नवोदय की नॉट सो गुड मेमोरीज!
गीतांजली सिन्हा
13 अप्रैल 2026
अप्रैल की 13 तारीख़ को नवोदय स्थापना दिवस होता है। इस साल मेरे नवोदय को 25 साल हो गए। कितने शान से खड़ा है नवोदय और पिछले 25 सालों में इसने कितने सारे बच्चों के जीवन को संवारा है। नवोदय को याद करती हूँ तो दिल में अलग ही भाव आता है, एक अच्छा एहसास जैसा नानी के घर को याद करके आता है। इसके साथ ही कुछ ऐसा भी है जो बचपन की यादों में एक काँटे की तरह चुभता है। कुछ ऐसा जिसको लिखने से मैं बचती रही थी, पर कुछ ऐसा हुआ है कि मैं इसे लिखने से रोक नहीं पाई।
बीते दिनों एक नवोदय विद्यालय में बच्चों के साथ मारपीट की घटना के बारे में सुना। मीडिया वाले पालकों से बात कर रहे थे। पालकों का कहना था कि मोबाइल फ़ोन रखने की मनाही थी, फिर भी बच्चों ने फोन रखे। जब बच्चों से मोबाइल फ़ोन बरामद हुए तो दो शिक्षकों ने उन्हें बहुत बुरी तरह से पीटा। जैसे ही यह घटना प्रकाश में आई, मेरे नवोदय के एलुमनी ग्रुप में हलचल हो गई। बहुत से जूनियर अपना नवोदय का एक्सपीरियंस बताने लगे कि कैसे उन्होंने भी अपने समय में कितनी मार खाई है। ये सब दिमाग़ में चल ही रहा था कि मुझे एकाएक अपने स्कूल का रजत जयंती समारोह याद आ गया। मुझे यह याद आया कि 15 साल बाद स्कूल वापस जाने पर स्कूल की अच्छी यादों के साथ-साथ, कुछ ऐसी यादें भी आँखों के सामने तैर आईं जिन्हें कोई सपने में भी न याद करना चाहे। कुछ सीनियर्स दिखे और कुछ शिक्षक भी जिनसे मिली, जो मुझे बहुत अच्छे से याद हैं, पर जिन्हें मैं याद नहीं थी। जो लोग आपके साथ बुरा व्यवहार करते हैं—उन्हें आप याद नहीं, आपकी शक़्ल तक उनको याद नहीं। हैरानी की बात तो यह है कि सालों बाद भी आप उनको भूल नहीं पाए। वे कैसे दिखते हैं, उनकी आवाज़ कैसी है, जब वे आप पर चिल्लाते या आपका मज़ाक़ उड़ाते थे, तब उनके चेहरे पर आने वाले भाव तक आपको याद रहते हैं। जीवन की आपाधापी में आपको लगेगा कि आप उन्हें भूल गए हैं। आप अपने जीवन में व्यस्त रहते हैं, फिर किसी रात आपकी नींद में चुपके से किसी सपने में वे वापिस आ जाते हैं। आपको उतना ही बुरा लगता है, जितना आपको स्कूल में रहते समय लगा था। आप कभी उन बुरी यादों से पीछा नहीं छुड़ा सकते हैं।
मुझे हमेशा से ही लगता है कि दुनिया का सबसे कठिन काम होता है शिक्षक का। एक अच्छा शिक्षक बच्चों को केवल पढ़ाता नहीं है, उनके सर्वांगीण विकास पर ध्यान देता है। पाठ्यक्रम के इतर वह बच्चों को दुनिया भर की चीज़ें बताता-सिखाता है। बच्चों के मानसिक विकास में एक अहम भूमिका निभाता है। उन्हें एक खिड़की खोल कर देता है, जिसके बाहर से बच्चे दुनिया को और जिसके भीतर अपने आत्म में झाँकते हैं। मैंने जीवन में कभी भी शिक्षक बनने का नहीं सोचा था, पर अब मुझे पढ़ाते हुए पाँच साल हो गए हैं। मैंने जिस दिन यह नौकरी ज्वॉइन की थी, उसी दिन ही ठान लिया था कि चाहे जो भी हो जाए—मैं ऐसी शिक्षक बनूँगी जैसे मुझे कभी नहीं मिले। मेरी कक्षा में कोई भी बच्चा पीछे नहीं छूटने पाएगा। मैं हरसंभव यह प्रयास करूँगी कि बच्चे में—दुनिया को, ख़ुद को समझने की क्षमता विकसित हो। सभी बच्चों को ऐसे ही शिक्षक की ज़रूरत होती है, चाहे वह दुनिया के किसी भी स्कूल के किसी भी कक्षा का विद्यार्थी हो। नवोदय विद्यालय जैसे आवासीय विद्यालयों में तो यह अति आवश्यक हो जाता है।
