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निम्स दाई! हिमाल आपको बुला रहे हैं...

Giving up is not in the blood, Sir! Not in the blood.
— Nirmal ‘Nimsdai’ Purja

30 जुलाई 2026 | दिल्ली/काराकोरम

उस दिन दिल्ली मेट्रो से दफ़्तर जाते हुए, मुझे कोई अंदाज़ा नहीं था कि इस समय निर्मल ‘निम्स दाई’ पुर्जा काराकोरम हिमाल शृंखला में ब्रॉड पीक [Broad Peak] समिट के लिए जा रहे हैं। मैं इंस्टाग्राम पर उनसे जुड़ी तस्वीरें, ख़बरें देखता-पढ़ता रहता था, लेकिन बीते लंबे वक़्त से यह सिलसिला रुका हुआ था। अभी तक मुझे, निम्स दाई को जानने वालों और बाक़ी दुनिया—किसी को नहीं मालूम था कि यह सुबह इस खेल-इतिहास में हिमाल के सबसे चहेते बेटे का आख़िरी दिन होगा।

उधर ब्रॉड पीक में उनकी गारमिन डिवाइस—जो कि समिट कर रहे लोगों की जी.पी.एस लोकेशन बताता है—ने सुबह 9 बजे उनकी लोकेशन 21,850 फ़ीट पर दिखाई, जो कुछ ही देर बाद 2000 फ़ीट नीचे आ गई। पहाड़ों में ऐसा होना सामान्य नहीं होता। अचानक ऊँचाई में यह ऐसा बदलाव बताता है कि पर्वतारोही हिमस्खलन का शिकार हो गए हैं। इस दुर्घटना का अंदाज़ा अभी तक किसी को नहीं हुआ था।

इस दरम्यान यहाँ दिल्ली मेट्रो में सफ़र करते हुए, न जाने क्यों मेरे मन में ख़याल आया कि एक सवाल का जवाब खोजा जाए। मैंने ChatGPT से पूछा : Oldest person to climb Everest and K2. मुझे जवाब मिला। मैंने Ask ChatGPT स्पेस पर अचानक ही लिखा : Nims Purja. आगे निम्स दाई से जुड़ा एक और सवाल मैंने पूछा, जिसका जवाब इस thread में आप जाकर पढ़ सकते हैं।

मैंने कभी नहीं सोचा था कि 43 साल के निम्स दाई से जुड़ी यह बात ही मेरा उनसे अंतिम संवाद बन जाएगी। जबकि मैंने मन ही मन कितना बार यह सोचा था कि कभी मैं उनका इंटरव्यू करूँगा और उनके साथ मेरी एक फ़ोटो ज़रूर होगी, जिसे इंस्टाग्राम में पोस्ट करते हुए न जाने क्या लिख लूँगा। कितनी बार ऐसी कल्पना भी की—अगर इंटरव्यू नहीं भी हुआ, तो कभी न कभी EBC ट्रैक करते हुए या किसी इवेंट में ही उनसे मुलाक़ात संभव हो जाएगी।

इंडिया टुडे से संबद्ध मीडिया संस्थान ‘दी लल्लनटॉप’ के शो ‘बैठकी’ के प्रोड्यूसर के तौर पर काम करते हुए, एक बार दी लल्लनटॉप में उनके इंटरव्यू करवाने को लेकर विचार भी किया। लेकिन हमारे संपादक को रिव्यू के लिए भेजी अंतिम सूची में मैंने निम्स दाई का नाम YouTuber Karl Rock से बदल दिया। उन नामों की भेजी गई सूची आज भी Whatsapp पर मौजूद है। काश, 30 जनवरी 2024 की उस तारीख़ में वापस जाकर मैं यह सब बदल पाता। अभी यह लिखते हुए, उस लिस्ट में छिपा निम्स दाई का नाम मुझे बार-बार बेचैन कर रहा है। 

उधर निम्स दाई और उनके साथ ब्रॉड पीक समिट कर रहे बाक़ी लोग—पुर बहादुर गुरुंग ‘युक्ता’, किली पेम्बा शेरपा ‘किलू’, नीमा शेरपा, नवांग थिंडू शेरपा, ग्यालू शेरपा, नादिरा अहमद अब्दुल्ला अल हरथी, सोहेल साखी, वांग झोंग और मैलोरी गीस हिमस्खलन की चपेट में आ गए थे और मेरे जैसे तमाम लोग इस बात से अनजान थे। दुनिया को इस अनहोनी की पहली ख़बर 30 जुलाई शाम को मिली। तब तक काराकोरम के क्षितिज में सूरज डूब चुका था। मैं इस दुर्घटना से अब भी अनभिज्ञ था।

