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बिंदुघाटी 2.0 : मेहनत बहुत करनी है

भादों-विहार 

भादों दूभर महीना माना गया है। सावन की झँकोर जवानी उसमें नहीं होती। भादों की बरखा से धरती के कोश भर जाते हैं। 

सावन में धरती गल जाती है; ताल भरने लगते हैं, धान जड़ पकड़ लेते हैं, उनमें बियास आने लगती है... और तब भादों में, जंगल झाड़ियों से, चरागाह दूब से और सड़क के किनारे के पेड़-गाछ पत्तों से भर जाते हैं और तभी धान के बियास ले रहे पूँजे... मोखा बनने लगते हैं।

सावन में आम के पेड़ ख़ाली होने लगते हैं और भादों में उन पर मरगी छा जाती है। देर तक बचे रहने वाले भदौआ आम अब नहीं रहे। देर तक चलने वाला अब कुछ भी नहीं रहा। 
भादों में हरा रंग काही हो जाता है। 

भादों में घुमड़ते और धरती छूते स्तरी बादलों का काजर धरती के हरेपन पर उतर आता है।

भादों में झीलों, नालों, तालों में छींटा लगाकर गाँव के मछरखौवे [मछली मारने-खाने वाले] मछली फँसाते हैं। 

भादों में कहीं धूल नहीं होती। धूल होती है, लेकिन उसका स्वभाव नम होता है। वह आँखों में नहीं पड़ती है, वह धरती को पकड़कर अस्तित्व को मज़बूती देती है। 

भादों में सरपुतिया खाते हैं, आषाढ़ का खोदा हुआ काँद खाते हैं, तालाबों में फैला हुआ केरमुआ खाते हैं, गली हुई धरती को फोड़कर बाहर निकल आया भुइँफोर खाते हैं। तालाबों से निकालकर बेर्रा खाते हैं। भादों में तेल में तलकर महुए की घुघरी खाते हैं। 

भादों में भैंसों का दूध पतला हो जाता है, भादों में भैसें अधिक कजरी हो जाती है। 

भादों में धान की खेती से संतुष्ट किसान पशुओं को लेकर खेत या चरागाह में गीत गाते हैं। भादों की दुपहरी में किसी मड़ई में आ रही सरसराती हवा में मदाते हुए वे किसान ही लुंगी ओढ़कर सो जाते हैं।  

भादों में घरों से उठते धुँओं से बादल बनता है। भादों के बादल छप्परों के ऊपर आ बैठते हैं। 

भादों में संझौती जल्दी जल जाती है।

भादों में रात भर जीव-जंतु पंचायत करते हैं; बाँस चरमराते हैं, कुत्तों का झौं-झौं विलोपित हो जाता है।

भादों में शाम को घर लौटती चिड़ियाँ रास्ता भटक जाती हैं।

• मैना के हृदय में विरह का ताप भादों की भीषणताओं से मिलकर भय में बदल जाता है। वह सिरजन से कहती है : “भादो मास निसि भइ अँधियारी। रैन डरावन हौ घन भारी।।”

वह आगे कहती है : “संग न साथी न सखी सहेली। देखि फाटि हिय मंदिर अकेली।।”

एक गृहस्थिन का अकेले ही भादों का महीना काटना दूभर हुआ जा रहा है। 

मुल्ला दाऊद कृत ‘चंदायन’ के भादों का प्रभाव तुलसीदास के ‘रामचरितमानस’ के किष्किंधाकांड में भी दिखता है, राम जब कहते हैं : “घन घमंड नभ गरजत घोरा। प्रियाहीन डरपत मन मोरा॥” 

तुलसी ने यहाँ महीना नहीं बताया है, लेकिन निश्चित ही यह भादों के महीने पर ही लिखा गया होगा। इसे इस तरह भी देखें कि चंदायन में भादों के बाद क्वार महीने में आसमान में अगस्त उग आता और वह पानी से रिक्त होने लगता है। किष्किंधाकांड में भी इस बरखा-वर्णन के बाद शीत-ऋतु की शुरुआत होती है। 

