'दुपहिया' की डायरेक्टर सोनम नायर से बातचीत
रचित
02 अप्रैल 2025

गए दिनों अमेज़न प्राइम वीडियो पर रिलीज़ हुई एक वेब सीरीज़—‘दुपहिया’। सोशल मीडिया में इस सीरीज़ को लेकर ख़ासी चर्चा हो रही है। काल्पनिक बिहार में काल्पनिक रूप से अपराधमुक्त काल्पनिक गाँव धड़कपुर पर आधारित इस सीरीज़ की कहानी बड़ी सहजता से हमारे समय-समाज की सचाई दिखाती है। सीरीज़ की कहानी और किरदारों को और बेहतर ढंग से जानने के लिए, यहाँ पेश है ‘दुपहिया’ की डायरेक्टर सोनम नायर से एक ख़ास बातचीत :
सोनम जी, आपसे पहला सवाल बहुत ही रवायती क़िस्म का है : आप अपनी जर्नी के बारे में कुछ बताइए। इंटरनेट पर आपका जो प्रोफ़ाइल है, उसके अनुसार आप पश्चिम बंगाल से हैं, फिर यूएस और वहाँ से वापस मुंबई—तो इस पूरी यात्रा के बारे में हमें कुछ बताइए।
मैं बॉम्बे में पैदा हुई थी, लेकिन जब तीन-चार साल की थी, तो मेरे फ़ादर की पोस्टिंग... रिसड़ा नाम का एक छोटा-सा शहर है, जो कैलकटा (कोलकाता) से दो घंटे दूर है, वहाँ हो गई। मैं वहीं बड़ी हुई। बेसिकली, वो एक छोटा शहर था, तो वहाँ ज़्यादा कुछ होता नहीं था। बहुत बोरिंग और सिंपल लाइफ़ थी, तो हम लोग बस पूरा दिन बैठकर टी.वी. देखते रहते थे। मुझे फ़िल्मों का शौक़ वहीं से हुआ।
मेरी मॉम के जो फ़ादर थे, जब मैं तीन साल की थी तब उनकी डेथ हो गई। मैं कभी उनसे मिली नहीं, मगर वो फ़िल्मों में डायलॉग राइटर थे। दारा सिंह की मूवीज़ के डायलॉग्स लिखते थे। उन्होंने दारा सिंह के साथ एक फ़िल्म भी डायरेक्ट की थी। यह हमने सुना था, लेकिन हम लोग तो इतने छोटे गाँव में बिल्कुल कट-ऑफ़ थे।
मुझे लगता था कि अगर मेरी फ़ैमिली से किसी ने (फ़िल्मों में काम) किया है, तो शायद मैं भी कर सकती हूँ, मगर कोई ऐसा कनेक्शन तो बचा नहीं था। शायद उनकी जो आत्मा है (हँसते हुए), वह मेरे अंदर आ गई और उनका जो ख़्वाब था कि और फ़िल्में बनानी हैं, वो मेरे अंदर आ गया।
दारा सिंह की जिस तरह की फ़िल्मों की आप बात कर रही हैं, उससे सेंसिबल सिनेमा तक का पूरा दौर भी बदल गया।
हाँ, मतलब, उन्होंने सेवेंटीज़ (सत्तर का दशक) में एक फ़िल्म बनाई थी। उसके बाद, मेरा ख़याल है कि वो एक और फ़िल्म बनाना चाहते थे, लेकिन उनकी हार्ट अटैक से डेथ हो गई। फिर मैं अमेरिका गई—(पश्चिम) बंगाल से सीधा अमेरिका चली गई पढ़ने के लिए, क्योंकि मेरे फ़ादर की जॉब ऐसी थी कि वो बहुत ट्रैवल करते थे, तो उनका मन था कि मैं भी ट्रैवल करूँ, दुनिया देखूँ, छोटे से शहर में न रह जाऊँ।
जैसे हमारे ‘दुपहिया’ शो में भी है न कि लड़की को बाहर जाना है और उसके फ़ादर उसको सपोर्ट करते हैं—बिल्कुल वैसे ही। उन्होंने मुझसे कहा, “तुम बाहर जाओ, पढ़ाई करो।” तो मैं पाँच साल न्यूयॉर्क में रही। मैंने फ़िल्म-मेकिंग सीखी, लिटरेचर पढ़ा, राइटिंग सीखी और एक साल वहाँ काम भी किया—छोटा-मोटा, जैसे एक्स्ट्रा को कास्ट करना या रिसेप्शनिस्ट का जॉब।
यानी शुरू से ही फ़िल्म-लाइन में?
