बिंदुघाटी 2.0 : ‘हिन्दवी’ अपना उत्सव लेकर इलाहाबाद आ तो गया, लेकिन यहाँ से जा नहीं पाएगा
अखिलेश सिंह
23 अगस्त 2026
• ‘हिन्दवी’ अपना उत्सव लेकर इलाहाबाद आ तो गया, लेकिन यहाँ से पूरी तरह जा नहीं पाएगा। यह मज़ाक नहीं है, इसके मा’नी तक पहुँचने के लिए इससे गुज़रिए :
दरअस्ल, इलाहाबाद की हवा ही नॉस्टैल्जिक है। यहाँ रह रहे लोग इसकी याद में भी रहते हैं, जबकि यहाँ से गुज़र जाने वाले कभी ठीक से गुज़र ही नहीं पाते। इसे छात्रों-बाबुओं-वक़ीलों का शहर कहा जाता रहा है। यहाँ घाटों से प्रायः मुक्त गंगा बहती हैं। यहाँ ‘सरस्वती’ एक उन्मुक्त घाट का नाम है, एक युगधर्मी पत्रिका का नाम है, एक लुप्त हुई नदी का नाम है। यह महादेवी, पंत, निराला, बच्चन, फ़िराक़, फ़ारूक़ी, ज्ञानरंजन, अमरकांत, शेखर जोशी और दूधनाथ सिंह का शहर है। इलाहाबाद यमुना के समाहार का शहर है, यह पंडित नेहरू का शहर है।
कॅरिअर के लिए संघर्षरत छात्रों को भी इस शहर की परंपरा से स्थायीपन का विन्यास मिलता है। यों वे निपट कॅरिअरवादी कभी हो नहीं पाते हैं।
यह बड़े-बड़े डींगबाज़ों का शहर है। यह उखमजियों,आलसियों, बन-मक्खनों, बासी पकौड़ों और नक़ली पनीर का शहर है।
यह कछारों, तबेलों और फ़ित्नागरों का शहर है।
यह एक रुपये में अदरक की झनझनाती चाय पिलाने वाले उन भोलानाथ जंघई वाले का शहर है, जो बहुत पहले ही जंघई चले गए।
यह आयोजनों और आंदोलनों का शहर है। यहाँ प्रोग्राम ही प्रोग्राम हैं और विरोध ही विरोध हैं। यह आज ‘हिन्दवी उत्सव’ का शहर है।
• ‘हिन्दवी के ‘आल इंडिया कैंपस कविता-2026’ के लिए वोटिंग समाप्त हो चुकी है। आज विजेता/विजेताओं के नाम भी आ जाएँगे। इस स्थिति में अब इस पर कुछ बातें मत-निरपेक्ष होकर की जा सकती हैं। क्या यह बेहतर न होता कि अंतिम दस प्रतिभागी कवियों में से कुछ कवि साहित्यिक-राजनीतिक पेजों या सोशल मीडिया इंफ़्लुएंसरों से अपना प्रचार करवाने से बचते; क्योंकि इसमें पेड-प्रचार की संभावना निहित है। इसका ध्यान तब तो और भी अधिक रखा जाना चाहिए, जब यहाँ वोटिंग का अर्थ पाठक का अभिमत है और इस प्रतियोगिता के पूर्णतः पाठक-केंद्रित होने का दावा है... जबकि इंफ़्लुएंसरों की ताक़त और हरकत में कोई पाठकीयता नहीं होती, इससे बचा-खुचा पाठकीय विवेक भी नेपथ्य में चला जाता है।
प्रतियोगिता की होड़ में एक कवि को मनुष्येतर होने से बचना चाहिए। संस्थान चाहे कोई भी हो; वह अतिप्रशंसित-अतिप्रचारित होने की चाह में कुछ भी कर गुज़रने से गुरेज़ नहीं करता, ऐसे में उन्हें ऐसी प्रतियोगिताओं को छल-छद्मों और ख़राब सहकारिताओं से बचाने की योजना भी पहले ही बना लेनी चाहिए।
• संसार के सारे मंच नेपथ्य से संचालित होते हैं। सनद रहे कि मंचासीन भी नेपथ्य हो सकता है। नेपथ्य की ख़ोज कभी आसान नहीं होती, अगर होती तो बहुत कम मंच होते।
• पर्दा उठने से कभी कोई दृश्य नहीं दीखता। उसके गिरने में, गिरते रहने में और गिरे रहने में जो रौशनियाँ उपस्थित होती हैं; उनसे हज़ारों साहित्यिक वाक्य फूटते हैं। इन वाक्यों को बीनकर उठा लेना, आँख से सुई उठाने जैसा महीन काम है। ज़ाहिर है कि संसार के सारे व्यवहार अपनी वकालत करते हैं, यों साहित्य भी सबसे पहले अपनी अस्मिता का वकील है। इतने पिटते-दुबकते-मरते-मारते-लिथड़ते-परिभाषित होते जाने में ऐसा क्या अलक्षित रह जाता है, जिसके समक्ष बार-बार संसार के सारे आयोजन अपनी दलीलें लेकर जाते हैं!
