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यह ख़ाली जगह नहीं भरेगी

एक जनवरी को वह जब इस दुनिया में आया था, कड़ाके की ठंड थी। नए साल की सौगात लेकर वह आया था। तब देश आज़ाद भी नहीं था। किसे पता था यह बालक कितने लोगों के जीवन में आज़ादी लेकर आएगा—विचारों की आज़ादी। जिस भी भाषा का ज्ञान हो उसी भाषा में अभिव्यक्ति की आज़ादी। सरल से सरल शब्दों में ख़ुद को व्यक्त करने की आज़ादी। किसी विचार की तरह ही नया गरम कोट पहनकर वह आया था। लगभग नब्बे साल तक वह आदमी यहीं रहा और जब तक यहाँ था, वह बाँटता रहा अपने शब्द, एकदम ही सादे-सीधे शब्दों में, साधारण से दिखने वाले शब्दों में असाधारण कविताएँ, कहानियाँ। छोटा-बड़ा, अमीर-ग़रीब, स्त्री-पुरुष सब तक पहुँचते रहे उसके शब्द, सीधा लोगों के दिलों में उतरते रहे। सबको अपनी-सी लगती रही उसकी रचनाएँ। इतना सहृदय, सरल स्वभाव का व्यक्ति, एक ऐसा कवि जो अपने अंतिम समय तक कवि ही रहा, लगातार लिखता रहा। कहा करता था कि लिखना मेरे लिए साँस लेने जैसा है। हॉस्पिटल के बेड पर भी लिखता रहा, अंतिम साँस लेने से पहले भी लिखता ही रहा। अपनी सारी गर्माहट, सारे मौसम, सारे महीने, रात और दिन, कविताओं और कहानियों में समेटकर वह व्यक्ति चला गया—गरम कोट पहने विचार की तरह, हमें दिसंबर की ठंड में ठिठुरता हुआ छोड़कर। उस व्यक्ति का नाम है—विनोद कुमार शुक्ल।

विनोद कुमार शुक्ल से पहली मुलाक़ात कैसे हुई थी जानना चाहेंगे? वह साल 2023 की आख़िरी सुबह थी। बहुत ठंड थी, हम सब नीचे घास पर बिछी दरी पर बैठे थे। ठीक सामने एक सोफ़े पर विनोद कुमार शुक्ल बैठे थे। अपनी कविताओं का पाठ कर रहे थे। जो कविता वह सुनाते उस कविता को लिखे जाने की कहानी भी सुनाते जाते। कुछ कविताएँ पहले की थीं, प्रकाशित हो चुकी थीं; कुछ कविताएँ एकदम नई थी, जो बाद में क़िताब के रूप में प्रकाशित हुईं। सुनने वाले लोग बीच-बीच में किसी कविता की फ़रमाइश करते कि दादा यह वाली सुना दीजिए, वह वाली सुना दीजिए—तो बराबर वह सारी कविताएँ सुनाते जाते। लगभग तीन घंटे तक वह कविता सुनाते रहे। काव्य-पाठ के अंत में दादा का जन्मदिन भी हमने मनाया था, अगले दिन यानी कि एक जनवरी को उनका जन्मदिन था। यह थी मेरी विनोद कुमार शुक्ल से पहली मुलाक़ात।

उसके बाद बीते साल, सितंबर में ‘हिन्द युग्म उत्सव’ में उनसे दूसरी बार मिलना हुआ था। उत्सव में ही दादा को तीस लाख का रॉयल्टी चेक दिया गया था। जो कि उन्हें उनके बहुचर्चित उपन्यास ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ के लिए मिला था। एक समय ऐसा भी था, जब वह अपनी रॉयल्टी के लिए बहुत भटके थे। बहुत परेशान हुए थे। शुक्र है मानव कौल उनसे मिलने आए और सारी दुनिया को तब ही पता चला कि वरिष्ठ लेखक किस हद तक सताए गए हो सकते हैं, कि अपने हक़, अपनी रॉयल्टी के लिए उन्हें इतना भटकना पड़ता है। ख़ैर ‘हिन्द युग्म’ से उनकी किताबें छपी और हालत बदले और उनको उनका हक़ भी मिला।

