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तीजनबाई और पंडवानी

आज से बहुत साल पहले की बात है। एक छोटी-सी लड़की थी, सात-आठ बरस की। बारिश का मौसम उसको पसंद नहीं था, इसलिए बारिश के दिनों में वह पाठशाला नहीं जाने के लिए रोती थी। बारिश वाली सुबहों में वह नींद खुल जाने पर भी आँखें बंद करके नींद का बहाना करती। उसको उठाने के लिए लड़की के पिताजी अक्सर रेडियो चालू कर देते और रेडियो सुनकर लड़की फट से उठ कर बैठ जाती थी। जुलाई का ही महीना था, एक दिन रात भर बारिश हुई थी, लड़की को फिर से स्कूल जाने का मन नहीं था, उसके पिताजी ने रेडियो चालू किया, रेडियो पर रोज़ बोलने वाली स्त्री आज किसी और स्त्री का संक्षिप्त जीवन-परिचय सुना रही थी और उसके बाद अगली आवाज़ में छोटी लड़की ने एक कहानी सुनी जिसे एक स्त्री गाकर सुना रही थी, शायद नाचती भी हो, रेडियो में छोटी लड़की को दिखाई नहीं दे रहा था। कहानी महाभारत की थी, भीम और अर्जुन और कुंती की बातें चल रही थीं, छोटी लड़की तो रोज़ रात में टीवी पर महाभारत देखती थी। महाभारत के पात्रों को वो पहचानती थी, कौरव-पांडव, पाँच भाई सबको पहचानती थी। पर उसने पहली बार महाभारत को गीत की तरह सुना। जो स्त्री यह सुना रही थी उसका नाम था तीजनबाई, तीजनबाई को छोटी लड़की ने एक साल पहले भी देखा था टीवी पर, तब लड़की को याद आई पंडवानी। पंडवानी कहते हैं उस गीत को जिसमें महाभारत गाकर सुनाई जाती है। इन सब बातों के बीच छोटी लड़की तैयार होकर अपने पाठशाला के लिए कब निकल गई, उसे भी पता नहीं चला।

बहुत साल बाद, छोटी लड़की अब बड़ी हो गई है; पर उसे बारिश अब भी उतनी ही नापसंद है, जुलाई का ही महीना है, और गरज-गरज कर कल रात भी ख़ूब बारिश हुई है, लड़की सारी रात सो नहीं पाई रोती रही थी। सुबह के तीन-चार बजे जब बादल का ज़ोर थोड़ा कम हुआ और नींद का थोड़ा गहरा, तब थोड़ी-सी नींद ले पाई थी। सुबह आँखें खोलते ही जब उसने फ़ोन देखा तो पता चला कि तीजनबाई नहीं रहीं! वह चली गईं। वह लंबी बीमारी से जूझ रही थीं। वह बस चली गईं। बारिश के ही दिनों में, लड़की का कितना बड़ा नुक़सान हुआ है कि वह किसी को समझा नहीं सकती।

तीजनबाई ‘पंडवानी’ का दूसरा नाम थीं। एक कला बहुत सारे कलाकारों को जीवित रखती है; पर तीजनबाई ने पंडवानी को जिया, उसे ज़िंदा रखा, उसे देश-विदेश तक लेकर गई, बहुत नाम कमाया, इज़्ज़त कमाई, बहुत से सम्मान अपने नाम किए। तीजनबाई को पद्म श्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण सम्मान मिला था; इसके साथ ही संगीत नाटक अकादेमी पुरस्कार, नृत्य शिरोमणि पुरस्कार से भी वह नवाज़ी गई थीं, बहुप्रतिष्ठित फुकुओका सम्मान भी उन्हें मिला था। इन सबकी शुरुआत हुई थी बहुत साल पहले, जब तेरह साल की तीजन ने बाक़ी स्त्रियों की तरह बैठकर (वेदमती शैली में) पंडवानी गाने की जगह, पुरुषों की तरह खड़े होकर (कापालिक शैली में) पंडवानी गाने को चुना! उसी दिन ही विधाता ने ये सब कुछ तीजनबाई के नाम कर दिया था।