इस काव्य के नायक राम ने सीता के साथ, साहचर्य का लंबा समय बिताया था। बहुत स्वाभाविक है कि भादों में बादलों के गर्जन-तड़पन में दोनों जन एक दूसरे के संबल बने होंगे। लेकिन अब इस वर्ष जब सीता पास नहीं हैं, तो उनके मन में भादों की विकरालता से भय संचरित होता है। यह सब कुछ कितना प्रेमिल और कितना मानवीय है। 

• तुलसी ने बालकांड में भी बरखा ऋतु के दो महीनों—सावन और भादों—को ‘राम’ नाम के दो अक्षर बताया है : “रामनाम बर बरन जुग, सावन भादव मास...” जबकि भादों में जन्म लेने वाले ‘जादवपति’ तो सूरदास के पास हैं, लेकिन भादों महीना उनके पास नहीं है।

• “बाढ़ अतिथि नहीं है। यह अचानक नहीं आती। लेकिन जब बाढ़ आती है तो हम कुछ ऐसा व्यवहार करते हैं कि यह अचानक आई विपत्ति है।”

ये बातें अनुपम मिश्र की पुस्तक ‘साफ़ माथे का समाज’ के एक निबंध ‘तैरने वाला समाज डूब रहा है’ में लिखी हैं।

अभी देखा जाए तो घूम-घूमकर पागल होने वाला समाज डूब रहा है। 

प्राकृतिक आपदाओं के प्रति मानवता इतना तो कर सकती है कि उसके प्रति सचेत व्यवहार करे। नेपाल-त्रासदी कितनी दुःखद है। लेकिन उसके मूल पर बात करने के बजाय किसी बच्चे को रेस्क्यू कर लिए जाने को म्यूजिक के साथ मिक्स करके रूमानीकृत कर दिया जाता है। जग्गी वासुदेव [ईशा फ़ाउंडेशन] के आँसुओं की व्याख्याओं का दौर चलता है और इससे क्लिकबेट बेनिफ़िट्स मिलते हैं। कोई यह बताएगा कि धर्म की साक्षात् मूर्ति बने बैठे यह लोग वर्षाकाल में पहाड़ में पर्यटन करने क्यों गए थे? क्या इन्होंने कुछ बुनियादी बातें भी नहीं पढ़ रखी हैं। क्या इन्हें नहीं पता कि वर्षाकाल में बाढ़, भू-स्खलन और अन्य दुर्घटनाएँ अवश्यंभावी हैं! 

नदी के बहाव में घर-कॉलोनी-नगर बसाने वाली सभ्यता में प्लॉट ख़रीद रहे लोग कोई सबक़ लेने के बजाय ऐसी दुर्घटनाओं पर कितनी लिजलिजी भावुकता का प्रदर्शन करते दिखते हैं!

• वर्षा के चार मास देशाटन न करने का विधान है। यों बुद्ध के चौमासे का वर्षावास तो लोकविख्यात है ही। यह रुक जाने के महीने हैं। साधक तो साधक, बल्कि सामान्य जनों को भी इन महीनों में विद्याभ्यास करना चाहिए; क्योंकि इस मौसम में बहुत तीखापन नहीं होता है, थोड़ी उमस भर ही होती है। 

बरखा के इस तरह मानीख़ेज़ होने को किष्किंधाकांड में भी दर्शाया गया है : 

“नव पल्लव भए बिटप अनेका। साधक मन जस मिले बिबेका।।”

यहाँ बरखा में वृक्षों के नए पत्तों और फुनगियों से गँछ जाने की तुलना किसी साधक-मन के विवेकपूरित होने से की गई है।

• संसार की सारी समस्याओं का उपाय जानने वाले जग्गी वासुदेव अपनी अड़तीस लाख रुपये की क़ीमत की बीएमडब्ल्यू बाइक पर ‘क्रेज़ी टाइगर’ और ‘सेव सॉइल’ का स्टीकर लगाकर रॉकस्टार बनकर निकलते हैं। उनके पीछे उनके फ़ॉलोअर्स होते हैं। ऐसी हरकतों से उपभोक्तावादी पर्यटन को बल मिलता है। ग़लत सरकारी नीतियों और कॉरपोरेट लक्ष्यों को सॉफ़्ट-सपोर्ट मिलता है।

