बाँसुरी पर दोहे
हिंदी के भक्ति-काव्य
में कृष्ण का विशिष्ट स्थान है और इस रूप में कृष्ण की बाँसुरी स्वयं कृष्ण का प्रतीक बन जाती है।
तनिक न धीरज धरि सकै, सुनि धुनि होत अधीन।
बंसी बंसीलाल की, बंधन कों मन-मीन॥
थिर कीन्हेंचर,चर सुथिर, हरि-मुख मुरली बाजि।
खरब सुकीनो सबनि कों, महागरब सों गाजि॥
बंसी बाजै लाल की, गन गंधर्व बिहाल।
ग्रह तजि-तजि तहँ कुल वधु, स्रवनन सुनत जमाल॥
जिस समय लाल की बंशी बजती है तो उसे सुनकर गंधर्व-गण बेसुध हो जाते हैं और ब्रज की कुलवधुएँ भी गृह कार्य तज कर उसे ध्यान से सुनने लगती हैं।
हा हा! अब रहि मौन गहि, मुरली करति अधीर।
मोसी ह्वै जो तू सुनै, तब कछु पावै पीर॥
कियौ न, करिहै कौन नहिं, पिय सुहाग कौ राज।
अरी, बावरी बँसुरिया, मुख-लागी मति गाज॥
वह मुरली अधरान की, वह चितवन की कोर।
सघन कुञ्ज की वह छटा, अरु वह जमुन-हिंलोर॥
बंस-बंस में प्रगटि भई, सब जग करत प्रसंस।
बंसी हरि-मुख सों लगी, धन्य वंस कौ बंस॥
तूहूँ ब्रज की मुरलिया, हमहूँ ब्रज की नारि।
एक बास की कान करि, पढ़ि-पढ़ि मंत्र न मारि॥
फूँकनि के चल तीर तन, लगे परतु नहिं चैनु।
अंग-अंग आप विधाइकै, हमहूँ बेधतु बैनु॥