Font by Mehr Nastaliq Web

संसार पर ग़ज़लें

‘संसरति इति संसारः’—अर्थात

जो लगातार गतिशील है, वही संसार है। भारतीय चिंतनधारा में जीव, जगत और ब्रहम पर पर्याप्त विचार किया गया है। संसार का सामान्य अर्थ विश्व, इहलोक, जीवन का जंजाल, गृहस्थी, घर-संसार, दृश्य जगत आदि है। इस चयन में संसार और इसकी इहलीलाओं को विषय बनाती कविताओं का संकलन किया गया है।

जरूरत गाँव में

मिथिलेश ‘गहमरी’

रात के भेद

मिथिलेश ‘गहमरी’

का कहीं रउरा

अशोक द्विवेदी

सगरो मचल बवाल

मिथिलेश ‘गहमरी’

रात के भेद

मिथिलेश ‘गहमरी’

रोज़ बढ़ जाती हैं

सुनील मिश्र