हाँ, मुझे पहले से ही बहुत क्लियर था कि इसी वर्ल्ड में रहना है—राइटिंग, डायरेक्शन या कुछ भी… मतलब, इसी ज़ोन में रहना है। तो शुरू से जो भी जॉब मिला, मैंने इसी लाइन में किया। उसके बाद मैं यहाँ मुंबई आ गई। दो फ़िल्मों में असिस्ट किया—एक अयान मुखर्जी की ‘वेक अप सिड’, उसकी कहानी और मेरी लाइफ़ में काफ़ी सिमिलैरिटीज़ हैं। उसमें भी एक लड़की कलकत्ता से आती है और घर बनाती है, वैसी ही मेरी भी लाइफ़ चल रही थी तब।
उसके बाद मैंने ‘सात ख़ून माफ़’ में विशाल भारद्वाज जी के साथ काम किया। इसमें भी मैं असिस्टेंट डायरेक्टर थी। विशाल जी का सिनेमा मुझे बहुत पसंद है।
फिर मैंने अपनी फ़िल्म लिखी और डायरेक्ट की, जिसे करण जौहर ने प्रोड्यूस किया। फिर वेब-सीरीज़, शॉर्ट फ़िल्म्स—मतलब जो भी काम मिला, करने लगी। अब तो बारह-तेरह साल हो गए मुझे।
आपने कहा कि आपका बचपन एक क़स्बे में बीता। क्या वह क़स्बा ‘दुपहिया’ के गाँव की प्रेरणा रहा?
स्क्रिप्ट तो मेरी नहीं है, यह मेरे पास लिखी हुई ही आई थी; लेकिन, मुझे लगता है कि उसकी जो सोल है, वह मैं समझ गई थी। ‘दुपहिया’ के गाँव और मेरे बचपन के क़स्बे की भाषा बिल्कुल अलग है, रहने के तरीक़े अलग हैं, पूरा गाँव बिल्कुल अलग है। इसकी जो महक है, वह बहुत अलग है, मगर जो सोल होती है—कि सब एक साथ रहते हैं, यू नो, एक छत से दूसरी छत पर बात कर लेते हैं, सब बच्चे एक साथ खेलते हैं, सब मिलकर शाम को साथ बैठते हैं; वह जो एक कम्युनिटी की फ़ीलिंग होती है, मैं वैसे ही माहौल में बड़ी हुई थी। तो मैं उसे समझ गई। लोगों को लग रहा था कि मैं सिटी-टाइप लड़की हूँ और मैं शहरी चीज़ें बनाती हूँ, लेकिन अस्ल में, मैं इसकी सोल समझ गई थी।
मेरा अगला सवाल है कि बिहार का ही एक गाँव क्यों? मतलब, गाँव तो कहीं का भी हो सकता था।
स्क्रिप्ट में शुरू से ही ऐसा लिखा हुआ था। अविनाश और चिराग, जो हमारे राइटर्स हैं, उनका विचार था कि बिहार बहुत ही… यू नो… फ़ेमस है—क्राइम को लेकर। हर शो, हर मूवी—जहाँ भी बिहार की कहानी होती है, वहाँ हमेशा क्राइम, थ्रिलर, मार-धाड़ ही दिखाई जाती है। ऐसी एक इमेज बन गई है कि वहाँ तो बस यही सब है।
तो अगर हमें क्राइम-फ़्री गाँव की कहानी कहनी थी, तो सबसे ज़्यादा फ़नी यही होता कि हम उसे इसी सेटिंग में दिखाएँ—कि देखो, बिहार में भी एक ऐसा गाँव है जो क्राइम-फ़्री है। इससे और ज़्यादा मज़ा आता। दूसरा कारण यह भी था कि वहाँ की बोलचाल और तौर-तरीक़े इतने मज़ेदार हैं कि इस कहानी के लिए वह जगह बिल्कुल फ़िट बैठती है।
क्या ‘दुपहिया’ बनाते समय आपको कहीं यह डर था कि इसकी तुलना ‘पंचायत’ से होगी, या फिर आप इस बात को लेकर ख़ुश थीं?
