रविवासरीय 4.0 : यात्रा जितनी रही, वृत्तांत उतना कहाँ!
अविनाश मिश्र
14 जून 2026
• यात्रा जितनी रही, वृत्तांत उतना कहाँ!—इस शीर्षक के साथ—‘रविवासरीय’ की यह चौथी ऋतु ‘बेला’ पर आज समाप्त हो रही है। गई तीन ऋतुओं की भाँति ही इस स्तंभ को इस ऋतु में भी पर्याप्त प्रेम प्राप्त हुआ। इस स्तंभ के प्रकाश में प्रस्तुत प्रतिक्रियाओं का एक प्रसारपूर्ण कोलाहल आसन्न गए रविवारों में मुझ पर सतत सवार रहा आया।
• एक बार जब सुकरात को किसी ने एक व्यक्ति के बारे में बताया कि अपनी यात्राओं के बाद भी उसमें कोई प्रगति नहीं हुई, तब सुकरात ने कहा, “मुझे इस पर पूरा विश्वास है, क्योंकि वह अपने साथ ख़ुद को भी ले गया था।”
• यहाँ इस प्रसंग में गत वर्ष के ही कुछ बिंदु दुहराऊँ, तब कह सकता हूँ कि ‘रविवासरीय’ का प्रादुर्भाव स्व-प्रेरणा से आज से लगभग चार वर्ष पूर्व हुआ। इसका प्रथम प्रारूप स्वयमेव ही तय हुआ और इसके बाद मुझ पर इसका स्व-रचित दबाव रहने लगा। कुछ तात्कालिक, कुछ प्रासंगिक और कुछ नियमित रचने के बहुत आत्मानुशासन ने इसे रूप-आकार प्रदान किया।
‘रविवासरीय’ एक पुस्तकाकार योजना का अंग न कभी था, न है, न होगा। यह नितांत ग़ैर-महत्त्वाकांक्षी प्रोजेक्ट है और विशुद्ध रूप से लेखकीय-रियाज़ के लिए जन्मा है। इसमें कई साहित्यिक विधाओं का समावेश हो और इसका रूपाकार बराबर बनता-बिखरता-बिगड़ता-बनता रहे, यों रविवासरीयकार की आकांक्षा रही आई है। इस आकांक्षा की पूर्ति के लिए नवीन के साथ-साथ मेरा प्राचीन काम भी मेरे बेहद काम आता रहा है, यथा : दर्ज-बेदर्ज वाक्य-विचार, भूले-भटके उद्धरण-गद्यांश, खो-हो गईं पंक्तियाँ-सूक्तियाँ, अन्यत्र प्रयोग-विन्यस्त अनुच्छेद-टिप्पणियाँ, प्रकाशित-अप्रकाशित-अर्द्धप्रकाशित लेख-वक्तव्य-साक्षात्कार, मन को बार-बार मथने वाले कुछ वस्तुनिष्ठ प्रश्न, डायरियाँ-तस्वीरें-पत्र-पुस्तकें-ब्लर्ब, नोट्स-पोस्ट्स-चैट्स-मैसेजेस-मेल्स...
‘रविवासरीय’ का शिल्प साहित्यिक विधाओं, पैमानों और प्रचलनों के अनुरूप क़तई व्यावहारिक नहीं है। इसकी बनत-बुनत में संवाद के सूत्र हैं। इन्हें संरचित करने के लिए ठोस, नुकीली और धारदार शैली प्रयोग में लाई जाती है। इस स्तंभ का काम किसी क़िस्म का सुधा-संचार नहीं है। एक अपूर्व भाषा में सरल से जटिल और जटिल से सरल की ओर प्रगतिशील होकर इसका केंद्रीय कार्यभार कदाचार का विरोध या कहें उसके प्रति विद्रोह है। इसमें मुद्दे और विचार अक्रमिक ढब से आवाजाही करते हैं। इसमें एक चर्चा होते-होते, दूसरी चर्चा होने लगती है और दूसरी चर्चा होते-होते... यहाँ बातों में परस्पर काटा-कूटी चलती है। इसमें सब कुछ इस प्रकार व्यक्त होता है कि वह एक व्यक्ति की नहीं, कई व्यक्तियों की आवाज़ और उनका पक्ष लगे। इस बीच प्रायः सूक्तिपरक वाक्य संभव होते हैं, जिन्हें इस व्यवहार में समो लिया जाता है। एकदम आरंभ में तो ‘रविवासरीय’ में केवल सूक्तियाँ ही सूक्तियाँ थीं। इस वजह से ही ‘रविवासरीय’ की प्रथम ऋतु में महज़ 5752 शब्द ही थे, दूसरी ऋतु में यह संख्या बढ़कर 15756 हुई तो तीसरी में 27008 और इस चौथी ऋतु में 27010...
