विष्णु शर्मा के उद्धरण

आयु के बीत जाने पर भी जिनके पास धन है, वे तरुण हैं। धन-हीन युवक होते हुए भी वृद्ध हो जाते हैं।
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धन के उपार्जन में दुःख होता है। और उपार्जित धन की रक्षा में भी दुःख होता है। आय में दुःख व्यय में दुःख। सब प्रकार से दुःख देने वाले धन को धिक्कार है।
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धीर और मनस्वी मनुष्य के लिए क्या अपना देश है और क्या विदेश है? वह तो जिस देश में जाता है, उसी को अपने भुजा-बल से अपने वश में कर लेता है।
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इस लोक में बुद्धिमानों की बुद्धि से अगम्य कुछ भी नहीं है। देखो शस्त्रास्रधारी नंदवंशी राजाओं को चाणक्य ने बुद्धि द्वारा ही नष्ट कर दिया था।
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संबंधित विषय : बुद्धिजीवी
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पंडित मूर्खों के, धनी निर्धनों के, व्रती पापियों के द्वेष्य होते हैं तथा कुल स्त्रियाँ कुलटाओं की द्वेष्य होती है।
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दरिद्री व्यक्ति के स्वजन भी सर्वदा दुर्जन बन जाते हैं।
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संबंधित विषय : व्यक्ति
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बुद्धिमान लोग इस संसार में गोदान, पृथ्वीदान तथा अन्नदान को भी उतना श्रेष्ठ नहीं बताते जितना श्रेष्ठ सब दानों में अभयदान को बताते हैं।
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संबंधित विषय : संसार
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शीत में अग्नि अमृत है, प्रिय दर्शन अमृत है, राज-सम्मान अमृत है तथा क्षीर का भोजन अमृत है।
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संबंधित विषय : जीवन
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जिसके घर से अतिथि असम्मानित होकर दीर्घश्वास छोड़ता हुआ चला जाता है, उसके घर से पितरों सहित देवता विमुख होकर चले जाते हैं।
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संबंधित विषय : घर
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बुद्धिमान पुरुष (असमय में) कछुए की तरह अंग सिकोड़ लें और मार खाकर भी चुप रह जाए किंतु अवसर आने पर काले साँप के समान उठ खड़ा हो।
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संबंधित विषय : साँप
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स्त्री के वचनों से प्रेरित मनुष्य अकरणीय को करणीय मानते हैं, अगम को सुगम समझते हैं तथा अभक्ष्य को भक्ष्य मानते हैं।
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