हमको पता था—होगी क्योंकि दोनों गाँव पर आधारित शो हैं, लेकिन हमें यह भी पता था कि इसके अलावा कुछ और समानता नहीं है। कहानी बिल्कुल अलग है, किरदार अलग हैं, बल्कि टोन भी बहुत अलग है। हम तो ख़ुश थे कि इतनी सक्सेसफ़ुल सीरीज़ से तुलना हो रही है। अगर कोई ऐसा सोचे कि यार, ‘पंचायत’ का सीज़न आने में टाइम है, चलो यह देख लेते हैं, तो हमें कोई प्रॉब्लम नहीं है। मुझे इस बात से कोई परेशानी नहीं थी कि लोग कंपेयर कर रहे हैं। बल्कि, यह तो अच्छी बात है! अगर इतने बड़े शो से तुलना हो रही है, तो इसका मतलब है कि हमने कुछ अच्छा बनाया है।
इस शो की एक आलोचना जो सोशल मीडिया पर हो रही है, वह कास्ट-डायनामिक्स को लेकर भी है। मतलब, जो कास्ट-पॉलिटिक्स है; वह इतनी गहरी है कि जैसी शादी सीरीज़ में आपने दिखाई है, ऐसी शादी बहुत मुश्किल से होती है। जबकि आपकी सीरीज़ में यह सब बड़े सटल-वे में हो रहा है।
इसी में एक और सवाल है कि इस सीरीज़ में जो स्त्री पात्र हैं, उनका कहीं कोई दमन नहीं हो रहा है! न ही कोई मुस्लिम किरदार है इसमें। गाँव में कोई भेदभाव नहीं है, सिवाय रंगभेद के। इसके अलावा कोई सोशल इश्यूज़ नहीं दिखाए गए हैं।
तो क्या ‘दुपहिया’ एक फ़ेयरीलैंड है? एक यूटोपिया है?
बिल्कुल वही, जो आपने कहा—यूटोपिया। हम वही बना रहे थे। कम-से-कम इन लोगों को, जो यहाँ के निवासी हैं—उन्हें इस बात का गर्व है कि देखो, हमारे यहाँ कोई भेदभाव नहीं है, हम कितने अच्छे हैं, हम आधुनिक हैं, हमारे यहाँ क्राइम नहीं है, हम बेटियों को भी आगे बढ़ाते हैं, हमने ऐसा ही दिखाया है; लेकिन फिर, अंत में उन्हें एहसास होता है कि अस्ल में, हम उतने आगे नहीं हैं, जितना हम समझ रहे थे। वह दुनिया बनाने के लिए, जो हमने स्थान चुना, जो प्रोडक्शन डिज़ाइन किया, वह सब कुछ ऐसा रखा कि गाँव बेहद ख़ूबसूरत लगे, लोग बहुत सुंदर दिखें, ताकि ऐसा लगे कि यह कोई अलग ही गाँव है, जो वास्तविकता से थोड़ा दूर है। यहाँ अतरंगी लोग रहते हैं, मगर कितने प्यार से रहते हैं। यहाँ तो सब कुछ अच्छा ही अच्छा है।
लेकिन फिर धीरे-धीरे हमें समझ में आता है कि नहीं, इनके भी अपने कुछ अंदर दबे हुए राज़ हैं। सबका कुछ-न-कुछ चल रहा है—किसी ने झूठ बोला है, किसी ने चोरी की है, किसी ने प्यार में धोखा दिया है और भी बहुत सारी चीज़ें हैं, जो धीरे-धीरे हम लोग खोलते हैं और फिर, अंत में जो मुख्य बात है हम वो दिखाते है। शुरुआत में किसी ने सोचा भी नहीं था, लेकिन दहेज तो लिया जा रहा है। वह भी तो क्राइम है। अंत में असली सचाई सामने आती है।
तो शुरुआत में हमें यह दिखाना था कि ये सब अपने आप में बहुत ख़ुश हैं और फिर, धीरे-धीरे यह दिखाना था कि अस्ल में, ऐसी कोई आदर्श दुनिया होती ही नहीं है। इस पूरी यात्रा को दिखाने के लिए हमें एक लंबी कहानी बुननी पड़ी।
मार्क ट्वेन की एक कहानी ‘द मैन दैट करप्टेड हैडलबर्ग’ याद आ गई, जो एक शहर के ट्रांसफ़ॉर्मेशन की कहानी है, जहाँ के लोगों को बहुत गर्व है कि हमारा शहर ऐसा है, वैसा है। ‘दुपहिया’ में भी यही ट्रांसफ़ॉर्मेशन देखने को मिलता है और यह बहुत ख़ूबसूरती से स्क्रीन पर उभर कर आया है, ख़ासकर वह सीन जहाँ बोर्ड पर पेंट किया जा रहा है।
जी थैंक यू।
इस सीरीज़ को लेकर लोगों की किस तरह की प्रतिक्रिया आपको मिली और सबसे इंट्रेस्टिंग ओपिनियन कौन-सी लगी? या फिर आप क्या टेकअवे मानते हो ‘दुपहिया’ से अपने लिए?
