रविवासरीय 4.0 : मेरी बहन की कविताएँ, एक प्लेलिस्ट की याद और थोड़ा-सा कानपुर
अविनाश मिश्र
26 अप्रैल 2026
• एक बंद घर में प्रतीक्षा भरी होती है। एक प्रतीक्षा जिसमें इच्छा नहीं होती। डोरबेल बजती और बजती और बजती ही रहती है। इस पर वस्तुएँ कैसे प्रतिक्रिया करती हैं, इस पर गंध कहाँ तक जा सकती है, इस पर मनुष्येतर जीवन के क्या विचार हैं—रहवासी जान नहीं पाते! घर में कोई नहीं है का दुःख प्रमोद सिंह का गद्य हो जाता है। वह घर में कोई है के सुख में बदलकर विनोद कुमार शुक्ल का वाक्य होना चाहता है कि आख़िर इस बंद घर में सामाजिक कैसे हुआ जाए!
• मेरी माँ पाँच बहनें थीं। मेरी माँ इन बहनों में सबसे छोटी थी। इस प्रकार मेरी चार मौसियाँ हुईं। इनमें से दो का विवाह एक ही गाँव में हुआ। माँ के साथ इस गाँव में हम भाई-बहन बचपन में बार-बार जाते थे। हमें नानीघर से ज़्यादा मौसीघर अच्छा लगता था। इस गाँव में दो मौसियाँ और तीन घर थे; जहाँ हमें बहुत प्यार मिलता, जबकि नानीघर तो सिर्फ़ नानीघर था और वहाँ नानी भी नहीं थीं। पर यहाँ सात मौसेरे भाई और उनकी पत्नियाँ थीं, जो हमें बहुत-बहुत प्यार करतीं। हम तय नहीं कर पाते कि कहाँ जाएँ, कहाँ रुकें, कहाँ चाय-पानी पिएँ, कहाँ कलेवा करें, कहाँ भोजन... एक को उपेक्षित करके ही, दूसरे को प्रसन्न किया जा सकता था!
मैं इस स्थिति में कई बार माँ के साथ मौसीघर गया—सिर्फ़ माँ और मैं—बारह साल की उम्र तक। हम अपने नगर के रेलवे स्टेशन—कानपुर सेंट्रल—से दुपहर बारह बजे के आस-पास वाली छोटी लाइन की पैसेंजर पकड़ते। हमें खिड़की-किनारे की सीट मिल जाती, जिन पर दो-चार स्टेशन के बाद दूधिये अपने ख़ाली डिब्बे बाँधकर हमारे दृश्य को बाधित कर देते...
हम अपराह्न दो बजे के आस-पास एक छोटे-से स्टेशन—उत्तरीपुरा—पर उतरते, प्याऊ से पानी पीते और मुख्य सड़क से लगी एक पगडंडी पर क़रीब-क़रीब दो-ढाई किलोमीटर धीरे-धीरे पैर-पैर चलते हुए गाँव-घर आ जाते—माँ अपनी बहनों के और मैं अपनी मौसियों के। हमें रास्ते में बहुत सारी बंजर और उर्वर भूमि मिलती तथा ऋतु-अनुसार फ़सलें—गेहूँ, सरसों, धान, गन्ना, अरहर...
अब दृश्यालेख बदल चुका है। अब वह कम बहुत कम प्रकृतिप्रधान है। अब पहले से बहुत कम वृक्ष हैं। अब छोटी लाइन बड़ी लाइन हो चुकी है। अब पहले से बहुत कम जल है। अब प्याऊ की जगह बोतलों-पाउचों में बंद-पैक पानी है। अब बंजर भूमि पर एक विशाल पावर प्रोजेक्ट प्लांट लग चुका है। अब अधिकांश उर्वर भूमि भी इस प्रोजेक्ट के लिए अधिगृहीत है। अब पैर-पैर चलने की ज़रूरत नहीं है। अब सड़क से घर तक ई-रिक्शा चलने लगे हैं। अब घरों में निजी वाहन भी बहुत हैं। अब माँ नहीं है। अब चार में से तीन मौसियाँ भी नहीं हैं। अब इस गाँव में सिर्फ़ एक मौसी हैं—‘माँ मरे, मौसी जिए...’ वाले मुहावरे को महत्त्वमय करती हुईं—वह अब भी जाने पर डाँटते हुए गले लगा लेती हैं, माथा चूम लेती हैं, भूल जाने की शिकायत करती हैं...