आज की ‘पर्यटनशील चीलें’ क्या-क्या ख़त्म कर रही हैं, उन्हें इससे कोई मतलब नहीं! उन्हें चिल-थ्रिल होते हुए बस रील में बदलना है।

कभी एक मुट्ठी मूँगफली पर जीवनयापन की सलाह देते हुए, कभी इतिहास-दर्शन-विज्ञान सबका कचरा करते हुए ऐसे बाबाओं के आँसुओं पर सिसकियाँ भरते लोग कितने भोले हैं! बाबा के आँसुओं से उनकी दीर्घजीविता में इज़ाफ़ा हुआ। ये किसी बेबस के दो बूँद आँसू नहीं हैं, ये एक ताक़तवर की ताक़त के पक्ष में निकल आया दो बूँद अमृत है।

• एक रबड़ की गेंद देर तक उछलकर टप्प-टप्प धीमी पड़ रही हो कि लगभग इसी तरह उछलते हुए वह मिले। मिलते ही पता चला कि वह राही रायबरेलवी हैं। उनके पास एक विज़िटिंग कार्ड भी था। उन्होंने मेरी तारीफ़ पूछी ज़रूर, लेकिन की नहीं। काली रात में काला चश्मा लगाए हुए राही जी ने मेरी जन्मतिथि पूछी। मैंने बाईस कहा। राही जी के होंठ मक्खी के पंख जितनी देरी के लिए हिले। फिर मेरी तरफ़ एक हवाई निगाह डालते हुए बोले : “अभी बहुत मेहनत है गुरू!” मैंने कहा : “बहुत मेहनत!” वह बोले : “हाँ! अभी तो बाईस यानी—दो और दो चार ही हुआ है। दस तक जाने के लिए लंबी यात्रा तय करनी  है।” मैंने राही जी से खोद-पकड़ नहीं की और और बहुत से लेखकों के बारे में मज़े से सोचने लगा। राही के फ़ॉर्मूले पर मैंने कई लेखकों की तज्वीज़ की। परसाई जी की जन्मतिथि के अनुसार उनका मामला भी चार तक ही पहुँचा था और कवि असद जैदी का भी। उनतीस को जन्मा व्यक्ति तो दस के आगे निकलता हुआ दिखा। बस फिर मुझे ख़ुदा-ए-सुख़न का एक शे’र याद आया :

“मत सहल हमें जानो फिरता है फ़लक बरसों
तब ख़ाक के पर्दे से इंसान निकलते हैं”

राही के चार-पाँच नाम हैं और एक पाँच इंच का डिजिटल कार्ड उनके नाम से ही भर जाता है, क्योंकि वह कवि-गायक-एक्टर-जागरणकर्ता सब कुछ हैं। मीर तक़ी मीर की जन्मतिथि 28 मई बताई जाती है तो राही जी के अनुसार वही हैं जो दस तक पहुँचे। अब मीर तक कौन पहुँचे! बक़ौल राही जी मेहनत बहुत करनी है। 

• इंसानों के लिए जो दिल्लगी है, वह चिकोटी भी मच्छरों को हमला लग सकती है। कचरे के पहाड़ों से भरे इस समय में मच्छरों का यों चारों तरफ़ भन्नाए हुए दिखना—मच्छरों से पूछिए तो हमले की सूचना है। 

बहरहाल, नोटिस में आने के लिए छटपटाती हुई वेबसाइट को भी यह पाप नहीं करना चाहिए कि वह ‘सरे-शाम’ के कवि असद ज़ैदी को जन्मदिन की अलस्सुबह ही बधाई देने के लिए उस ढब के पोस्टर की तख़्लीक़ करे जैसे चौराहों पर छुटभैयों द्वारा किसी पोस्टर पर भावी पार्षद की फ़ोटो के किसी किनारे लटककर उन्हें जन्मदिन की बधाई दी जाती है। 

