शूद्रक के उद्धरण

घोर अंधकार में जिस प्रकार दीपक का प्रकाश सुशोभित होता है उसी प्रकार दुःख का अनुभव कर लेने पर सुख का आगमन आनंदप्रद होता है किंतु जो मनुष्य सुख भोग लेने के पश्चात् निर्धन होता है वह शरीर धारण करते हुए भी मृतक के समान जीवित रहता है।






निर्धनता मनुष्य में चिंता उत्पन्न करती है, दूसरों से अपमान कराती है, शत्रुता उत्पन्न करती है, मित्रों में घृणा का पात्र बनाती है और आत्मीय जनों से विरोध कराती है। निर्धन व्यक्ति की घर छोड़कर वन चले जाने की इच्छा होती है, उसे स्त्री से भी अपमान सहना पड़ता है। ह्रदयस्थित शोकाग्नि एक बार ही जला नहीं डालती अपितु संतप्त करती रहती है।

दैववश मनुष्य के भाग्य की जब होनावस्था (दरिद्रता) आ जाती है तब उसके मित्र भी शत्रु हो जाते हैं, यहाँ तक कि चिरकाल से अनुरक्त जन भी विरक्त हो जाता है।

जो पुत्रहीन है उसका घर सूना प्रतीत होता है। जिसका हार्दिक मित्र नहीं है उसका घर सदा से सूना है। मूर्खों के लिए दसों दिशाएँ सूनी हैं। निर्धन के लिए तो सब कुछ सूना है।
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निर्धनता से लज्जा होती है, लज्जित मनुष्य तेज़हीन हो जाता है, निस्तेज लोक से तिरस्कृत होता है, तिरस्कार से ग्लानि को प्राप्त होता है, ग्लानि होने पर शोक उत्पन्न होता है। शोकातुर होने से बुद्धि क्षीण हो जाती है और बुद्धिरहित होने से मनुष्य नाश को प्राप्त होता है। अहो! निर्धनता सभी विपत्तियों की जड़ है।
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