माँ के न रहने के नौ साल बाद मेरी बड़ी बहन की शादी भी इस गाँव में ही हुई। गई महामारी में बड़ी बहन भी नहीं रही। इसके बाद महामारी भी नहीं रही। नहीं रहने तक व्यक्ति बच जाए, तब बचता-रहता चला जाता है। वह हिसाब-किताब करता-लिखता चला जाता है।
लेकिन अब इस गाँव में जाने का मन नहीं करता, जबकि अब घर यहाँ तीन से ज़्यादा हो गए हैं; और प्रेम और परिचय भी अब तक नष्ट नहीं हुए हैं... पर न जाने क्यों मन नहीं करता-लगता!
• एक याद में यों क्या-क्या और याद आता है! जब से याद आना शुरू हुआ, तब से अब तक का सब कुछ याद आता है! कुछ भी भूलता क्यों नहीं! सिर में दर्द होने लगता है...
• सिरदर्द भी एक विशेष चीज़ है। इसकी दवा लेने जाओ तो दुकान बंद मिलती है। इससे सिरदर्द और बढ़ जाता है। दवा की दुकान अब भी बंद है।
• मेरी बड़ी बहन मेरे बचपन में कुछ बच्चों को उनके घर जाकर ट्यूशन पढ़ाया करती थी। इससे घर-ख़र्च में मदद मिलती थी। बहन की उम्र तब अठारह-उन्नीस बरस की रही होगी, मेरी आठ-नौ बरस की। वह अक्सर शाम को घर आकर तुरंत लेट जाती और कहती कि उसके सिर में बहुत दर्द हो रहा है। मैं तब समझ नहीं पाता था कि यह सिरदर्द क्या बला है! मैं बहन से कहता कि मुझे कभी सिरदर्द नहीं होता। वह हँस देती। टीवी-रेडियो पर एक लड़की गाती, “न रहे पीड़ा, न रहे दर्द, सिर्फ़ एक—सिर्फ़ एक सेरिडॉन...”
मेरी बहन का सेरिडॉन में अंधा यक़ीन था। इससे उसे राहत मिलती थी, इसलिए यह बिल्कुल बेबुनियाद भी नहीं था। लेकिन उसे उसके सिरदर्द से स्थायी मुक्ति उसकी मृत्यु तक नहीं मिली। वह उसे दो-तीन दिन में एक बार ज़रूर होता। उसका यह सिरदर्द मेरे बचपन की अदृश्य पुस्तक में एक अपरिहार्य और अनसुलझे रहस्य की तरह दर्ज है, शायद इसलिए कि तब तक मुझे सिर के दर्द का एक भी शिक्षादायक अनुभव नहीं हुआ था। मुझे मात्र इतना भर समझ में आ गया था कि सिर में दर्द किसी यकायक मिली और नज़र आ रही चोट की वजह से नहीं होता।
मेरी बहन सेरिडॉन पर सेरिडॉन लेती रही। फिर ‘अब पछताए होत क्या...’ वाला वक़्त आया यानी जैसा कि ज़्यादातर ‘कारगर’ दवाओं के साथ होता है, बाज़ार में सेरिडॉन इत्यादि के सम्मानजनक प्रवेश के बीस-पच्चीस वर्ष बाद सिरदर्द की दवाओं के दुष्प्रभाव पता लगे। वे जिनके शरीर में ये दुष्प्रभाव खुलकर प्रकट हुए, तब तक वृद्ध या लगभग वृद्ध और कुछ कर पाने में पहले से अधिक असमर्थ हो चुके थे। औषधि-उद्योग ने इस दुष्प्रभाव को ‘साइड इफ़ेक्ट’ का नाम दिया।
मेरी बहन समय से पहले वृद्ध और दिवंगत हुई। उसकी मृत्यु के बाद से सिरदर्द मेरे जीवन का भी एक अभिन्न अंग बन गया। वह तरह-तरह से मुझे होता रहता है; जैसे सिर को चारों ओर से रस्सियों से कस दिया गया हो, जैसे सिर के कभी दाईं कभी बाईं तरफ़ कुछ बहुत तेज़-तेज़ चल रहा हो, जैसे आँखें खोलने की इच्छा ही न हो रही हो, जैसे देह में पानी की कमी हो गई हो, जैसे अचानक रक्तचाप बढ़ा हो, जैसे कोई अविस्मरणीय और अभूतपूर्व संक्रमण उभर आया हो, जैसे सिर के पीछे कोई हथौड़े मार रहा हो, जैसे देहांग विषाक्त वायु में रहते ही चले गए हों, जैसे सोते समय दाँत पीसे गए हों, जैसे नींद में साँस रुकी हो...