मैं जो भी लिखती दादा तक वह बराबर पहुँचता रहता। उनसे बहुत कुछ सीखा है मैंने, सबसे ज़्यादा पढ़ा भी उनको ही है। मैंने सोचा था इस साल शीतकालीन अवकाश में उनसे मिलने जाऊँगी या एक जनवरी को उनके जन्मदिन पर ज़रूर मिलूँगी। उनसे मिलकर बताऊँगी कि अभी हाल फ़िलहाल में क्या पढ़ा, क्या लिखा? बहुत उत्साहित थी मैं और इसलिए ही सारे काम जल्दी से जल्दी दो दिनों में निपटा देना चाहती थी ताकी इत्मीनान से रायपुर जाकर उनसे मिल सकूँ। कई दिन से उनके ही ख़याल मन में थे। 23 दिसंबर को मैं सुबह से अपने काम में व्यस्त थी, मेरा फ़ोन कहीं पड़ा था, शाम को छह बजे के लगभग सारे काम निपटाकर मैंने फ़ोन उठाया तो देखा कि दोस्तों के मैसेजे आए हैं, सबमें विनोद कुमार शुक्ल के देहावसान की ख़बरें थीं। मुझे पहले विश्वास ही नहीं हुआ, थोड़े दिन पहले ही तो अभिनेता धर्मेंद्र के बारे में ऐसी ही भ्रामक बातें फैली थीं, इसलिए अलग-अलग स्त्रोतों से पता लगाया और जिसका मुझे डर था वही हुआ—ख़बरें सच थीं। वह सचमुच चले गए थे। मुझे पहले कुछ मिनट में कुछ समझ नहीं आया, कुछ भी नहीं, मैंने बस एक आवाज़ लगाकर अपनी माँ से कहा कि विनोद कुमार शुक्ल नहीं रहे, चले गए। माँ ने जवाब में रसोई से क्या कहा मैं सुन नहीं पाई, मैंने अपने आपको कमरे में बंद कर लिया था। तीसरी मुलाक़ात हमेशा के लिए बाक़ी रह गई।

विनोद कुमार शुक्ल का जाना छत्तीसगढ़ ही नहीं पूरे देश के लिए एक अपूरणीय क्षति है। उनके जैसा साहित्यकार छत्तीसगढ़ में न कोई था, न है और शायद ही कोई होगा। उनकी क़िताब ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ में उन्होंने लिखा था कि “हाथी के जाने से एक बड़ी-सी जगह निकल आई थी। यह तो था कि हाथी आगे-आगे निकलता जाता था और पीछे हाथी की ख़ाली जगह छूटती जाती थी।” उनके जाने से जो ख़ाली जगह छूट गई है, वो अब कभी भी नहीं भरेगी।

उन्होंने लिखा—

मैं छाता लेकर काम पर जाता हूँ 
किसी पेड़, ऊँची चट्टान, किसी घर की दीवाल, दरवाज़े, देहरी की छाया में अपने छाते को बार-बार भूल आता हूँ 
अपरिचित, परिचित, आत्मीय, किसी छाया में अपना भूला छाता पा लेना चाहता हूँ और पा जाता हूँ।

इस बार वह छाता यहीं भूल गए हैं और कभी नहीं लौट आने को चले गए। उनका छाता, उस छाते के छाया की बदली यही रह गई हैं। उनके जाने से ऐसा लग रहा है जैसे कोई बहुत ही अच्छी कहानी चल रही थी रंगमंच पर और अचानक ही पटाक्षेप हो गया हो। सारे दर्शक जो बैठे थे हॉल में, अचानक ही हड़बड़ा गए हों। जो दुनिया उन्होंने रची थी—शब्दों से, जादुई दुनिया—जिसमें रहते थे रघुवर प्रसाद, सोनसी, हाथी और जादुई खिड़की, जहाँ पानी पर सुंदर रंगोली बनती थी। एक और जादुई दुनिया उन्होंने बनाई थी, जिसमें बोलू था, जो केवल चलते हुए बोलता था, कुना थी, पाठशाला के गुरुजी थे, छोटी-छोटी चिड़िया थी, बजरंग होटल था और साथ थी हरी घास की छप्पर वाली झोपड़ी और बौना पहाड़। सारा जादू कहीं चला गया है, सारा तिलिस्म ग़ायब। जादूगर जा चुका है।

