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जोइंदु

आदिकाल की जैन-काव्य-परंपरा के महत्त्वपूर्ण कवियों में से एक।

आदिकाल की जैन-काव्य-परंपरा के महत्त्वपूर्ण कवियों में से एक।

जोइंदु के दोहे

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पंचहँ णायकु वसिकरहु, जेण होंति वसि अण्ण।

मूल विणट्ठइ तरुवरहँ, अवसइँ सुक्कहिं पण्णु॥

पाँच इंद्रियों के नायक मन को वश में करो जिससे अन्य भी वश में होते हैं। तरुवर का मूल नष्ट कर देने पर पर्ण अवश्य सूखते हैं।

देउल देउ वि सत्थु गुरु, तित्थु वि वेउ वि कब्बु।

बच्छु जु दोसै कुसुमियउ, इंधणु होसइ सब्बु॥

देवल (मंदिर), देव, शास्त्र, गुरु, तीर्थ, वेद, काव्य, वृक्ष जो कुछ भी कुसुमित दिखाई पड़ता है, वह सब ईंधन होगा।

बलि किउ माणुस जम्मडा, देक्खंतहँ पर सारु।

जइ उट्टब्भइ तो कुहइ, अह डज्झइ तो छारु॥

मनुष्य इस जीवन की बलि जाता हैं (अर्थात् वह अपनी देह से बहुत मोह रखता है) जो देखने में परम तत्व है। परंतु उसी देह को यदि भूमि में गाड़ दें तो सड़ जाती है और जला दें तो राख हो जाती है।

रूवि पयंगा सद्दि मय, गय फांसहि णासंति।

अलि-उल गंधहि मच्छ रसि, किमि अणुराउ करंति॥

रूप के भ्रम में पतंग, शब्द के वशीभूत हो मृग, स्पर्श के लालच में गज, गंध के लालच में अलिकुल तथा रस में मत्स्य नष्ट होते हैं। यह जानकर विवेकी जीव क्या विषयों में अनुराग करते हैं!

जो जाया झाणग्गियए, कम्म-कलंक डहेवि।

णिच्च-णिरंजण-णाणमय, ते परमप्प णवेवि॥

जो ध्यान की अग्नि से कर्मकलंकों को जलाकर नित्य निरंजन ज्ञानमय हो गए हैं उन परमात्मा को नमन करता हूँ।

सो सिउ-संकरु विण्हु सो, सो रुद्द वि सो बुद्ध।

सो जिणु ईसरु बंभु सो, सो-अणंतु सो सिद्ध॥

वही शिव है, वही शंकर है, वही विष्णु है, वही रुद्र है। बुद्ध, जिन, ईश्वर, ब्रह्म भी वही है। वही अनंत है और वही सिद्ध है।

जो जिण सो हउँ, सोजि हउँ, एहउ भाउ णिभंतु।

मोक्खहँ कारण जोइया, अण्णु तंतु मंतु॥

जो परमात्मा है, वह मैं हूँ, वही मैं हूँ– विश्वास के साथ यह जान। हे योगी, मोक्ष का कारण कोई अन्य तंत्र मंत्र नहीं है।

उब्बस वसिया जो करइ, वसिया करइ जु सुण्णु।

वलि किज्जउँ तसु जोइयहिं, जासु पाउ पुण्णु॥

जो ऊजाड़ में वास करता है तथा शून्य में रहता है, जिसके पाप है और पुण्य; मैं मैं उस योगी की बलि जाता हूँ।

जेहउ मण विसयहँ रमइ, तिमु जइ अप्प मुणेइ।

जोइउ भणइ हो जोइयहु, लहु णिब्बाणु लहेइ॥

जिस प्रकार मन विषयों में रम जाता है, यदि वैसे ही आत्मा का चिंतन करे तो हे योगियो, योगी कहते हैं कि जीव शीघ्र ही मोक्ष पा जाए।

संता विसय जु परिहरइ, बलि किज्जउँ हउँ तासु।

सो दइवेण वि मुंडियउ सीसु खडिल्लउ जासु॥

जो उपस्थित विषयों को त्याग देता है, मैं उसकी बलि जाता हूँ। जिसका सिर मुंडा है, वह तो परमात्मा से ही मूड़ा हुआ है। अर्थात् वह परमात्मा से ही वंचित है।