बिंदुघाटी 2.0 : टेक्स्ट-विरोधियों से बना टेक्स्ट-टाइम
अखिलेश सिंह
30 अगस्त 2026
• यह सारा ख़राब दौर एक अच्छे टेक्स्ट में बदलता जा रहा है। एक ऐसा अच्छा टेक्स्ट जिसके सारे पात्र साहित्यिक टेक्स्ट से मुँहफ़ेर कर चल रहे हैं। पूरा का पूरा टेक्स्ट उदास पड़ा होता है कि कोई पात्र तो उसको सही से छूकर धीरे-धीरे गुज़रे, लेकिन उसमें उपस्थित कुछ शब्द उन सभी पात्रों को चीख़ते हुए लगते हैं। यह ठीक वैसे ही है, जैसे एआई को यह प्रशिक्षण दिया गया है कि कुछ शब्द ऑफेंसिव हैं, और किसी वाक्य में उनकी उपस्थिति पर वह ज़रूरी रेस्पांस न देकर सॉरी बोल देगा। सारे पात्रों की आँखें और उनके मस्तिष्क एआई-कृत हो चुके हैं। वे अपने रोज़ाना के एकांत में कुछ ऐसे ही शब्द-व्यवहारों के अतिशय रियाज़ के कारण उन्हें झट से उठा लेते हैं और समूचे टेक्स्ट को छोड़ देते हैं।
• यों कहें तो, यह टेक्स्ट-विरोधियों से बना हुआ टेक्स्ट-टाइम है। यह कितनी विचित्र बात है कि सेक्स-संबंधी इश्तिहारों से लेकर सेमी-पोर्न वीडियोज़ तक—आदमी हर वक़्त, बच-बचाकर देखता रहता है। बाल झड़ने और सेक्सुअल प्रॉब्लम्स से संबंधित प्रोडक्ट्स और इनके उपाय हर तरफ़ भरे पड़े हैं। एब्स और कर्व्स को लेकर हर तरफ़ उपाय ही उपाय हैं। योगा और जिम के विजुअल्स में कामुकता की बहार आई हुई है, लेकिन मुख्यधारा के साहित्य में ऐन्द्रियता पर चौतरफ़ा हमले हैं। ख़ासकर उस परंपरा में जहाँ, देवी-देवताओं और मिथकीय नायक और नायिकाओं के देह वर्णन से हज़ारों वर्षों का साहित्य भरा पड़ा है। प्रणय-निवेदनों और इच्छाओं को लेकर जाने कितनी कथाएँ हैं।
• टेक्स्ट विरोधी दो प्रकार के होते हैं : एक वे, जिन्होंने टेक्स्ट को पढ़े और समझे बिना उद्धारक होने का ठेका उठा रखा है। इन्हें टेक्स्ट से एक कैप्सूल या ताबीज़ की उम्मीद होती है जिसे बाँटकर ये हमदर्द क्लीनिक होना चाहते हैं। अपने शिफ़ाख़ानों में ये विक्टिमहुड की पर्चियाँ बाँटते हैं। इन्हें यह नहीं पता कि नारेबाज़ी अलग चीज़ है और अलग अर्थों के लिए महत्त्वपूर्ण है, जबकि साहित्य अलग चीज़ है। इन्होंने सबकुछ अपने निहित और निकट के स्वार्थों के लिए मिक्स कर दिया है। ये क्षणजीविता में मच्छर सरीखे हैं, काटकर भागना जानते हैं; और हल्की-सी चपेट में टपक जाते हैं।
दूसरे वे, जिन्होंने समाज को संस्कारी बनाने का बीड़ा उठा रक्खा है। ये गटर के पानी से धुलकर सबकुछ साफ़ कर देना चाहते हैं, ये फ़िल्टरयुक्त कैमरे में साफ़ और सुचिक्कन चेहरा दिखाना चाहते हैं। ये मुँह उठाए किसी भी दीवार से टकरा जाते हैं और उसे गाली देते हैं। इन्होंने समाज को अपने तरीक़े का ‘चोप्प-इंडिया’ बनाने का ठेका उठा रक्खा है।
• विगत दिनों ‘हिन्दवी उत्सव’ के ऑल इंडिया कैंपस कविता के लिए प्रतिभागी कवि कुशाग्र अद्वैत द्वारा रचित कविता ‘छनकर’ काफी कुख्यात रही। इसका कारण एक पोस्टर रहा जिसमें कविता के चर्चित अंश थे। अनगिनत गालियों और कुपढ़ अभियानों के बीच इस कविता पर प्रभाव या नक़ल के भी कुछ आरोप लगे, अन्य बातों के साथ-साथ उनपर भी यहाँ बात की जाएगी।
• एंड्रू मार्वेल, 17वीं सदी यूरोप के बड़े कवि हुए और उनकी बेहद चर्चित कविता—‘टू हिज कॉय मिस्ट्रेस’ की चर्चा इन दिनों रही। मार्वेल की कविता में नायक संकोचशील नायिका को रति के लिए तैयार कर रहा है और मनुष्य की सार्वभौमिक मर्त्यता के कारण इसमें बहुत समय जाया करने को फ़िज़ूल बता रहा है। इस कविता का ओवरटोन ही है : ‘अगर हमारे पास बहुत समय और मौक़े होते...’