लेकिन बहन के अनुभवों से सीखते हुए, मैं इस सिरदर्द की दवा नियमित लेने से बचता हूँ। मैं कोशिश करता हूँ कि यह एक बिंदु पर ही रुका रहे और आगे न बढ़े। और आगे बढ़ेगा तो मैं क्या करूँगा... दुकान तो बंद है!
• मेरे सिरदर्द में थोड़ी देर के लिए आई नींद में एक स्वप्न आता है :
मैं अपनी स्मृति के प्रथम आवास में हूँ। रविवार है। एक दुपहर की तरफ़ धीमे-धीमे बढ़ती हुई एक सुबह है। एक मंदिर में उगे हुए पीपल के एक विशाल वृक्ष के विस्तार से ढकी हुई छत है। कानपुर शिशिर-सा प्राचीन है, ग्रीष्म-सा प्रतीक्षित, वर्षा-सा संक्रमित... मेरी बहन एक रजिस्टर पर कुछ रच रही है। इसमें ही कहीं कुछ बहुत स्वादयुक्त पकने की महक है। मेरी बहन ने ढलते हुए पीले रंग का सलवार-सूट पहन रखा है। मेरी बहन ने सलवार-सूट के सिवा कभी कुछ नहीं पहना। वह प्रेमपूर्ण लग रही है। मैं उसका रजिस्टर छीन रहा हूँ। वह मुझे डाँट रही है—बिल्कुल मेरी आँखों में देखकर...
मेरी नींद टूट जाती है... मेरी...
• माँ पर कुछ कवि इस प्रकार की कविताएँ संभव करते हैं कि माँ की गाली देने का मन करता है। मेरी बहन की कविताएँ भी कुछ इस दिशा में ही थीं। मैं अपनी बहन को माँ की गाली कैसे दूँ! इसलिए यह गाली मैं उन कवियों को देता हूँ, जो माँ की तलाश माँ की उम्र की स्त्रियों में नहीं करते। इसमें सारा दोष माँ-बाप का है।
माँ-बाप एक उम्र के बाद अपने बच्चों पर पाबंदी कुछ इस क़दर सलीक़े से कम कर देते हैं कि बच्चे माँ-बाप के प्रति आभारी हुए बग़ैर स्वयं को मुक्त महसूस करते हैं। उन्हें लगता कि उन्होंने मुक्ति चुराई है, जबकि माँ-बाप बच्चों को बहुत कुछ सिखाना नहीं चाहते हैं। वे चाहते हैं कि बच्चे बहुत कुछ अपने प्रयोगों, अपनी ग़लतियों और अपने अनुभवों से सीख लें। यों माँ-बाप अपने अर्जित को अपनी संतानों के लिए वर्जित कर देते हैं। इस दरमियान संतानें इस वर्जित को अर्जित करते हुए इस मुग़ालते में रहती हैं कि वे कुछ अपूर्व कर रही हैं, जबकि वे सिर्फ़ पूर्व-अर्जित को दुहरा भर रही होती हैं...