असद ज़ैदी छुटभैयों के भावी या वर्तमान पार्षद नहीं हैं, बल्कि कवि-गणमान्यों में उनकी वह जगह है जिसे एक लंबी साधना से कमाया जाता है। हम उनके लंबे, स्वस्थ और रचनात्मक जीवन की कामना करते हैं। 

• साधकों के लिए ही भर्तृहरि ‘वैराग्यशतक’ में कहते हैं : “क्या पर्वतों की कंदराओं में कंदमूल और वृक्षों के सरस फलों को धारण करने वाली वल्कलयुक्त शाखाएँ नष्ट हो गई हैं, जो चिरकुटई से धन कमाए हुए घमंडी मुखमुद्रा वाले धनी लोगों का मुँह लोग देख रहे हैं?” 

स्वाभिमान की रक्षा के लिए भी संन्यास और विरक्ति का मार्ग अब भी अर्थपूर्ण है। इसीलिए अच्छे अदब के लिए अदबी इदारों से दूर चले जाने की बात सुधीजनों ने कही है। पहले भी संन्यासी साहित्य रचते थे और काल के पार चले जाते थे। वे अपनी ज़रूरतों के लिए समाज और संस्थाओं के सामने विवश नहीं होते थे। आज कैसा रचना-समय है कि सिर्फ़ संस्थाएँ नहीं, बल्कि कुत्सा-अभियानों में घिरे तथाकथित साहित्यिक लोगों ने भी इसी वर्ष एक साहित्यकार की रोज़ी-रोटी को लक्षित करते हुए अभियान चलाए थे। अगर वे सफल होते तब भी असफल ही होते, क्योंकि ऐसे संत्रास देकर किसी जिद्दी साहित्यकार को सिर्फ़ अमर ही बनाया जा सकता है। 

इंगेजमेंट सेरेमनी :

मैंने तुम्हारी वीडियो समीक्षा की। अब तुम अपने किसी हमराज़ से मेरी वीडियो समीक्षा की ऑडियो समीक्षा करवा दो। इस तरह मैं और तुम इंगेज कर गए। मैं और तुम दोनों लेखक हैं—व्याकरण ही तुम्हारी औक़ात बता रहा है। अब तुम मेरे ऊपर कब वीडियो बनाओगे? बताओ! बताओ! कब आओगे मुझसे इंगेज होने! क्या हमारी कोई इंगेजमेंट सेरेमनी भी होगी! 

• छोटे शहरों की सारी संभावनाएँ चूसने के बाद महत्त्वाकांक्षियों को दिल्ली आना ही पड़ता है। दिल्ली में बड़ी अकादमियाँ हैं, संस्थान हैं, दूतावास हैं, ज़्यादा-ज़्यादा खिलाड़ी लोग हैं। यहाँ IHC-IIC से ITO-मंडी हाउस के बीच अगर लेखक या कवि चार-पाँच वर्ष सक्रिय रह ले तो बड़ी संभावनाओं के द्वार खुल सकते हैं। इलाहाबाद, पटना या भोपाल में ‘वो’ बात नहीं है। प्रकाशन, छोटे-मोटे ग्रांट और छोटे-मोटे न्यासी-नाशी पुरस्कार ही—ये राज्य-राजधानियाँ दे सकती हैं। अगर आपने इन जगहों पर रहते हुए यह सब हासिल कर लिया हो दिल्ली आ जाइए और भारी खेल खेलिए। यहाँ पर शाम को तरुण होती रौशनियाँ रात तक जवान होने लगती हैं और फिर दिनदहाड़े उनके परिणाम आने लगते हैं। दिल्ली में बहुत सी ऊँचाइयाँ हैं, कम से कम क़ुतुबमीनार तो है ही।

• गणेश बार-बार अपनी निजी डायरी के लिए नई-नई लिपियाँ ईजाद करता है और उसके पिता मिश्रीलाल हर बार उसे पकड़ लेते हैं। पिता-पुत्र के बीच का यह खेल धीरे-धीरे एक ऐसे मार्मिक मोड़ तक पहुँचता है, जहाँ से ‘खेल’ जैसी कहानी जन्म लेती है।