एक्चुअली, मैं कहूँगी कि 99 प्रतिशत रिस्पांस तो पॉज़िटिव ही रहा है; क्योंकि हमारा शो इतना सिंपल है, तो आप कितना ही उसको क्या कर लोगे? हमने कुछ ऐसा-वैसा प्रिटेंड नहीं किया कि हम कुछ बहुत बड़ा काम कर रहे हैं। हमने एकदम स्वीट एंड सिंपल स्टोरी को अच्छे परफ़ॉर्मेंस के साथ दिखा दिया। आई थिंक लोग तरस गए थे, थोड़ी-सी एक अच्छी, बस एक अच्छी कहानी—अच्छी परफ़ॉर्मेंस के साथ देखने के लिए, क्योंकि आजकल इतना ओवर वायलेंस है या बहुत सारा मतलब लोगों ने पता नहीं क्या-क्या बनाया है? बजट हाई होता है, बट स्टोरी पर ध्यान नहीं होता है। परफ़ॉर्मेंस पर ध्यान नहीं होता है तो हमने इतनी सिंपल चीज़ बनाई कि उसको क्रिटिसाइज़ करने का लोगों का मन नहीं किया। उनको इतना अच्छा लगा ये देख के तो उसकी वजह से क्रिटिसिज़्म बहुत कम मिला। मुझे सबसे ज़्यादा ख़ुशी हुई कि जो उस एरिया के लोग हैं—बिहार-यूपी-एमपी, वहाँ के लोगों ने जब कहा कि अरे हमको ऐसा लग रहा है कि हमारे गाँव की कहानी है, एकदम। जो लोग हैं, जैसे वो बात कर रहे हैं, जो चीजें हो रही हैं; वो एकदम ऐसा लग रहा है कि हम अपनी अपनी लाइफ़ देख रहे हैं—यह मुझे बहुत अच्छा लगा, क्योंकि बहुत कम शोज़ और मूवीज़ हैं जिनमें लोगों को उनका रिप्रजेंटेशन दिखाई दे।
बिहार की जो इमेज बनी थी, स्पेशियली आफ़्टर ओटीटी—एकदम वायलेंट एंड एक्शन वाली, तो इस तरह की कहानी सच में एक ताज़ा हवा का झोंका है और आपने जो कहा कि हमने सब कुछ ख़ूबसूरत बनाया। मुझे देखते हुए भी लग रहा था; जैसे एक कैरेक्टर लगभग 35-40 की उम्र का है जो नौकरी ढूँढ़ रहा है, लेकिन उसका कुर्ता बहुत सुंदर है? जो एक तरह का यूटोपिया है।
एक्चुअली, यही मेरा थॉट था; हम दिखा रहे हैं कि जो कैरेक्टर हैं, वो गाँव छोड़ के शहर आना चाहते हैं। बट हम दिखाना चाहते थे कि गाँव बहुत ख़ूबसूरत है। गाँव की लाइफ़ बहुत अच्छी है, ताकि शहर के लोगों का मन करे कि हम गाँव चले जाएँ।
हाँ, लेकिन सचाई यह भी है कि गाँव बहुत क्रूर भी हैं। कास्ट-पॉलिटिक्स जिस तरह गाँव में होती है। कोई दलित दूल्हा अगर घोड़ी चढ़कर निकल गया उसके साथ हिंसा, हिंसा की कितनी घटनाएँ हम सुनते हैं। ये तमाम चीज़ें भी गाँव में ही होती हैं।
हाँ।
जो आपने अभी ज़िक्र किया पलायन का, माइग्रेशन पर हिंदी कवि महेश चंद्र पुनेठा की कविता-पंक्तियाँ आती है—सीरीज़ के शुरू में और आख़िर में भी—
“अब पहुँची हो सड़क तुम गाँव
जब पूरा गाँव शहर जा चुका है”
इन पंक्तियों का रेलवेंस क्या था, क्योंकि यह पलायन की कहानी तो नहीं है?
