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रज़ा स्मृति : सतपुड़ा, नर्मदा, बेमज़ा वक्ता

नर्मदा के किनारे, सतपुड़ा की तलहटी में बसे मंडला में हमारे पहुँचने के दिन से शायद ही कोई ऐसा दिन गुज़रा हो जब बारिश न हुई हो। लौटते-लौटते मुख्य पुल के बग़ल का ‘रपटा’, जिस पर कुछ दिन पहले तक स्थानीय लोग और आगंतुक टहल रहे थे, पूरी तरह डूब चुका था। बरसात इस पूरे आयोजन की केवल पृष्ठभूमि नहीं थी; वह उसकी सबसे सजीव उपस्थिति थी। वक्ताओं और श्रोताओं की ज़बान और चेतना में इन दिनों भवानी प्रसाद मिश्र की कविता लगातार लरज़ती रही :

सतपुड़ा के घने जंगल
नींद में डूबे हुए-से,
ऊँघते अनमने जंगल
झाड़ ऊँचे और नीचे
चुप खड़े हैं आँख भींचे;
घास चुप है, काश चुप है
मूक शाल, पलाश चुप है;
बन सके तो धँसो इनमें,
धँस न पाती हवा जिनमें,
सतपुड़ा के घने जंगल

ऐसा लगता था मानो कविता मंडला के इस भू-दृश्य से नहीं, बल्कि उसी बारिश, उसी हरियाली और उसी नदी से जन्म ले रही हो।

मध्य प्रदेश के मंडला में दो चीज़ें जगत-विख्यात हैं। एक पतित-पाविनी, या अशोक वाजपेयी के शब्दों में ‘पुण्यदा नर्मदा’; दूसरी चित्रकार सैयद हैदर रज़ा। अशोक वाजपेयी बताते हैं कि ‘नर्मदा’ कहने पर रज़ा तुरंत टोक देते—“नर्मदा जी कहिए!” मंडला पहुँचते ही वह सबसे पहले नर्मदा को दंडवत प्रणाम करते थे। रज़ा के स्वभाव का एक और प्रसंग अशोक वाजपेयी अक्सर सुनाते हैं। वर्ष 2000 में जब वह दक्षिण फ़्रांस स्थित रज़ा के गाँव ट्रस्ट के दस्तावेज़ लेकर पहुँचे, तो तीन दिन तक केवल फ़ाउंडेशन के नाम पर बहस होती रही। रज़ा इस बात से असहज थे कि पैसा भी वे दें और संस्था का नाम भी उन्हीं के नाम पर रखा जाए। अशोक वाजपेयी ने समझाया कि उनके नाम से संस्था की पहचान और विश्वसनीयता जल्दी बनेगी। तब जाकर वह ‘रज़ा फ़ाउंडेशन’ नाम पर राज़ी हुए।

हम सब ‘रज़ा फ़ाउंडेशन’ के पच्चीसवें वर्ष और रज़ा की दसवीं पुण्यतिथि के अवसर पर आयोजित ‘रज़ा स्मृति 2026’ में शामिल होने मंडला पहुँचे थे। आए हुए अतिथियों में से अधिकांश (शायद सभी) यह स्वीकार करेंगे कि रज़ा फ़ाउंडेशन के उदार आमंत्रण और उनके सुविचारित इंतज़ामों के बिना शायद ही वह कभी मंडला आते। महानगरीय जीवन जैसी सुविधाएँ यहाँ भले न हों, लेकिन साहित्य और ललित कलाओं के कार्यक्रमों से परे भी दूरस्थ ग्राम्य जीवन का अपना अलग आकर्षण है। यही कारण था कि लगभग सभी अतिथि रज़ा फ़ाउंडेशन और अशोक वाजपेयी के प्रति कृतज्ञता से भरे हुए थे।