बार-बार स्वागतोत्सुक, शुभकामी, पुष्टिदायक, प्रेरक और प्रदाता के रूप में आती हुई जन की वह क्या शक्ति है; जिससे सारे आयोजन अपनी सफलता के प्रस्ताव बना पाते हैं!
• जन आयोजनधर्मी है। उसका यह स्वभाव कहीं भी अदृश्य और अलक्षित नहीं है। उसके जीवन के तमाम अधूरेपन उसके आयोजनों से भरते हैं। अपनी समग्रता में वह निठल्ला शिकायतधर्मी नहीं है।
• मंचासीनों और प्रायोजकों के बीच माँग और पूर्ति का संबंध होता है—दोतरफ़ा। दोनों तरफ़ से मिलकर ‘समकालीनता’ नामक शै का निर्माण होता है। दोनों के इस तरह होने में दोनों ही मार्केट में बने रहते हैं। मसलन, ‘इंडियन नॉलेज सिस्टम’ [आईकेएस] नाम के नए डिस्कोर्स के मामले को ही लें। जो विद्वान् बने हुए हैं, बनकर चुके हैं या बन रहे हैं, लेकिन जिनके पास कोई टिप्पणी या टैग नहीं है; समकालीनता उन्हें अनटैग कर देगी। इसलिए आपका कहना पुराना हो चुका हो, या कहने के लिए आपके पास कुछ ख़ास न भी हो, तो भी आईकेएस-संबंधी मंचों पर बने रहिए। आयोजनों में अपनी उपस्थिति बनाए रखिए। इससे आप अपने इलाक़े की समकालीनता में बने रहेंगे।
• आयोजनों को लेकर सबसे ज़्यादा गंदगी जिन शब्दों के इर्द-गिर्द मच रखी है; उनमें वे सभी शब्द हैं, जो वहाँ प्रयोग में आ रहे हैं। फिर भी सबसे अश्लील होते जाने का तमग़ा मैं एक शब्द को ज़रूर दूँगा, वह है—प्रयोगधर्मिता। प्रयोग क्या है और कैसी संक्रांति से गुज़रकर उसकी एक काया बनती है, इस पर सोचना भी एक फ़िज़ूल बात है।
• अगर किसी सुचिंतित व्यक्ति ने कुछ दशकों के हाइबरनेशन के बाद अभी हाल ही आँख खोली है और कुछ कहने की मुराद भी रखता है, तो ज़रूर कहेगा कि परिवर्तन प्रकृति का विरूपण है। अगर वह सुचिंतित व्यक्ति साहित्यिक गोष्ठियों, आयोजनों, फ़ेस्टिवलों में रुचि रखता रहा है तो उसे रसिक नहीं मिलेंगे; क़ायदे के वक्ता, विषय और भी पूरक बातें नहीं मिलेंगी—अरुचियाँ ही मिलेंगी। वह देखेगा कि अभी जो व्यक्ति कुछ दिनों से इधर-उधर उपयुक्त ढंग से लिभड़ते हुए पाया गया था, अब वह पोस्टरों में पाया जा रहा है। वह मंचासीन है, भले ही मॉडरेटर होकर।
• इस समय विभिन्न विषयों और संस्थाओं के साथ संयुक्त आयोजनों में रज़ा फ़ाउंडेशन ही सबसे बड़ा सर्वर है। इतनी अच्छी मुनादियों के बावज़ूद वहाँ भी सही वक़्ता की शॉर्टेज हो जाती है, यह बात बिंदुघाटीकार नहीं; स्वयं अशोक वाजपेयी कहते रहे हैं, लिखते रहे हैं।
• आजकल के आयोजन सबसे पहले पोस्टरों के माध्यम से सूचित होते हैं। उनमें अधिक से अधिक चेहरों को दिखाने की जाने कौन-कौन-सी मजबूरियाँ होती हैं कि तमाम नए-नए कार्यभार सृजित करने पड़ते हैं। जैसे पोस्टरों में एक व्यक्ति संयोजक रूप में पदासीन दिखता है, तो एक और किसी के नीचे प्रमुखता से ‘संयोजन’ लिखा होता है। अध्यक्ष, प्रबंधक और संरक्षक प्रजातियों की भी काफ़ी उपस्थिति होती दिखलाई पड़ती है। संरक्षक सबसे दिलचस्प जीव होता है; वह वरदानी प्रतिभा का व्यक्ति होता है, उसके ही वरद से आयोजन संपन्न होते हैं। सत्र-अध्यक्ष होने के लिए टपकने वाली उम्र, आयोजक को उपकृत करने की क्षमता या देशव्यापी नाम होना ज़रूरी होता है। AI के प्रयोग से बहुत चमकदार और भद्दे बन रहे डिजिटल पोस्टर्स में ज्यामिति ढंग से तरह-तरह के ययाति या त्रिशंकुनुमा चेहरे लटकते पाए जाते हैं।
