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वैराग्य पर उद्धरण

कुछ भी इतना मधुर नहीं होना चाहिए कि सुनते ही नींद जाए और इतना प्रेरक भी नहीं कि समझने पर वैराग्य जाए।

रघुवीर चौधरी

कुछ भी इतना मधुर नहीं होना चाहिए कि सुनते ही नींद जाए और इतना प्रेरक भी नहीं कि समझने पर वैराग्य जाए।

रघुनाथ चौधरी

वेदांत में वैराग्य का अर्थ है—जगत् को ब्रह्मरूप देखना। जगत् को हम जिस भाव से देखते हैं, उसे हम जैसा जानते हैं, वह जैसा हमारे सम्मुख प्रतिभात होता है—उसका त्याग करना और उसके वास्तविक स्वरूप को पहचानना।

स्वामी विवेकानन्द

महाभारत को जिस प्रकार एक ही समय में कर्म एवं वैराग्य का काव्य कहा जाता है, उसी प्रकार कालिदास को भी एक ही समय में सौंदर्य-भोग एवं भोगविरति का कवि जा सकता है।

रवींद्रनाथ टैगोर

आधुनिक मनुष्य से वैराग्य की बात कहना अत्यंत कठिन है।

स्वामी विवेकानन्द

यदि हम वैराग्यवश पथ को त्याग दें तो बार-बार विपथ में चक्कर काटते फिरेंगे।

रवींद्रनाथ टैगोर

वैराग्य की अति की स्वाभाविक प्रतिक्रिया थी भोगासक्ति।

कृष्ण बिहारी मिश्र