• कुशाग्र की ‘छनकर’ कविता में भी समय की बेहद कमी की बात है। वहाँ नायक कहता है : ‘हम बस दो दिन के लिए ही मिले हैं’ लेकिन यहाँ समय की कमी को लेकर उस तरह का सार्वभौमिक भाव नहीं है। यहाँ नायिका से मिलन का आग्रह नायक के लिए एक निष्कवच अपनेपन से मिलना है। क्योंकि यहाँ सारी सुंदरताएँ छनकर ही सुंदर हैं। नायिका से मिलन की प्रत्याशा में ‘छन’ शब्द ध्वनि रूप में बदल जाता है, वह उसकी पायल और पदचाप से निःसृत होने लगता है। ‘छनकर’ कविता एक सुसंस्कृत युवा प्रेमी की कविता है। जिसमें धैर्य है, रति की अपूर्णता का भी स्वीकार है और क़दम-क़दम पर संगीत है। रति की अपूर्णता (मनुष्य की मर्त्यता के कारण) ही वह तत्व जिसमें मार्वेल की कविता की तरह एक सार्वभौमिक भाव है। लेकिन मार्वेल के यहाँ शक्तिशाली आग्रह है। जोकि ‘छनकर’ कविता में नहीं है। यहाँ अंत में नायक यह भी कहता है : छन-छन आओ/ न आओ। जो है/ जैसा है/ कहो बताओ। मार्वेल की कविता में नायक इस संसार की पार्थिवता को जानता है और अपने मिलन को भी उन्हीं पार्थिव अर्थों में बता रहा है। जबकि कुशाग्र के पास मिलन की वह आतुरता नहीं है। यहाँ एक धीमा संगीतमयी शिल्प है।
• मार्वेल की कविता में नैरेटर नायिका से कहता है कि ‘दो सौ वर्ष तो तुम्हारे स्तनों को प्यार करने में बिता देता’ (अगर बहुत समय होता हमारे पास) लेकिन ‘छनकर’ कविता में यह निश्चित किया जा रहा है कि हमें मिले हुए दो दिन तो इसी में जाएँगे। अगरचे, कविता की स्पीच में कुछ तो ऐसा है कि जिन्होंने एंड्रू मार्वेल की उल्लिखित कविता पढ़ रखी थी, उन्हें कुशाग्र की उन चर्चित काव्य-पंक्तियों की याद आई।
• इस कविता पर और भी तकनीकी बातें हो सकती हैं। जैसे कि जिस प्रकार नायक अंत में धीरोद्दात दिखाई देता है वैसा शुरू में नहीं है। वह मिलने के लिए नियत ‘दो दिन’ में सौंदर्य और प्रेम की अन्य रूमानी बातों में रमने के बजाय सीधे केलिक्रिया में ही निरत हो जाने की बात को नियत करता है। इसके अलावा, इसका संपूर्ण पुरुषवाची होना भी रेखांकित करने योग्य है। लेकिन इसमें पुरुष-वाचक के प्रेमिल आग्रह इतने कोमल और खुले हुए हैं कि उसमें वर्चस्व की गुंजाइश कम दिखती है।
• ‘छनकर’ कविता में प्रेमी जोड़ों के इतिहास में सस्सी और पुन्नू के युगल से सस्सी का ज़िक्र शुरू में ही आता है। सस्सी और पुन्नू को लेकर हाल के वर्षों में एक बेहद चर्चित नज़्म इमरान फ़िरोज़ ने भी लिखी थी—‘पुनल अब लौटना कैसा!’ इस बेहद शानदार नज़्म को सस्सी के हवाले से लिखा गया है जिसमें वह पुनल या’नी पुन्नू को धिक्कारती है, क्योंकि उसने सस्सी को धोखा दिया था। जबकि कुशाग्र की कविता में सस्सी का शुरू में ज़िक्र तो है लेकिन यहाँ नैरेटर एक पुरुष है और वह अपनी प्रेमिका को मिलन के लिए पुकारता है। इमरान की नज़्म में सस्सी और पुन्नू के प्रेम में तकलीफ़ और अपूर्णता धोखे के कारण है और यहाँ ‘छनकर’ में संपूर्ण रति के लिए उम्र कम पड़ जाने की कसक है। यहाँ क़ाबिले ग़ौर है कि कवि कुशाग्र के लिए रति की अर्थयात्रा देह से मन की ओर जाती है।