• ‘कामसूत्र’ सुरुचिसंपन्न जीवन जीने का शास्त्र है। इसमें कहीं भी हिंसा या वितृष्णा का स्थान नहीं है। इसके पहले ही अधिकरण में गोष्ठीसमवाय के लिए कई निर्देश-तत्त्व उपस्थित हैं, जिसमें सबसे पहले तो गोष्ठी-आयोजन का समय बताया गया है। गोष्ठी अपराह्न में ही आहूत की जानी चाहिए। इसके बाद इसमें शामिल होने वाले कलाकारों, आयोजकों, संयोजकों, खान-पान आदि से संबंधित आचार-विचार के वर्णन हैं।
• वक्ता की भाषा के बारे में ‘कामसूत्र’ का निर्देश है कि उसे न ही अधिक पांडित्यपूर्ण भाषा बोलनी चाहिए और न ही अतिसाधारण। उसे ऐसी मिश्रित भाषा का प्रयोग करना चाहिए, जिससे लोग कनेक्ट भी करें और विचार तक भी पहुँचें। वक्ता होना, मुँह उठाकर रेंकना, मुँह गिराकर फुसफुसाना या फिर विषय से भटककर भूँकना भर नहीं है। जैसे लिखना रियाज़ी काम है, वैसे ही बोलना भी। इसके लिए विषय का गहरा ज्ञान, भाषा पर पकड़ और संपर्क स्थापित करने वाली देहभाषा बेहद आवश्यक होती है।
• गोष्ठी-आयोजनों में ‘स्वैरविसर्पिणी’ प्रवृत्ति नहीं होनी चाहिए... यानी मनमानापन नहीं होना चाहिए। यह दो प्रकार से होता है : एक संचालक किसी आमंत्रित विद्वान् की चापलूसी में या स्वयं के विद्वता-प्रदर्शन में अधिक समय खा जाते हैं, यह नहीं होना चाहिए। संचालक कार्यक्रम को चलाने वाले एक सूत्र की तरह होता है। उसे उतना भर ही रहना चाहिए।
दूसरे यह कि किसी विषय पर बोलने के लिए आमंत्रित वक्ता को तय समय में अपनी बात कहना आना चाहिए। उसे बोलते जाने के अपने रोग से बाक़ियों को रुग्ण नहीं करना चाहिए।
ऐसे आयोजनों में ‘परहिंसात्मिका’ प्रवृत्ति नहीं होनी चाहिए; यानी किसी को नीचा दिखाने, अपमानित करने या गाली देने की प्रवृत्ति नहीं होनी चाहिए। दिए गए विषय को सही से प्रस्तुत कर देना ही पर्याप्त होता है। आयोजनों में सभी आमंत्रितों पर यथोचित रौशनी होनी चाहिए। आयोजनों को सफल बनाने की कॉर्पोरेट युक्तियों में प्रायः कोई अतिमहानुभाव उपस्थित होता है, जिस पर ही सारा फ़ोकस बना रहता है—यह कुछ और नहीं, घनघोर अश्लीलता ही है।
• मार्च या जुलाई या नवंबर में होने वाले ज़्यादातर साहित्यिक कार्यक्रमों में कुछ चुनिंदा चेहरे होते हैं। थोड़े बहुत जोड़-घटाव के साथ वही लोग सारे पोस्टरों में दिखते हैं, ख़ूब सारी तस्वीरों और रीलों से गुज़रते हैं। संस्तुतियों, गुटबाज़ियों, परस्पर पीठमर्दनों के बीच गुलज़ारीलाल बने ये पंद्रह-बीस चेहरे कार्यक्रमों के दौर के बाद शिकायती हो जाते हैं। इन्हें दुनिया बुरी लगने लगती है, समीक्षक आक्रमणकारी लगने लगते हैं और चुपचाप मेहनत करके स्वयं को निखार रहे लोग अप्रतिबद्ध।
