छायावाद के कवि शब्दों को तोलकर रखते थे, प्रयोगवाद के कवि शब्दों को टटोल कर रखते थे, नई कविता के कवि शब्दों को गोलकर रखते थे—सन् साठ के बाद के कवि शब्दों को खोल कर रखते हैं।
डॉ. रामविलास शर्मा को प्रयोगवादी या नई कविता में, ‘असुंदर’ और ‘विद्रूप’ से अधिक कुछ नहीं दिखता।