ऐसी ही छोटी-बड़ी, सुंदर और भीतर तक उतर जाने वाली कहानियों से कथाकार मनोज पांडेय खेल-खेल में अपना नवीन कहानी-संग्रह ‘प्रतिरूप’ [2024, राजकमल प्रकाशन] तैयार कर देते हैं। संग्रह की शीर्षक कहानी ‘प्रतिरूप’ अपने विस्तार में विशेष तौर पर ध्यान खींचती है—इतनी लंबी कि पढ़ते हुए इधर की राजनीतिक वेबसीरीजों के बड़े आख्यानों की याद आती है। फ़र्क़ यह कि यहाँ कहानी का विस्तार महज़ घटनाओं का फैलाव नहीं, बल्कि अपने समय और मनुष्य के भीतर उतरने का रास्ता बनता है। 

यों इन दिनों मनोज पांडेय के इस कहानी-संग्रह से गुज़रना हो रहा है, हालाँकि इसके बाद भी उन्होंने काफ़ी कुछ लिखा है।

• कान बोलते-बोलते बहरे हो गए हैं। अपने ही कान! क्या अपनी आवाज़ या अपनी साँस सुनाई पड़ती है! आपने अपने फेफड़ों में भी ईयरफ़ोन तो नहीं लगा लिए हैं! आपको अतुल तिवारी की ‘वनमाली कथा’ [अगस्त 2026] में प्रकाशित कहानी—‘प्रतिध्वनि’—को ज़रूर पढ़ना चाहिए। इसे पढ़ने की विधि है : लाइट ऑफ़ कर लें, कूलर या पंखा बंद कर लें और फ़ोन को साइलेंट पर कर लें। इस कहानी को पढ़ते हुए सुंदर सुरक्कई का नॉवेल—‘फ़ॉलोइंग अ प्रेयर’ की याद आती है। यादों के मामले में झूठे दावे करना बुरी बात है, भले ही यह दावा आपको ‘बहुत पढ़ा-लिखा’ दिखा सकता हो। इस नॉवेल में उस बच्ची ने कुछ सालों के लिए बोलना बंद कर दिया था, क्योंकि शब्दों से उसका यक़ीन उठ गया था। उसकी इस हरकत ने उसके लिए ध्वनियों का बेहद समृद्ध और सूक्ष्म संसार खोल दिया। यही हाल अतुल की कहानी के प्लास्टर्ड ‘मैं’ का हुआ। बस उसके साथ थोड़ा जल्दी हुआ। 

• नेपाल-त्रासदी के बाद वह पत्रकार दलदल में घुस रहा था और अपने इस घुसते जाने की इंच-इंच रिपोर्टिंग भी कर रहा था। अचरज तो यह है कि उसे उस बीच कीचड़ में किसने पहुँचाया! क्या वह पैराशूट से लॉन्च हुआ होगा! इस स्थिति की वीडियो नहीं मिली। बिंदुघाटीकार देखता है कि समाज और साहित्य में ऐसे ही अपने दलदल में फँस जाने की इंच-इंच बयानबाज़ी करते लोग बहुत आम-ओ-फ़हम हैं। 

यह सार्वभौम रूपकों का समय है। एक इलाक़े में जो दिख रहा वही हर इलाक़े में दिख रहा है, बस चेहरे और पेशे अलग हैं। लेखन के इलाक़े में भी प्रकाशन-समीक्षा-मंच-लिट्फ़ेस्ट-पुरस्कार-पीड़ाबयानी-जुगतबाज़ी के बीच फँसे लोग हमेशा घुटने भर दलदल में ही हैं; भले ही उनके कपड़ों पर कीचड़ नहीं है, वह कहीं और जमा हो रहा है। 

• हिंदी-विभागों से न होते तो वे साहित्य के परिदृश्य में कवि न होते! इन्हें माइक बनने, कवि-गुरुओं का चेला होने, कवि होने, गुटंगार होने, नारायुक्त कच्छा पहनने और हर तरह की चिपचिपाहटों को सहने का अभ्यास हो जाता है। इन विभागीय कवियों को अपनी शक्ल पर शक्ल भर विषादी रखनी होती है और सारी साहित्यिक हलचलों में ये इस क़दर नुमायाँ होते हैं कि हिंदी साहित्य इनकी ही नुमाइंदगी से अगले कुछ दशक पार करेगा! हा! हा! हा!