• वे गई सदी के आख़िरी दशक का कानपुर था। सब तरफ़ समीर था और नदीम-श्रवण और आशिक़ी और खलनायक और दिल है कि मानता नहीं और मैंने प्यार किया और प्यार किया तो डरना क्या और और प्यार हो गया और सिर्फ़ तुम और टी-सीरीज़ और गुलशन कुमार और अताउल्लाह ख़ान और अल्ताफ़ राजा और अनुराधा पौडवाल और कुमार शानू और उदित नारायण और अलका याग्निक और सोनू निगम और तमाम पॉप सिंगर्स और न जाने क्या-क्या... इस न जाने क्या-क्या में ‘दैनिक जागरण’ और ‘दूरदर्शन’ कानपुर की एक बहुत पुरानी बसावट—क़ुली बाज़ार—में सूचना के एकमेव स्रोत थे। यों कह सकते हैं कि तब हम उतना ही जान पाते-सकते थे, जितना सतह पर था।
इस वक़्त, इस बसावट, इस सतह पर ही एक रोज़ मेरी बहन के द्वारा भेजा जा रहा एक पार्सल मेरी माँ के हाथ लग गया था। इसमें बहन के रजिस्टर के बीच का एक पन्ना था, जो रजिस्टर से जुदा होते ही चार पन्नों की एक चिट्ठी में बदल गया था। इसके पहले पन्ने पर एक तीर को आर-पार लेता हुआ दिल था और रक्ताभ होंठों की छाप... पत्रारंभ :
मैं इतनी उदास और एकाकी कभी नहीं हुई। किसी का ध्यान हो जाना ध्यान माँगने लगता है। वे पल पता चलने लगते हैं—जब ध्यान ध्यान से भटकता है। सुबह शुरू होती है ध्यान से। दुपहर स्थिर होती है ध्यान से। शाम सुंदर होती है ध्यान से। रात समाप्त होती है ध्यान से। ध्यान ही बताता है—ध्यान से विचलन...
तुम इतने महसूस हो रहे हो, जितने पहले कभी नहीं हुए। तुम कभी ताप की तरह महसूस हो रहे हो, कभी तरलता की तरह, कभी व्याकुलता... पानी तक लगता है पीने में।
मेरे होंठ क्या सचमुच तुम्हारी आँखों को चूम चुके हैं?! तुम्हारी आँखों के तप्त जल से वे थोड़े जल गए हैं। वे जलकर सूख गए हैं। उन पर से हल्की खाल उतर रही है। वे तुम्हारी आँखों के स्पर्श से नए हो गए हैं और मैं भी...
मैं सारी रात जैसे तुम्हारे प्रेम के समुद्र में बहती रहती हूँ। मैं सारा दिन जैसे तुम्हारे प्रेम के अरण्य में भटकती रहती हूँ। मैं पल-प्रतिपल तुम्हें पुकारती रहती हूँ...
मैंने कल रात स्वप्न में देखा कि मैं तुम्हारे बिछौने के बिल्कुल बग़ल में बैठी हुई हूँ। तुम मेरी तरफ़ करवट लेकर सो रहे हो, मैं तुम्हें देख रही हूँ—तुम्हारे पूरे चेहरे को, तुम्हारी बंद आँखों को, तुम्हारे गालों को, तुम्हारे होंठों को... फिर नींद खुल गई... मेरी आँखें भीगी हुई थीं। मेरे आस-पास भय और प्यास-सा कुछ था। मैंने पानी पीने की कोशिश की, पर मैं उसे पी नहीं सकी। रात मध्य में थी। तुमने कुछ देर पहले जागकर मुझे पुकारा था। मैं उस वक़्त स्वप्न में तुम्हारे हिलते हुए होंठों को देख रही थी। मेरी उँगलियाँ काँपती हैं—तुम पर ये सब ज़ाहिर करते हुए। मैं दिन-ब-दिन बढ़ते तुम्हारे प्यार में हूँ। मैं स्वयं शब्द हो गई हूँ—एक पूरा बयान—मोहब्बत के ब्योरों से भरा हुआ...
वह कौन है जिसने सारी दुनिया को बता दिया है कि मैं प्रेम में हूँ! मेरे लिए कवि कविताएँ रच रहे हैं, कथाकार कथाएँ, गीतकार गीत, संगीतकार संगीत; चित्रकार चित्र और फ़िल्मकार फ़िल्में बना रहे हैं—मेरे लिए—उनमें विशेष दृश्य हैं। यह वसंत, यह बयार, यह सरसों... सब मेरे लिए....
