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ऋतु पर उद्धरण

तरुणी के वेषवाली, कामदेव को उदित करने वाली, जातिपुष्प के सुगंध को विकसित करने वाली, जिसके पुष्ट पयोधर के उभार उन्नत हैं—ऐसी वर्षाऋतु किसको नहीं हर्षित करती है।

भर्तृहरि

जिसमें आम के बौरों के केसरसमूह की सुगंध से दिशाएँ व्याप्त हो रही हैं, और मीठे-मीठे मकरंद का पान कर भ्रमर उन्मत्त हो रहे हैं—ऐसे ऋतुराज में किसे उत्कंठा नहीं होती।

भर्तृहरि

यदि शीत ऋतु गयी है, तो क्या वसंत ऋतु अधिक दूर हो सकती है?

शंकर शैलेंद्र

मेघों से व्याप्त आकाश और प्रफुल्लित पृथ्वी, नए-नए अंकुरों पर ओस के जल से पूर्ण तथा नवीन कुटज और कदंब के पुष्पों के समूह की सुंगधित वाले, और मयूरों के झुंड की सुंदर वाणी से रमणीय वन के प्रांतभाग—ये पदार्थ वर्षाऋतु में सुखी और दुःखी पुरुषों को उत्कंठा प्रदान करते हैं।

भर्तृहरि

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