एक दूसरे क़िस्म के समीकरण का एक महज़ एक उदाहरण लेते हैं : 

बॉलीवुड-डीयू के हिंदी-विभाग-अधिकारीगणों से बनने वाले रचनात्मक वलय की दो बड़ी जीवाएँ हैं—पंकज त्रिपाठी और मुन्ना पांडेय। इनके नाते-रिश्तेदार हों या फिर यारों के यार हों, अगर एक्टर-डिरेक्टर नहीं बन पाएँगे तो लक़दक़ मंचों के कवि-शाइर तो हो ही जाएँगे और परितोष प्राप्त करेंगे।

• इन दिनों लोगों से निरपेक्ष सच और पक्षधरता की उम्मीद रखना उन्हें टॉर्चर करना है। इसलिए अब :

“ख़ाक-ए-आदम ही है तमाम ज़मीं
पाँव को हम सम्हाल रखते हैं’

[मीर]

अंततः 

आभार : सामने से पढ़ने-सराहने वाले दोस्तों की प्रतीक्षारत आँखों के प्रति। वे दृष्टिवान रहें। 

शुभकामना : उनके प्रति जिन्होंने नज़रंदाज़ किया या इस सत्र में भी चुपके-चुपके मार्कर लेकर पढ़ा और भविष्य के लिए लानतें इकट्ठी कीं। इनके सार्वजनिक-साहित्यिक-साहित्येतर व्यवहार ने इस स्तंभ को सामाग्री दी। ये लोग इस स्तंभ के लिए बेहद ज़रूरी रहे।

प्रस्थानक संदेश :

ज़िंदगी का जहन्नुम कोई मुस्तक़बिल में पेश आने वाला वाक़िआ नहीं है, बल्कि अगर ऐसी कोई शै है; तो अभी यहीं पहले से ही है, जिसे हम रोज़मर्रापन में जीते हैं, जिसे हमने साथ मिलकर बनाए रखा है। 

इस नरक से बचने के दो रास्ते हैं। पहला, जोकि बहुतों के लिए सरल है : इस जहन्नम को स्वीकार करो और इसका इस क़दर हिस्सा बन जाओ कि यह तुम्हें दिखे ही नहीं। 

दूसरा रास्ता ख़तरे से भरा है और एक सतत चौकसी और संदेह की माँग करता है : पता करो और पहचानना सीखो कि इस नरक के बीच कौन लोग हैं और कौन-सी चीज़ें हैं जो नरक नहीं हैं, इन्हें बचाओ और इनके लिए जगह बनाओ।”

यह आख़िरी बात मार्कोपोलो ने कुबलई ख़ान से कही, जिसे इतालो काल्विनो ने अपने फ़िक्शन ‘इनविज़िबल सिटीज़’ के बिल्कुल प्रस्थान में संभव किया है।

इस प्रस्थानक संदेश के साथ बिंदुघाटीकार ‘बिंदुघाटी’ के इस दूसरे सत्र की समाप्ति की घोषणा करता है।

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अन्य बिंदुघाटी : 2.0 यहाँ पढ़िए : लौट आया हूँ, कोई कुछ भी कह सकता है | मुझे पता है कि इस पोस्ट में आपकी दिलचस्पी है | बहुत फूँक-फूँककर सिर्फ़ साँप चलते हैं | शिक्षा मंत्री चला जाएगा, शिक्षा रह जाएगी | ‘देख अपने लीडरों को शोक मत कर... देश ये लीडर नहीं’ | जीटी रोड पर सावन आ गया है | वोटिंग, विवेकाधिकार और आज़ादी का विचार | ‘हिन्दवी’ अपना उत्सव लेकर इलाहाबाद आ तो गया, लेकिन यहाँ से जा नहीं पाएगा | टेक्स्ट-विरोधियों से बना टेक्स्ट-टाइम

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