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दयाराम

1833 - 1909

सतसई परंपरा के नीति कवि।

सतसई परंपरा के नीति कवि।

दयाराम के उद्धरण

धन के बिना संसार व्यर्थ है परंतु अत्यधिक धन भी व्यर्थ है, जैसे अन्न के बिना तन नहीं रहता, परंतु अत्यधिक भोजन करने से प्राण चले जाते हैं।

धर्मात्मा के हितार्थ किया गया अधर्म भी धर्म है और धर्मात्मा के अहित के लिए किया गया धर्म भी अधर्म है।

संतों के द्वारा दिया गया संताप भी भला होता है और दुष्टों के द्वारा दिया गया सम्मान भी बुरा होता है। सूर्य तपता है तो जल की वर्षा भी करता है। परंतु दुष्ट के द्वारा दिया गया भक्ष्य भी मछली का प्राण ले लेता है।

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