मेरे हाथ भर रात तुम्हें खोजते रहते हैं। मन कहता है—तुम मुझसे लिपटे हुए हो। तन कहता है—दूर हो। मैं मन से तुम्हें खोलती रहती हूँ। मैं तुम्हारे बहुत पास आती रहती हूँ। मैं रात भर तुम्हें भरपूर प्यार करती हूँ। मेरी बंद आँखें तुम्हें भर रात देखती हैं। उनमें नींद नहीं, स्वप्न नहीं; बस तुम हो। रातें सुंदर हैं अब। रातें इतनी सुंदर हैं अब कि दूरी दूरी नहीं है। रातें...
ऐसे भी प्यार होता है और इतना सुख देता है, इतनी सुंदरता उतार लाता है जीवन में; यों कभी सोचा नहीं था! तुम प्यार ही प्यार हो और मैं तुममें डूब चुकी हूँ। मुझे कोई किनारा नहीं चाहिए। मुझे बहा ले जाओ अपने साथ। तुम्हारा जल ही मेरी यात्रा है, मेरा सब कुछ, मेरा जीवन है...
एक प्रवाह जीवन में यों भी आएगा, कभी सोचा नहीं था! बाहर से भीतर आए हो तुम, मेरे सागर; मुझसे बाहर मत जाना, जाना तो मुझे भी लेते जाना... मुझे नींद नहीं आ रही। लेकिन मुझे तुम्हें सोते हुए सोचना सुंदर लग रहा है।
मुझे यह रोज़गार दे दो कि रोज़ रात तुम्हें सोते हुए देख सकूँ। तुम जब सोने के लिए बिस्तर पर आओगे... मैं तुम्हें सुलाने के लिए आऊँगी। तुम मुझे पास बुलाओगे। मैं पास आऊँगी। तुम और पास चाहोगे मुझे। मैं और पास आऊँगी। तुम मेरे वक्ष पर अपना सिर रख दोगे। मैं तुम्हारे बाल चूम लूँगी। तुम मुझे अपने में और कसते जाओगे। मेरी साँसें तुम्हारी साँसों में समाने लगेंगी। मैं कहूँगी कि मुझे छोड़ दो और तुम्हें और कसती जाऊँगी अपने में। तुम्हारे हाथ मुझे देखकर आवारा हो जाएँगे। तुम मुझसे पूछोगे कि तुम्हारी आँखें चूम लूँ। मैं हाँ कहूँगी। तुम मुझसे दिशा पूछोगे। मैं तुम्हें संकेत दूँगी। तुम मेरी आँखों पर अपने होंठ रख दोगे। मैं अपने चुम्बनों से तुम्हारे दोनों गाल भर दूँगी। तुम मुझसे पूछोगे कि तुम्हारे होंठ चूम लूँ। मैं चुप रहूँगी। तुम मेरा गला चूमोगे। तुम मेरे गले की सारी शिराएँ चूमोगे। मुझे नींद आ जाएगी। तुम मुझे देखोगे—भर रात... सारी रात... सुप्रभात होने तक...