‘रविवासरीय’ का पूर्व की दो ऋतुओं में कोई भी शीर्षक नहीं हुआ करता था, पर बाद में प्रकाशन-स्थान-परिवर्तन की वजह से प्रत्येक ‘रविवासरीय’ के साथ शीर्षक संलग्न करने पड़े। यों इसमें प्रतिवर्ष कुछ परिवर्तन हुए हैं, लेकिन यह नियम मैंने अब तक नहीं बदला कि प्रत्येक ‘रविवासरीय’ में ग्यारह बिंदु [•] ही रहेंगे और मैं इस स्तंभ को साल के शुरुआती सोलह रविवारों तक निर्बाध रूप से रचूँगा। यह स्वयं को सौंपा गया टास्क है, और इस अर्थ में यह स्वायत्त भी है। यह अन्य अनुरोधों-अपेक्षाओं-उपक्रमों से उत्तेजित नहीं है। यह आत्मान्न है। मैं इसे स्वयं के अनुशासन, अभ्यास, मूल्य, विचार और ईमान को जाँचने के लिए प्रतिरविवार संभव-प्रस्तुत करता हूँ।
मैं चाहता हूँ कि ‘रविवासरीय’ के सोलह रविवारों में मेरी ‘सोलह कलाएँ’ नज़र आएँ। मैं चाहता हूँ कि मैंने अब तक जिन-जिन विधाओं में काम किया, यहाँ इस अवधि में उन्हें एक नए सिरे से समझ सकूँ। मैं चाहता हूँ कि मैं इसमें बहुत चाहूँ... यह एक प्रकार का व्रत, एक प्रकार का स्व-प्रशिक्षण, एक प्रकार का अन्वेषण है कि मैं अपनी कलाओं-विधाओं-कामनाओं में आज कहाँ हूँ! मैं इनमें अब कैसे कह-बह-रह सकता हूँ। मैं इनमें अब कैसे हो-खो सकता हूँ। मैं इनमें अब कैसे...
• ‘महाभारत’ कोई पढ़े या न पढ़े, वह ‘महाभारत’ से प्रभावित है।
• प्रत्येक नई कृति/पुस्तक के साथ अपने कुछ पाठक-प्रशंसक खो देने वाली बात कई लेखकों ने कही है। एक लंबे समय तक लिखते रहने के बाद एक सीमित पाठक-प्रशंसक-संसार में कुछ ख़ास पाठकों-प्रशंसकों को लेखक चिह्नित कर लेते हैं। इनमें से कुछ इतने ज़्यादा ख़ास होते हैं कि लिखते समय लेखक के सामने अक्सर उनका अक्स घूमने लगता है। मैं ख़ुद को खोकर इस अक्स को ख़ुश नहीं कर पाता हूँ। इसका नतीजा यह है कि मैं प्रत्येक रविवार कुछ ख़ास पाठक-प्रशंसक खो देता हूँ।
• साहित्य सहमति की कृषि नहीं है।
प्रत्येक नई बात इस काल में एक विश्वासघात सरीखी लगती है। वह अकेलेपन का संताप देती है। स्पर्श संदिग्ध प्रतीत होता है। सहयात्री छूट-उतर जाते हैं। अविश्वास्य आगे बढ़ जाता है। सीमाएँ बहुत दूर नज़र आती हैं। उम्मीद उत्साह के बल पर शैथिल्य को जीतने का यत्न करती है। आवागमन, आगमन, आवर्तन, बहिर्गमन, प्रवास, प्रस्थान, प्रत्यागमन... एक साथ कई दरवाज़े बंद हो जाते हैं।
• एक स्वप्न :
मैं एक कविता-कार्यशाला में आमंत्रित हूँ, लेकिन वहाँ कोई कवि नज़र नहीं आ रहा है।
मैं कुछ पल बाद यह समस्या समझ पाता हूँ कि यहाँ कवि को कवि नज़र नहीं आएँगे।
सब तरफ़ कवि ही कवि नज़र आएँ, इसके लिए अकवि होना होगा।
मैं अकवि नहीं हो पाता, क्योंकि मैं यहाँ कविता संभव करने के लिए हूँ।
मैं यह काम कुछ ही देर में कर देता हूँ।
इसके बाद एक भद्र-सा व्यक्ति मेरे पास आता है और मेरे हाथ से मेरी कविता ले लेता है।
सब तरफ़ काले कपड़ों में लड़के-लड़कियाँ हैं। उन्होंने मस्तक पर लाल पट्टी बाँध रखी है। उनके हाथों में लोहे के भारी रॉड हैं।