• आधुनिक कविता में भी वाचक, विषयवस्तु और सभ्यता समीक्षा के तत्व महत्त्वपूर्ण होते हैं। इनके साथ ही लय, आवेग और अंतर्ध्वनियाँ भी। वाचक को वाचक समझा जाना चाहिए और कविता की धज में उस वाचक के ईमानदार नैरेशन को भी समझना चाहिए। कई बार उसके ईमानदार नैरेशन में समाज के वृहत हिस्से का नंगा सच होता है। जो लोग उस नंगे सच की आभा में ख़ुद को संबोधित पाते हैं, वे कवि पर नाराघोषी आरोप लगाने लगते हैं। ये आरोप दरअस्ल उनका अपना सच होता है। अपनी दिख गई गंदगी वे कवि पर उछाल रहे होते हैं।
• नब्बे के बाद, मानवता के इतिहास में पहली बार हुआ कि स्त्रियों का इतना बड़ा हिस्सा जीवन के हर पहलू में मुखर रूप से शरीक हुआ। एक तरफ़ स्त्रियाँ आगे बढ़ती रही हैं, दूसरी तरफ़ उनकी उपस्थिति को कमोडिटी की तरह नारे में तब्दील कर एनजीओवादी संगठन और लोग भी फलते-फूलते रहे। इस बीच स्त्री-पुरुष संबंधों की जो पेचीदगी आई, उसपर साहित्य ख़ासकर कविता प्रायः ही मौन है।
• कोई कवि स्त्री-पुरुष संबंधों पर आधारित इस सभ्यता की समीक्षा प्रस्तुत करता है तो सिर्फ़ आपको अच्छा नहीं लगा इसलिए उस कविता-प्रयास को मेल-गेज़ ठहराना ठीक नहीं है। इसके लिए यह देखना होगा कि कविता की काया कैसे तनाव से निर्मित हुई है। क्या कविता में स्त्री या उसकी उपस्थिति का चित्रण पुरुष मनोरंजन या मज़े के लिए किया जा रहा है! या फिर कोई दुश्चिंता, आत्यंतिक पीड़ा का भाव भी उसमें निहित है! लौरा मल्वे ने सिनेमा में मेल-गेज़ शब्द देते समय यह नहीं सोचा होगा कि इस शब्द का प्रयोग पोएटिक एक्सप्रेशन को फंदे से बाँधने या एनजीओवादी लोगों की बात ऊपर रखने या फिर किसी गैंग में एक-दूसरे की नज़र में अच्छा बनने के लिए होगा।
• जॉन बर्जर ने गेजिंग को समझते हुए जिस मेल-गेज़ को लेकर एक समझ देना शुरू किया था, उसका लौरा मल्वे ने सिनेमा के संदर्भ में 1970 के दशक में अपने निबंध ‘विजुअल प्लेज़र एंड नैरेटिव सिनेमा’ में सिद्धांतीकरण किया। लेकिन कविता या साहित्यिक कृतियाँ विजुअल आर्ट्स की तरह नहीं होती हैं। गेज़िंग में देखने वाला, देखने की चीज़ और इससे तैयार होती एजेंसी महत्त्वपूर्ण होती है।