पीताभ पन्नों पर कहीं लाल, कहीं हरी, कहीं नीली स्याही से रचे गए इस ख़त में शब्दातीत भी बहुत कुछ था; लेकिन उसे समझने वाली संवेदनाएँ उन दिनों कानपुर के उन परिवारों में नहीं पाई जाती थीं, जिनमें बहनें बड़ी हो रही थीं।
मेरी माँ द्वारा ज़ब्त किए गए पार्सल में ऊपर उद्धृत पत्र के साथ एक ऑडियो-कैसेट भी था, जिसकी साइड-ए में पाँच गाने थे और साइड-बी में छह... यों ग्यारह गीतों की एक प्लेलिस्ट थी, जिसे बहन ने अपने हाथों से तैयार किया था। वह अपने मन के गाने ऑडियो-कैसेट में भरवाने या कहें रिकॉर्ड करवाने का दौर था। इसके लिए एक पन्ने पर गाने की पहली लाइन और फ़िल्म का नाम एक ब्लैंक ऑडियो-कैसेट के साथ म्यूजिक-सेंटर में देना होता था। उन दिनों कोतवाली के पास वाले चौराहे पर एचएमवी का एक आउटलेट हुआ करता था, [इन दिनों वहाँ जियो-स्टोर है] जिसमें सारी म्यूजिक-कंपनियों के गाने मिल जाते थे... वहीं जाकर ये प्लेलिस्ट दी गई थी :
• साइड-ए
~ क्या यही प्यार है... [रॉकी]
~ आपकी आँखों में कुछ... [घर]
~ करवटें बदलते रहे... [आप की कसम]
~ वादा करो नहीं छोड़ोगे... [आ गले लग जा]
~ आँखों में हमने... [थोड़ी-सी बेवफ़ाई]
• साइड-बी
~ हमें तुमसे प्यार कितना... [क़ुदरत]
~ मेरे प्यार की उमर हो... [वारिस]
~ आई आई आई तेरी याद आई... [रोमांस]
~ अकेले हैं तो... [क़यामत से क़यामत तक]
~ बहुत प्यार करते हैं तुमको सनम... [साजन]
~ मेरा दिल तेरे लिए धड़कता है... [आशिक़ी]
• इस प्रकार प्रेमास्पद के लिए प्रेम से लबालब एक पार्सल था, जो प्रेमास्पद तक पहुँचने से पूर्व ही बह गया। इसके बाद... इसके बाद मेरी बहन के रजिस्टर में आँसुओं के धब्बे बढ़ते गए और उनके बीच कविताएँ भी बढ़ती गईं :
कभी सोचा भी न था—
तुम मुझसे दूर भी जाओगे
दूर जाकर भी तुम मुझसे
मुझे इतना याद आओगे
यह कहना न होगा कि मेरी बहन की ये कविताएँ, मेरी बहन के आँसुओं की तरह ही व्यर्थ थीं। उसके देहांत के बाद जब उसके थोड़े-से सामान में से सब अपने-अपने काम की चीज़ें चुन रहे थे, मैंने चुपचाप उसका रजिस्टर उठा लिया था; ताकि कुछ वर्ष बाद आज यहाँ यह कह सकूँ कि मेरी बहन की ये कविताएँ, मेरी बहन के आँसुओं की तरह ही व्यर्थ थीं। लेकिन ये कविताएँ ही मुझे मेरी बहन के सिरदर्द के स्रोत तक ले गईं और इस प्रकार इन कविताओं ने एक अपरिहार्य और अनसुलझे रहस्य को सुलझाने में मेरी मदद की। यों एक वक़्त से अदृश्य पुस्तक दृश्य हुई। इस रजिस्टर को पढ़कर ही मैंने जाना कि स्त्रियाँ पलायन में आस्था नहीं रखती हैं, क्योंकि कोई भी नगर उनका अपना नहीं है। वे बस अपनी प्लेलिस्ट तैयार करती हैं, जो सब स्थानीयताओं में एक ही ढंग से बजती और पकड़ी जाती है—साइड-ए... साइड-बी... साइड... अब उसकी भी ज़रूरत नहीं रही।
•••
यहाँ प्रस्तुत कथ्य बहुत कम बदलाव के साथ ‘और’ [तरतीब : तसनीफ़ हैदर] के प्रवेशांक [सर्मा : 2025] में पूर्व-प्रकाशित हो चुका है। ‘और’ को यहाँ से हासिल कर सकते हैं : और-1
मेरी बहन की प्लेलिस्ट यहाँ सुन सकते हैं : एक प्लेलिस्ट की याद
अन्य रविवासरीय : 4.0 यहाँ पढ़ सकते हैं : ‘अब तुम भी जाने वाले हो सामान तो गया’ | एक बीस हज़ारिया बँधुए की दिल्ली-यात्रा | सुरेन्द्र मोहन पाठक के ख़िलाफ़ | साहित्य अकादेमी एक ऐसा पुरस्कार है | सेवासूक्त | पहला सीताराम सूर्यवंशी संस्कृति सम्मान | अविनाश मिश्र के ख़िलाफ़
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