इस समूह में से एक लड़की आगे आती है और उस भद्र व्यक्ति के हाथ से मेरी कविता ले लेती है। वह उसे पढ़ती है और उसमें आए कई शब्दों को लाल स्याही से घेर देती है। वह बहुत हिक़ारत से मेरी तरफ़ देखते हुए कहती है, “ये शब्द नहीं चलेंगे। इनकी जगह वे शब्द रखो जो हमारे शब्दकोश में हैं।”
मैं उससे पूछता हूँ, “आपका शब्दकोश कहाँ है?” इस पर वह लड़की एक लड़के की तरफ़ इशारा करती है। वह लड़का मुझसे चलने का इशारा करता है और मैं उसके पीछे-पीछे धीमे-धीमे चल पड़ता हूँ... उनका शब्दकोश एक दीवार पर लिखा हुआ है। उसे एक जगह ठहरकर पूरा नहीं देखा जा सकता। उसे देखने के लिए बिल्कुल बाईं तरफ़ से सीधे चलते रहना होगा। इस दीवार पर प्रत्येक शब्द बहुत स्पष्ट, दीर्घाकार और महत्त्वाकांक्षी ढंग से लिखा हुआ है। उसने व्यापक स्थान घेर रखा है और उसे लिखने के लिए केवल लाल और काले रंग को ही उपयोग में लाया गया है। यहाँ किसी भी शब्द का कोई लिंग नहीं है। उनकी कोई अस्मिता और पृष्ठभूमि भी नहीं है। उनके साथ व्याकरणिक संक्षेप-चिह्न, भाषा-स्रोत के संक्षेप-चिह्न और विषयों के संक्षेप-चिह्न आदि नहीं हैं। वे केवल शब्द हैं और बमुश्किल बीस-बाईस मीटर चलने पर ख़त्म हो जाते हैं।
वह लड़का मुझसे कहता है कि अब आप यह दूरी दौड़कर तय कीजिए और वे शब्द जो हाँफते हुए आपकी पकड़ में आ जाएँ; उन्हें ही इधर-उधर करके कविता लिखिए, फिर हमें दीजिए...
मैं उससे और उसके लोहे के भारी रॉड से लड़ने-झगड़ने लगता हूँ कि इतने में मेरी नींद टूट जाती है।
• प्रतिक्रिया
रचना सुंदर हो सकती है या असुंदर
इससे भिन्न या इसके मध्य की
सारी स्थितियाँ या कहें प्रतिक्रियाएँ [?]
द्वंद्व उत्पन्न करने के लिए हैं
द्वंद्व प्रतिक्रिया में नहीं
रचना में सुंदर लगता है
क्योंकि उससे सुंदर और असुंदर
दो प्रतिक्रियाएँ जन्म लेती हैं
प्रतिक्रिया भी रचना हो सकती है
पर स्व-रूप खोकर
रचना में प्रतिक्रियांश का विवेक
रचना को सबल या दुर्बल बनाता है
सुंदर!
असुंदर!—
ये दो प्रतिक्रियाएँ ही हैं बस
शेष सब इस तरफ़ संकेत है
कि समय कट नहीं रहा है
उसे प्रतिक्रिया से काटना पड़ रहा है।
• मैं सीधे, सच्चे और अच्छे व्यक्तियों से डरता हूँ; बुरे लोगों से नहीं।
• ‘रविवासरीय’ की चौथी ऋतु की यूँ तो यह अंतिम क़िस्त है, और इस वर्ष अब और नए ‘रविवासरीय’ उपलब्ध नहीं होंगे। लेकिन अगर आगे बहुत ज़रूरत अनुभव हुई, तब ‘रविवासरीय’ की कुछ-एक समयपूर्व/अतिरिक्त/एक्सक्लूसिव क़िस्तें सामने आ सकती हैं।
‘रविवासरीय’ की संरचना जैसा कि ज्ञात ही है : अक्सर आक्रामक होती है, इसलिए इसके पास सायुध आने में ही समझदारी मानी जाती है। खुट्टल चाक़ू, टूटी-घिसी निब और ख़ाली-ज़ंगशुदा पिस्तौल दिखाने से यहाँ रक्षा नहीं होती है।
• आगे तीव्र ढलान है, ध्यान से चलिए...
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