हम सबने उनको पढ़ा है उनकी यह जादुई दुनिया देखी है, उनके शब्दों से बुने ताने-बाने में हम कभी न कभी बैठकर सुस्ताएँ ज़रूर हैं। उन्होंने कभी हमें हताशा में अकेले नहीं बैठने दिया। एकदम ही साधारण दिन पर एकदम ही औसत दिखने वाली लड़की को भी उन्होंने सुंदर लड़की ही कहा। किसी कविता में किसी बच्चें को गोद में झुलाया तो कभी हमारे बचपन की लिखन्नी-मिटन्नी-छीलन्नी की यादें ताज़ा की। कभी पहाड़ को बुलाने के लिए “आओ पहाड़” नहीं कहा, हमेशा कहा “पहाड़ हम आ रहे हैं”। पहाड़ को घर लाने के लिए पहाड़ पर एक घर बनाया, रहने के लिए एक गुफ़ा ढूँढ़ी और उसको हमारा पैतृक घर कहा तो कभी राजिम के विष्णु मंदिर में दूर का माथा टेकना भी शामिल है। कभी दुनिया में चार फूल रहे और बोने को चार बीज। कभी दीवाल के ऊपर बैठी लड़की की कोई छोटी इच्छा हुई तो कभी घड़ी में बजने वाला समय सबका समय नहीं रहा। तरह-तरह के पेड़, आम-महुआ, चिड़िया, अबाबील, शेर-भालू थे। लड़की को जंगल जाते हुए डर नहीं लगता था, शेर को भालू से डर नहीं लगता था, पर गीदम जाने डरती थी। कभी ‘ग’ में छोटी ‘उ’ की मात्रा ‘गुड़िया’ रही तो कभी उछलती कूदती छोटी लड़की। विनोद कुमार शुक्ल हमेशा ही छत्तीसगढ़िया ही रहे। अपने घर में थे तब भी और दूर से अपना घर देखा तब भी।

अपनी एक कविता में उन्होंने लिखा है कि ‘मृत्यु कभी भी हो परंतु अंतिम साँस लेने ले लिए मेरे पास हमेशा समय रहेगा कि खिड़की के पास लगे पड़ोस के चम्पा के फूलों की सुगंध को अंतिन साँस में समेट लूँ।’ प्रिय कवि चले गए हैं और अचानक ही चले गए हैं। वह लिख रहे थे उनको अभी नहीं जाना चाहिए था, कविताएँ अभी उनका इंतज़ार कर रही हैं, उनका जाना अचानक ही है। वह कहते थे कि—

छत्तीसगढ़ी को सुनता हूँ 
तो चिड़ियों की चहचहाहट को समझता हूँ
और कातर होकर 
‘झनजा’ के किसी के रोकने से
पूरे जग से बिछुड़ना रुक जाता है।

अगर मैं दादा को रोकूँ और वह न रुक पाएँगे तो मैं उन्हें यह भी नहीं कह सकती कि ‘छत्तीसगढ़ी में वह झूठ बोल रहा है। 'लबारी' बोलत हे।’ अलविदा प्यारे कवि और बहुत शुक्रिया अपने जादुई शब्दों से दुनिया को बहुत बेहतर और सुंदर, जीने लायक़ बनाने के लिए। आपने बचा ली है अपनी प्यारी दुनिया को लोगों की नज़रों से, और हम इसे बचाए रखेंगे। जब तक दुनिया रहेगी, आपके जादुई शब्द भी रहेंगे, विकुशु हमेशा ज़िंदा रहेगा।

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