पंडवानी में एक मुख्य गायक होता है, एक रागी जो गायक के साथ ही संगत करता है और बाक़ी संगतकार वादन करते हैं। मुख्य गायक तंबूरा बजाकर गाता है, रागी हूँ-कार देता है, बाक़ी संगतकार मंजीरा, तबला, ढोलक और हारमोनियम बजाते हैं। तीजनबाई जब मंच पर पंडवानी गाती थीं, लोग एकटक उन्हें देखा करते, पंडवानी का मुख्य नायक भीम होता है, जब वह युद्ध-भूमि में खड़े बलशाली भीम की तरह आँखों को बड़ा करके, गरजती थीं, लोगों को साक्षात् भीम ही दिखता, जब वह कुंती और गांधारी का पुत्र-विलाप सुनातीं, लोगों की आँखों से आँसू नहीं रुकते थे। रेडियो पर, टीवी पर हर जगह तीजनबाई की पंडवानी ने एकछत्र राज किया है। तीजनबाई सिर्फ़ एक कलाकार नहीं थी, उनका मंच पर आना ही क्रांति था, पंडवानी के लिए उन्होंने अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। उन्होंने कई लड़कियों को पंडवानी की कला सिखाई। वह बहुतों की गुरु माँ रहीं। तीजनबाई एक ऐसा नाम है जो छत्तीसगढ़ के बच्चे-बच्चे के ज़बान पर है। सब उनसे प्यार करते थे। पिछले कुछ वर्षों में वह बहुत बीमार हो चली थीं। उन्होंने बिस्तर पकड़ लिया था। एक कलाकर जब तक मंच पर होता है, किसी के सामने उसे कभी हाथ फैलाने की ज़रूरत नहीं पड़ती; पर बिस्तर पकड़ते ही कलाकार बहुत मज़बूर हो जाता है, बीमारी और आर्थिक तंगी से जूझ रहे कलाकारों के लिए सरकार ने कोई ठोस क़दम नहीं उठाए। जो कलाकार देश-दुनिया में, छत्तीसगढ़ की माटी का नाम रोशन कर रहे हैं; उनके लिए सरकार को कुछ पुख़्ता और ज़रूरी क़दम उठाने चाहिए, बुरे वक़्त में आर्थिक सहयोग प्रदान करने के लिए कुछ तो करना चाहिए। कितने ही कलाकार अपने अंतिम समय में गुमनामी, ग़रीबी और बीमारी से चल बसते हैं। ऐसे में हम कल के कलाकारों को क्या आश्वासन दे पाएँगे? आने वाली पीढ़ी के बच्चों को किस मुँह से बोलेंगे अपनी कला अपनी संस्कृति को बचाए रखना। कैसे अपनी धरोहर सँजोएँगे? तीजनबाई के जाने से एक बहुत बड़ी जगह ख़ाली हो गई है, जिसे कोई दूसरा कलाकार शायद ही भर पाए, क्योंकि आज के समय में अपना सब कुछ खोकर बिना किसी सहयोग के कौन-सा कलाकार रह पाया है और कौन-सी कला ज़िंदा बच पाई है? हम अपने आँखों के सामने खोता देख रहे हैं सब कुछ! और हम कुछ कर भी नहीं सकते। धीरे-धीरे हमारे बचपन का हिस्सा ख़त्म होता जा रहा है, तीजनबाई के साथ ही बहुत कुछ खो गया। छोटी बच्ची के लिए सुबह की तेज़ बारिश में राहत थी तीजनबाई की आवाज़ जो सदा के लिए खो गई। कितना शर्मनाक और भयंकर है, आज के समय में वरिष्ठ कलाकार जीते जी बहुत दुःख भोगते हैं, आर्थिक परेशानी, बीमारी, बुनियादी सुविधाओं से दूर, सरकार पूछने तक नहीं जाती... जब तक कि दो-चार लोग इस पर लिखकर आलोचना न करें। क्या कलाकार के मरने के बाद उनकी जयंती मनाना और उनके नाम पर किसी पुरस्कार की घोषणा करना ही सम्मान है, जबकि कलाकार के जीते जी उनके लिए कितना कुछ किया जा सकता है।

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