अशोक वाजपेयी के उद्धरण




कविता परम सत्य और चरम असत्य के बीच गोधूलि की तरह विचरती है।
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कविता सरलीकरण और सामान्यीकरण के विरुद्ध अथक सत्याग्रह है।
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साहित्य, लालित्य के बचाव में प्रयत्नशील बने रहने की भी भूमि है।
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कविता का काम संसार के बिना नहीं चलता। वह उसका सत्यापन भी करती है और गुणगान भी।
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कविता व्यक्ति को दूसरा बनाए जाने के क्रूर अमानवीय उपक्रम के विरुद्ध सविनय अवज्ञा है।
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कविता समाज नहीं, व्यक्ति लिखता है, फिर भी कविता एक सामाजिक कर्म है।
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कविता यथार्थ का बिंब भर नहीं होती। वह उसमें कुछ जोड़ती, इज़ाफ़ा करती है।
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