इस प्रंसग में दिलचस्प यह था कि अशोक वाजपेयी बार-बार आग्रह करते रहे—“मुझे या फ़ाउंडेशन को धन्यवाद देने के बजाय विषय पर बात कीजिए।” लेकिन भाव-विभोर वक्ता स्वयं को उनका आभार व्यक्त करने से रोक नहीं पा रहे थे। शायद यह आयोजन केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक लंबे सांस्कृतिक कर्म के प्रति सार्वजनिक सम्मान भी था।

हम जैसे अपेक्षाकृत युवा प्रतिभागियों को ‘विट्ठल इन’ और ट्रस्टियों तथा वरिष्ठ संस्कृतिकर्मियों को ‘किंगफ़िशर’ होटल में ठहराया गया। पहले मुझे लगा कि दोनों नामों में कोई संबंध अवश्य होगा। आख़िर विजय माल्या के प्रसिद्ध शराब-व्यवसाय की नींव रखने वाले उनके पिता विट्ठल माल्या ही थे। लेकिन जल्दी ही पता चला कि इस ‘किंगफ़िशर’ का माल्या से कोई लेना-देना नहीं। 

18 से 23 जुलाई तक चले इस आयोजन में महिष्मती घाट पर लकड़ी पर नक़्क़ाशी कार्यशाला तथा रज़ा कला वीथिका में चित्रशाला कार्यशाला, चित्रकला प्रदर्शनी और गोंड चित्रशैली प्रदर्शनी आयोजित की गई। सांस्कृतिक संध्याओं में नृत्य और गायन के अलावा ऋतु वर्मा ने प्रभावशाली पंडवानी प्रस्तुत की, उर्दू कविता-पाठ हुआ और कल्पना सिंह ने मणिपुरी नृत्य की आकर्षक प्रस्तुति दी। 

साहित्यिक सत्रों में ‘रज़ा स्मृति समवाय’ के अंतर्गत ‘साहित्य और प्रकृति’, ‘साहित्य और संसार’ तथा ‘साहित्य और कलाएँ’ विषयों पर वक्ताओं ने अपने विचार रखे। स्थानीय युवाओं को फ़ाउंडेशन से जोड़ने की पहल के तहत पीएमश्री रानी दुर्गावती पीजी कॉलेज, मंडला में विद्यार्थियों के बीच एक साहित्यिक गोष्ठी का भी आयोजन किया गया। अंतिम दिन प्रातः बिछिया क़ब्रिस्तान में सैयद हैदर रज़ा की कब्र पर पुष्पांजलि अर्पित की गई। सायंकाल पूनम तिवारी की रंग-संगीत प्रस्तुति के साथ ‘रज़ा स्मृति 2026’ का गरिमामय समापन हुआ।
लेकिन आयोजनों का मूल्य केवल उनकी रूपरेखा से नहीं, उनमें होने वाले विचार-विमर्श से तय होता है।

यहाँ ज़्यादातर वक्ता बिना पर्याप्त तैयारी के आए थे। कई बार लगा कि वे किसी तरह उन्हें सौंपा गया विषय पूरा भर कर देना चाहते हैं। अशोक वाजपेयी स्वयं कई बार उस प्रसंग का उल्लेख करते हैं कि ‘युवा’ के अंतर्गत जब उन्होंने पैंसठ युवा लेखकों को मुक्तिबोध पर बोलने के लिए आमंत्रित किया था, तब किसी वक्ता ने मुक्तिबोध का नाम तक नहीं लिया। इस बार भी कई वक्तव्य विषय से दूर भटकते दिखाई दिए। हालाँकि कुछ वक्ताओं ने सचमुच प्रभावित किया। उदाहरण के लिए, उदयन वाजपेयी ने ‘साहित्य और कला’ विषय पर बोलना शुरू किया तो मन हुआ कि वे बोलते ही रहें। उन्होंने विषय को केवल समझाया नहीं, बल्कि उसके भीतर छिपे रिश्तों को भी उजागर किया।