• इस माहौल में बिंदुघाटीकार की कामना है कि मंच-आयोजन-पोस्टर सबके सब इन्हीं पंद्रह-बीस-पच्चीस तथाकथित प्रतिबद्ध लोगों को मिलते रहें, तीन सौ पैंसठ दिन मिलते रहें और ये अच्छी भाषा, अच्छा शिल्प, अच्छी रचनाएँ अर्जित कर रहे लोगों पर समकालीन फ़ैशनेबल आरोप मढ़कर मस्त होते रहें।
• मंच प्राप्त करना है, आयोजनों का चेहरा बनना है या थैलीप्राप्त श्रोता बनना है; यानी समकालीनता की बुलबुल बनना है, तो इसके लिए सर्वप्रमुख कोशिशें इस प्रकार हैं :
~ बुलबुलाकांक्षी को अकादमियों, भाषा-विभागों, फ़ाउंडेशनों, प्रकाशन-संस्थानों, लेखक-संगठनों, पत्रिकाओं के संचालकों/लोगों से हाय-हेलो, बधाई-श्रद्धांजलि करते रहना चाहिए।
~ खड़े होने, हाथ उठाने, समर्थन करने की भाषा सीखनी चाहिए।
~ विवादों-प्रवादों में हिस्सा लेना चाहिए और हो सके तो इनका अपने पक्ष में उपयोग करना चाहिए।
~ अधिक महत्त्वाकांक्षी को किसी एक बड़े लाभ वाले विवाद की खोज करनी चाहिए और स्वयं उसका सबसे पीड़ित पक्ष होना चाहिए।
~ अधिक से अधिक लोगों को अपने अधिक से अधिक चेहरे दिखाने चाहिए। एक ही चेहरा किसी एक ही मंच तक जाकर बुझ जाता है।
~ यथोचित चुप्पी का शिल्प सीखना चाहिए।
जिन्होंने ये सब साध लिया है—आज के बुलबुल-ए-बहार-ए-अदब वही हैं, वही हैं, वही हैं...
• सारा संसार ही एक आयोजन है। इसे विकासवाद के सिद्धांत के हिसाब से देखें तो भी प्रकृति ने इसे धीरे-धीरे सजाया है और अगर विभिन्न संस्कृतियों की माइथोलॉजी के हिसाब से देखें तो भी ऐसा ही है। प्रकृति के इस आयोजन में मनुष्य की एंट्री के साथ उसका संशयात्मक मस्तिष्क भी आया। माइथोलॉजी ने जहाँ ‘संशयात्मा विनश्यति’ की बात की, वहीं उससे लगकर विभिन्न तर्क-प्रणालियाँ भी विकसित हुईं।
इस संसाररूपी मंच का नियंता कौन है; इसमें जो अभिनय कर रहे हैं, उनका नियंता से क्या संबंध है—इस पर पर्याप्त बहसें चलती ही आ रही हैं। लेकिन अभिनेता यानी मनुष्य का लौकिक व्यवहार नीतिशास्त्र का विषय बना। मनुष्य ने अपनी सवाल और संशय करने की प्रवृत्ति से अपने लिए सारे तामझाम जुटाए। उसकी दैनिकी में चीज़ें आहूत होती हैं और फिर संपन्न होती हैं। इस बीच के क्रियाकलापों को लेकर वह बहुत से नियमों और प्रविधियों से गुज़रता है। जो मानव-मस्तिष्क प्रकृति के इस विराट आयोजन पर प्रश्न करते हुए लगातार विकसनशील रहा है, वह सरकारों-कॉर्पोरेटों-स्वयंभुओं के तमाम आयोजनों पर क्यों नहीं बात करेगा!
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अन्य बिंदुघाटी : 2.0 यहाँ पढ़िए : लौट आया हूँ, कोई कुछ भी कह सकता है | मुझे पता है कि इस पोस्ट में आपकी दिलचस्पी है | बहुत फूँक-फूँककर सिर्फ़ साँप चलते हैं | शिक्षा मंत्री चला जाएगा, शिक्षा रह जाएगी | ‘देख अपने लीडरों को शोक मत कर... देश ये लीडर नहीं’ | जीटी रोड पर सावन आ गया है | वोटिंग, विवेकाधिकार और आज़ादी का विचार
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