ‘आँसू’

सादा कागज पर चिचरी पराइल करी

सतीश्वर सहाय वर्मा ‘सतीश’

अवधारि बैसल छी

सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी

वक्त के मार सह रहल बानी

नागेन्द्र प्रसाद सिंह

अहाँ जानै छी

राम चैतन्य धीरज

खल्लर मल्लर करै

अशोक अज्ञानी

हृदयक सिनेह

सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी

हम नदी ओ समुंदर रहै

आनन्द मोहन झा

मधुवन का शिकायत रहल

नागेन्द्र प्रसाद सिंह

ज़िंदगी

नवल बिश्नोई

फूल भी क्या खिले हैं

डॉ. वेद मित्र शुक्ल

हिन्दवी उत्सव 2026

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