मैं अन्य अच्छे वक्ताओं के नाम जानबूझकर नहीं ले रहा, क्योंकि उससे उतना अच्छा न बोल पाने वालों की भी अनायास पहचान हो जाएगी। मेरा मानना है कि हर अच्छा लेखक अच्छा वक्ता भी हो, यह अपेक्षा अनुचित है। लेकिन यदि वक्तृत्व से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध न भी कर सकें, तो कम-से-कम विषय पर कोई नई अंतर्दृष्टि लेकर आएँ। कोई ऐसा विचार, कोई ऐसा संदर्भ, कोई ऐसा प्रश्न जो श्रोता अपने साथ वापस ले जाए। तैयारी का अर्थ केवल नोट्स बनाना नहीं, बल्कि विषय के साथ कुछ समय बिताना भी है।

हिंदी साहित्यिक आयोजनों की एक पुरानी बीमारी समय-अनुशासन की भी है। मंच मिलते ही उसे छोड़ने की इच्छा समाप्त हो जाती है। निर्धारित समय-सीमा का सम्मान शायद हमारे साहित्यिक संस्कार का हिस्सा अभी तक नहीं बन पाया है। यह छोटी बात लग सकती है, लेकिन अच्छे आयोजनों की गुणवत्ता ऐसे ही छोटे अनुशासनों से बनती है।

अशोक वाजपेयी स्वयं को सबसे पहले एक संस्कृतिकर्मी और सांस्कृतिक संस्थाओं के निर्माता के रूप में याद किया जाना पसंद करते हैं, और यह उचित भी है। विशेषकर इसलिए कि उनकी पीढ़ी के बहुत कम साहित्यकारों की ललित कलाओं में ऐसी गहरी रुचि और समझ रही। वह बार-बार कहते हैं कि उन्होंने पूरी ज़िंदगी साहित्यकारों और अन्य कलाकारों को एक मंच पर लाने की कोशिश की, ताकि वे एक-दूसरे से संवाद करें और संभव हो तो साथ मिलकर कुछ रचें भी। उनके अनुसार, पूरी तरह सफल न हो पाने के बावजूद उन्होंने नए प्रयोग करना कभी नहीं छोड़ा। वह यह भी स्पष्ट करते हैं कि रज़ा फ़ाउंडेशन कोई साहित्यिक संस्था नहीं; बल्कि संस्कृति को समर्पित संस्था है, साहित्य उसकी गतिविधियों का केवल एक हिस्सा है। विभिन्न विषयों पर फ़ाउंडेशन लगभग हर सप्ताह कार्यक्रम आयोजित करता है।

दरअस्ल, ऐसे आयोजनों की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल व्याख्यान या प्रस्तुतियाँ नहीं होतीं। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह होती है कि वे लोगों को उन जगहों तक ले जाते हैं, जहाँ वे अन्यथा शायद कभी न पहुँचें। रज़ा स्मृति ने भी यही किया। उसने प्रतिभागियों को केवल रज़ा की स्मृति से नहीं; बल्कि मंडला, नर्मदा, सतपुड़ा, गोंड संस्कृति और मध्य भारत के उस सांस्कृतिक भूगोल से भी जोड़ा; जिसकी चर्चा हमारे साहित्यिक विमर्श में अपेक्षाकृत कम होती है।

देश के दूरस्थ इलाक़ों में ऐसे साहित्यिक और बहु-कला उत्सव और अधिक होने चाहिए। संस्कृति केवल महानगरों में नहीं बसती; अक्सर उसकी सबसे गहरी आवाज़ें उन्हीं जगहों से आती हैं, जहाँ पहुँचने के लिए हमें थोड़ा रास्ता तय करना पड़ता है।

मंडला से लौटते हुए भी बारिश जारी थी। नर्मदा अपने पूरे वेग में बह रही थी और भवानी प्रसाद मिश्र की कविता जैसे मन में बार-बार लौट रही थी :

धँस न पाती हवा जिनमें,
सतपुड़ा के घने जंगल...

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