• पिछले दिनों एक और चर्चित कविता ‘प्रेमिकाएँ’ [रचनाकाल : 2019; कवि : अखिलेश सिंह] के संदर्भ में देखें तो इस कविता में तमाम बातों के साथ ही अपनी ‘सिर्फ़ सोच’ को स्वीकार कर चुका वाचक आधुनिक समय में औरतों के साथ दोस्तियों-रिश्तों में निम्न भाव रखने वाले और बाहर से उद्धारक बने लोगों का नंगा सच सामने रख रहा है। ऐसी विशिष्ट स्थिति में, जब कोई कवि ऐसा पुरुष-वाचक संभव करता है जो स्वयं के विविधरूपी स्त्री-संबंधों की पड़ताल करता है तो वह स्वयं यानी एक पुरुष को भी सायास कटघरे में खड़ा करता चलता है। यह सबकुछ बेहद जटिल है इसीलिए इस वाचक के वाचन में एब्सर्ड, नाराज़गी, खीझ उभरती जाती है। एक चित्र बनता है जिसमें सबकुछ लिभड़ता दिखता है। जहाँ कोई भी समीक्षा के परे नहीं है। न ही समकालीनता का धूर्त पुरुष और न ही उसकी योजनाओं में शामिल स्त्री।
• ग़ौरतलब है कि ‘प्रेमिकाएँ’ कविता की स्त्रियाँ अपनी एजेंसी में बेहद ताक़तवर हैं। यहाँ नैरेटर स्त्रियों की सार्वभौम पहचान, उनके संघर्ष और उनकी अर्जनाओं पर बात नहीं कर रहा है। वह उन कुछ स्त्रियों को लक्षित कर रहा है जो गंदी व्यवस्था की शिकार भी हैं और उनका उपकरण भी बनी हुई हैं। वे चयनशील हैं और हिंसक हैं। वहाँ वे कहीं से भी ऑब्जेक्ट नहीं बल्कि पूरी तरह सब्जेक्ट हैं। वहाँ बाद के पैरे में भी नैरेटर स्वयं को प्रश्नांकित करता चलता है, जब वह पत्नियों के संदर्भ में कहता है कि वे सुविधापूर्ण तरीक़े से स्तुत्य और हीन दोनों हैं। वह आगे भी विभिन्न संबंधों में स्वयं को प्रश्नांकित करता चलता है। यहाँ जो भी दृश्य बन रहे हैं, उनमें कोई मनोरंजन या चकल्लस नहीं है और न ही रति-क्रीड़ा का एकालापी आयोजन है।
• ऐसा नहीं है कि साहित्य या कविता में मेल-गेज़िंग संभव नहीं है। इस पर तो बाक़ायदा अकादमिक कोर्सेज तक बने हुए हैं, लेकिन केवल शब्द जानकर उसे कहीं भी चिपका देना साहित्यिक अभिव्यक्ति के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है। असहज कर देना आधुनिक साहित्य का दुर्गुण नहीं है। असहज होकर स्वयं को भी समीक्षित करना चाहिए न कि ढेलमरुआ अभियान चलाना चहिए।
• यहाँ अक्सर ही, ख़ासकर पुरुष-कवि चार उद्धारक वाक्य बोलकर या लिखकर स्त्रियों के समक्ष मेंसप्लेनिंग जैसा कुछ कर रहे होते हैं, लेकिन सही समीक्षा व साहित्यिक विवेक के अभाव और अवसरवादिता के दुष्चक्र में प्रसिद्धि प्राप्त कर रहे होते हैं। यह भीषण बेईमानी है। साहित्य की अगर कोई काल-अखंडता है तो वह ऐसी हरकतों को माफ़ नहीं करेगा।
साहित्य सत्वर नहीं होता, इससे उसका सत्व नष्ट हो जाता है।
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अन्य बिंदुघाटी : 2.0 यहाँ पढ़िए : लौट आया हूँ, कोई कुछ भी कह सकता है | मुझे पता है कि इस पोस्ट में आपकी दिलचस्पी है | बहुत फूँक-फूँककर सिर्फ़ साँप चलते हैं | शिक्षा मंत्री चला जाएगा, शिक्षा रह जाएगी | ‘देख अपने लीडरों को शोक मत कर... देश ये लीडर नहीं’ | जीटी रोड पर सावन आ गया है | वोटिंग, विवेकाधिकार और आज़ादी का विचार | ‘हिन्दवी’ अपना उत्सव लेकर इलाहाबाद आ तो गया, लेकिन यहाँ से जा नहीं पाएगा
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