आवासीय विद्यालयों में बच्चे बहुत ही कम उम्र से लगभग 10-11 की उमर से पढ़ने आते हैं। अपने पीछे वो छोड़ आते हैं—अपना प्यार भरा परिवार, गाँव के दोस्त और छोटे-भाई बहनों को। अपना पूरा संसार ही छोड़कर हॉस्टल में रहने आते हैं। अपने कंफ़र्ट ज़ोन से बाहर एक नई दुनिया को आत्मसात करना, सुबह के साढ़े पाँच बजे की घंटी के साथ उठना और रात को दस बजे लाइट बंद होने तक, अपने आपको दुनिया की भीड़ में दौड़ने लायक़ बनाने के लिए जूझना। ये सब आसान बात नहीं। ऐसे में जो अंदर से मायूस होते हैं, उन्हें हर वक़्त घर की याद आ रही होती है, फिर उन्हें मैथ्स के होमवर्क का भी डर रहता है। उन्हें हॉस्टल में वह भी खाना पड़ता है, जो उनको बिल्कुल नहीं पसंद। अपना जन्मदिन और बहुत से लोकपर्व स्कूल में ही मनाने पड़ते हैं। ऐसे में किसी बच्चे को मानसिक या शारीरिक प्रताड़ना झेलनी पड़े तो इससे बुरा क्या हो सकता है? ख़ासकर जब ये प्रताड़ना किसी शिक्षक ने की हो। उन बच्चों को कुछ नहीं चाहिए था, वे बस इतना चाहते थे कि उनके साथ भी समान व्यवहार हो—जैसा दूसरे बच्चों के साथ होता है, उन्हें भी थोड़ा-सा प्यार ही चाहिए था।
नवोदय विद्यालय में पढ़ने का सबसे बड़ा और केवल एक फ़ायदा जो मुझे हुआ वह यह है कि यहाँ आकर कुछ दोस्त बने, कुछ सीनियर्स जो दीदी-भैया बने, कुछ जूनियर्स भाई-बहन, ये ख़ून के रिश्ते नहीं थे पर उतने ही मज़बूत हैं। जब तक दुनिया में नवोदय में बने ये रिश्ते हैं, इतनी बड़ी दुनिया में भी मैं कभी अकेली नहीं हो सकती हूँ। नवोदय की सबसे ख़राब बात मुझे यह लगती है कि जिन बच्चों के साथ विद्यालय में बुरा हुआ, जिन्हें सताया गया, उनको अपने आपको समेटकर वापस खड़ा होने में बहुत वक़्त लगता है और कभी-कभी तो वो ताउम्र अपना आत्मविश्वास वापस नहीं हासिल कर पाते। उनको हमेशा ही याद रहते हैं, वो अतरंगी टेढ़े-मेढ़े से नाम जो उनको चिढ़ाने के लिए दूसरे बच्चे उपयोग करते थे, कुछ टीचर्स जो हमेशा अपने आस-पास कुछ चुनिंदा बच्चों को अपना पसंदीदा बनाकर रखते थे और पूरे 7 साल सताये गए बच्चों को यही अहसास दिलाया गया कि दूसरे बच्चे तुमसे बेहतर है इसलिए तो ये हमारे पसंदीदा हैं। ये बहुत आगे जाएँगे, नाम कमाएँगे, तुम कुछ भी नहीं कर पाओगे, शून्य ही रहोगे।
सबसे बुरी बात यह है कि एक समय के बाद सताये गए बच्चों को भी लगने लगता है कि वे कुछ नहीं कर सकते हैं। सब उनसे बेहतर हैं, दुनिया की दौड़ में वे पीछे रह जाएँगे। वे कभी कुछ नहीं कर सकते, वे किसी काम के लायक़ नहीं, उनसे कोई प्यार नहीं करता, न कभी कोई प्यार करेगा। उनका आत्मविश्वास मर जाता है, विद्यालय से निकलने के बाद या तो वो सबसे कट जाते हैं या दोस्त के नाम पर उनके नवोदय के ही केवल गिने-चुने दोस्त होते हैं, जिनके सहारे उन्होंने 7 साल निकाले। नए दोस्त बनाने से उनको डर लगता है, अजनबियों से घबराते हैं, कुछ ख़ुशकिस्मत लोगों को बाहर की दुनिया में अच्छे दोस्त मिल जाते हैं तो वे सँभल जाते हैं, समेट लिए जाते हैं। कुछ लोग कभी अपने बनाए अदृश्य घेरे से बाहर नहीं आ पाते, उन्हें लगता है कि बाहर की दुनिया उन्हें दुख ही देगी, बाहर रहने वालों के पास दिल नहीं है, ऐसे बच्चे ताउम्र मुरझाए रहते हैं। जबकि सबसे ज़्यादा प्यार और अपनेपन के हक़दार तो यही थे।
क्या हमें सोचना नहीं चाहिए ऐसे बच्चों के बारे में? जब आज दुनिया में हम मानसिक स्वास्थ्य को भी उतनी ही अहमियत देते हैं, जितनी शारीरिक स्वास्थ्य को तो क्या ये ज़रूरी नहीं हो जाता कि हमें बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर भी बहुत आवश्यक क़दम उठाने चाहिए? हमें ये देखना चाहिए कि हमसे ग़लती कहाँ हो रही? हम लगातार फ़ेल क्यों हो रहे हैं?