यह पहले से स्क्रिप्ट में थी। आई थिंक स्क्रिप्ट की जब शुरुआत हुई तो मेन थीम यूथ के गाँव छोड़कर शहर जाने पर थी कि वहाँ के लोग अब फ़ोन्स में लग गए। उनको बस शहर जाना है। गाँव के जो ट्रेडिशंस हैं, जो लाइफ़-स्टाइल है अब उनको पसंद नहीं। एक इश्यू तो है कि वहाँ अब सबको…, जैसे हम लोग पहले बोलते थे कि इंडिया छोड़ के हमारे सारे डॉक्टर, इंजीनियर्स बाहर जा रहे हैं और इंडिया में कमी हो रही है, अब सेम गाँव से निकलकर शहर आने के बारे में भी है—ऐसे में जो हमारे गाँव का डेवलपमेंट है उसका क्या? अगर सच में हम छोटे शहर और गाँव को डेवलप करें, उनको और अच्छा बनाएँ तो पूरे देश का ही फ़ायदा है। बट सब लोग (गाँव) छोड़-छाड़ के सिटीज़ में आ रहे हैं, सिटीज़ भर गई हैं। ये सब ‘दुपहिया’ के शुरूआती विचार थे। जब उन्होंने स्क्रिप्ट लिखना शुरू किया, फिर पूरी स्टोरी बनी। राइटर्स का मन था, ये थॉट हमेशा रहे कि आप जहाँ से हो उसे छोड़ के कहीं और जाके कामयाबी ढूँढ़ने की ज़रूरत नहीं है। आप जहाँ पर हैं, वहाँ पर भी बहुत कुछ है—जिसको इस्तेमाल करके आप कामयाब हो सकते हैं। अभी इस सीजन नहीं, बल्कि ओवरऑल पूरी कहानी, दो-तीन जितने भी हमारे सीज़न्स होंगे, उनमें ये थॉट हमेशा रहेगा। इसीलिए उन्होंने इसको पहले से ही अंडरलाइन किया हुआ है।
जी, अब तो दूसरे सीज़न की अनाउंसमेंट भी हो गई। आपको बधाई!
थैंक यू।
दूसरे सीज़न को लेकर कोई योजना? सीरीज़ का टेम्पलेट यही रहने वाला है?
आई थिंक, अभी-अभी ग्रीन लाइट हुआ है तो आइडियाज़ निकलेंगे। उसके बाद हम ये भी देखेंगे कि वो क्या चीज़ें हैं जो लोगों को सबसे ज़्यादा पसंद आईं, फिर उन पर ध्यान देंगे तो इस सीज़न से थोड़ी-सी लर्निंग लेकर आगे बढ़ेंगे। अभी तो बिल्कुल चार दिन पहले ही अगला सीज़न अनाउंस हुआ है।
आज हर गाँव में वीडियो बनाए जा रहे हैं, हर गाँव से क्रिएटर्स वायरल हो रहे हैं। स्टार बन रहे हैं। इस सीरीज़ में आपने इस ऑडियंस को एड्रेस किया है। क्या इस रील्स बनाने वाली ऑडियंस का कोई रिस्पॉन्स आया है आप तक?
बिल्कुल, उन्होंने अब हमारे शो की रील बनाना शुरू कर दिया है। वो लोग अपने गाँव में बैठ के हमारे भूगोल, टीपू, मदन के डायलॉग बोल रहे हैं। दुपहिया चला रहे हैं, डांस कर रहे हैं तो मुझे वो देख के एक्चुअली ख़ुशी भी हो रही है और थोड़ा कन्फ़्यूज़्ड भी हूँ कि कहीं हम इनको और बिगाड़ तो नहीं रहे हैं। मगर अब जो सचाई है, वो है।
‘दुपहिया’ में एक बेरोज़गार है, जो लगभग 40 के आस-पास है और वह नौकरी के लिए भटक रहा है। वहीं एक लड़का है; जो शायद 15-16 साल का है, वो ऑलरेडी स्टार बन रहा है—रील्स के ज़रिये। दूसरे तरह के करियर-ऑप्शन जो अब बने हैं, उनकी तरफ़ भी कहानी में एक इशारा है।
जी, पूरा शो ही एक्चुअली ट्रेडिशन वर्सेस मॉडर्न है। हर कैरेक्टर की थीम है। हमने मोस्टली कैरेक्टर्स को ऐसे ही दिखाया है, जैसे सरपंच है और पुष्पलता है तो वो पुराने ट्रेडिशन में फँसे हुए हैं। पुष्पलता आगे बढ़ना चाहती है, गाँव को आगे बढ़ाना चाहती है। भूगोल के जो फ़ादर हैं बनवारी, वो टीचर बनके वहीं रह गए। बेटा आगे बढ़ना चाहता है। वह फ़ास्ट ट्रैक पे जाना चाहता है। ऐसे हमने मिक्स मैच करके बनाया ताकि वो थीम हमेशा बनी रहे। ट्रेडिशन वर्सेस मॉडर्न।
सोनम जी, हम प्रेमचंद के गाँव देखने के आदी हैं, स्क्रीन पर भी और तमाम जगह भी। आपने एक नई तरह का गाँव दिखाया है। भविष्य के लिए शुभकामनाएँ और धन्यवाद।
जी, थैंक यू रचित!
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बेला पॉपुलर
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