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वर्षा पर गीत

ऋतुओं का वर्णन और उनके

अवलंब से प्रसंग-निरूपण काव्य का एक प्रमुख तत्त्व रहा है। इनमें वर्षा अथवा पावस ऋतु की अपनी अद्वितीय उपस्थिति रही है, जब पूरी पृथ्वी सजल हो उठती है। इनका उपयोग बिंबों के रूप में विभिन्न युगीन संदर्भों के वर्णन के लिए भी किया गया है। प्रस्तुत चयन में वर्षा विषयक विशिष्ट कविताओं का संकलन किया गया है।

वह बोली, सावन आया है

ज्ञान प्रकाश आकुल

अबकी बार हुई है बारिश

विभूति तिवारी

राधे यह कैसी विडंबना

ज्ञानवती सक्सेना

आन्ही आइल पानी आयल

रामजियावान दास ‘बावला’

ना अइलऽ बरिसात में

सूर्यदेव पाठक ‘पराग’

मेघ उमड़े-घुमड़े घनघोर

रमाकान्त मुकुल

मारैला सवनवाँ कटार हो

रामजियावान दास ‘बावला’

बरखा बहार

भोलानाथ गहमरी

भींजे धानी चुनरी

भोलानाथ गहमरी

अब के सावन

प्रसून जोशी

बादल उठे

देवेंद्र कुमार बंगाली

भीग गई धरती शरम से

अन्नू रिज़वी

बरसात

देवेंद्र कुमार बंगाली

लू के झोंकों झुलसे हुए थे जो

सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'