शिक्षक बनने के लिए ज़रूरी अहर्ताओं में कॉलेज की डिग्री, बीएड की डिग्री तो शामिल है, लोग बहुत मेहनत करके दो-तीन परीक्षाओं और इंटरव्यू पास करके शिक्षक तो बन जा रहे हैं, पर सच में वे कैसे शिक्षक हैं ये कैसे तय होगा? बच्चों के साथ एक कक्षा या एक विद्यालय के अंदर उनका व्यवहार कैसा है, ये कैसे पता चलेगा? ख़ासकर आवासीय विद्यालयों में। जहाँ एक शिक्षक ही बच्चों के माँ-बाप भी हैं। ख़ैर क्या सारी ज़िम्मेदारी शिक्षकों की ही है? बहुत से लोग ऐसे भी है जो बच्चे पैदाकर माँ-बाप तो बन गए हैं, पर उन्हें पता ही नहीं है कि बच्चों को पालना कैसे हैं। उन्हें अपने बच्चों से कोई मतलब ही नहीं। बहुत से पालक ऐसे भी हैं, जिन्हें ये तक नहीं पता होता है कि बच्चे घर से निकल कर स्कूल जा रहे हैं कि नहीं। किस स्पीड से गाड़ी दौड़ाकर स्कूल पहुँच रहे हैं? आवासीय विद्यालयों में बच्चे 10-11 की उमर से आ रहे हैं, पर उसके पहले तो पालकों के साथ ही होते हैं तो क्या बच्चों को सदाचार और अनुशासन सिखाना पालकों का काम नहीं? क्योंकि किसी भी शिक्षा की नींव घर से ही डाली जाती है। तो क्या आजकल बच्चों के अनुशासनहीन होने और अनुचित व्यवहारों के लिए पालक भी ज़िम्मेदार नहीं? सबकुछ स्कूल और शिक्षकों पर डालना बिल्कुल अनुचित है, ख़ासकर तब जब पालक और समाज का भी बच्चों के विकास पर पूरा-पूरा असर है। विद्यालय चाहे आवासीय हो या ग़ैरआवासीय आज भी बच्चों के मोबाइल के उपयोग पर पूर्णतः प्रतिबंध है।
यह प्रतिबंध ज़रूरी भी है, शिक्षा में एक बहुत बड़ा व्यवधान है मोबाइल। ऐसे में बच्चों का छिप-छिपाकर मोबाइल लेकर स्कूल आना कहाँ तक सही है? क्या पालकों की यह ज़िम्मेदारी नहीं कि वे देखें उनके बच्चे घर पर क्या कर रहे हैं? क्या ज़िम्मेदारी केवल विद्यालय की है? कितने ही पालक ऐसे हैं जो अपने बच्चों के स्कूल आकर शिक्षकों से मिलकर जाते हैं? बहुत से पालक ऐसे भी हैं जो शिक्षकों की बात ही नहीं सुनते उनका अनादर करते हैं, ऐसे में बच्चे क्या सीखेंगे?
पालकों और विद्यालय के बीच आपसी सामंजस्य का होना बहुत ज़रूरी है। पालकों को समय-समय पर विद्यालय आकर शिक्षकों से मिलना चाहिए। अपने बच्चों के बारे में सलाह-मशविरा करना चाहिए। दोनों मिलकर एक टीम की तरह काम करें तो कोई भी बच्चा विकास में पीछे नहीं छूटेगा। दुनिया को देखने-समझने का नज़रिया विकसित होगा। वह एक बेहतर इंसान बनेगा जो अपने कर्म और देश समाज के प्रति ईमानदार होगा। बच्चे सबकुछ कर सकते हैं, दुनिया जीत सकते हैं, इसे सुंदर बना सकते हैं, बस उन्हें बदले में केवल प्यार और अपनापन ही चाहिए।
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