31 जुलाई 2026 | दिल्ली/काराकोरम

31 जुलाई की दुपहर हमारे साथी जिग्नेश ने मुझे बताया कि निम्स दाई ग़ायब हैं। वह और उनकी टीम के नौ अन्य सदस्य हिमस्खलन की चपेट में आ गए हैं। निम्स की गारमिन डिवाइस में हलचल है, उम्मीद है वह सही होंगे।

मुझे यक़ीन नहीं हुआ। उनके सोशल प्लेटफ़ार्म्स पर गया तो पता चला कि वह काराकोरम में हैं और फिर उनका लिखा अंतिम पोस्ट पढ़ा :

‘दी मिशन शिफ़्ट्स. दी कम्पस होल्ड’

यह [ब्रॉड पीक समिट करना] शुरुआत से योजना का हिस्सा नहीं था। मेरी पहली योजना केवल जी-2 पर चढ़ने की थी। लेकिन पाकिस्तान रवाना होने से ठीक पहले मैंने अपने फ़तह किए गए 8,000 मीटर से ऊँचे शिखरों की सूची देखी। अचानक मुझे एहसास हुआ कि अभी मैं ब्रॉड पीक भी समिट कर लूँ, तो केवल ‘चो ओयू’ शेष रह जाएगा। और उसके बाद मैं दुनिया के सभी चौदह आठ-हज़ारी शिखरों पर दो बार सफलता हासिल करने वाला, इतिहास का पहला व्यक्ति बन जाऊँगा—वह भी बिना ऑक्सीजन के। [चढ़ाई में कृत्रिम ऑक्सीजन के प्रयोग बिना]

यह सब पहले से तय नहीं था। मेरी प्राथमिकता ‘हैट्रिक प्रोजेक्ट’ थी, क्योंकि उसके पीछे एक बड़ा उद्देश्य था। लेकिन अवसर कभी शोर मचाते हुए नहीं आते; वे धीरे से उसी के दरवाज़े पर दस्तक देते हैं, जो ख़ामोशी से अपना काम करता रहता है।

हर अभियान में मैंने एक बात हमेशा याद रखी है कि मुझे कभी किसी और से प्रतिस्पर्धा नहीं करनी। मेरी लड़ाई हमेशा से उस व्यक्ति से रही जो मैं कल था। मैंने हर दिन अपनी ही सीमाओं को थोड़ा और आगे बढ़ाने की कोशिश की। क्योंकि जिस क्षण आप दूसरों की ओर देखने लगते हैं—वे क्या कर रहे हैं, क्या कह रहे हैं, क्या हासिल कर रहे हैं—उसी क्षण आप अपनी दिशा खोने लगते हैं। आपकी मंज़िल आपकी अपनी है, पूरी दृढ़ता से उसकी रक्षा कीजिए।

जब मैंने ‘प्रोजेक्ट पॉसिबल’ के दौरान सभी चौदह आठ-हज़ारी शिखरों को बिना कृत्रिम ऑक्सीजन के पूरा किया, तब भी लोगों ने मुझ पर सवाल उठाए। अगर आपने यह नहीं देखा कि उसके पीछे की यात्रा कैसी थी, तो नेटफ़्लिक्स पर जाकर ‘14 Peaks’ देखिए। वह फ़िल्म बिना किसी बनावट के सच्चाई दिखाती है। उस अभियान के दौरान मैं उन पर्वतारोहियों के कई बचाव अभियानों में शामिल था, जिन्हें दूसरे अभियान पीछे छोड़ चुके थे। मैंने अभियान के लिए ख़ुद धन जुटाया, आगे रहकर नेतृत्व किया, रस्सियाँ ख़ुद फ़िक्स कीं, शिशापांगमा के परमिट के लिए चीन से संघर्ष किया, उसी बीच अपनी माँ के ऑपरेशन के लिए अस्पतालों के चक्कर लगाए और भी बहुत कुछ। और अब? अब जबकि मैं सभी चौदह शिखरों को दूसरी बार, बिना कृत्रिम ऑक्सीजन के पूरा करने की ओर बढ़ रहा हूँ। कुल मिलाकर मेरी यह तीसरी कोशिश हैं, शिखरों तक पहुँचने की। लोगों का शोर अब भी जारी है। लेकिन फ़र्क़ बस इतना है कि मैंने उसे सुनना बंद कर दिया है।

जो लोग अब भी संदेह करते हैं, उनके लिए इतना कहना ही काफ़ी है कि मैं सिर्फ़ 26 दिनों में [काराकोरम] सभी पाँच 8,000 मीटर से ऊँचे शिखरों पर चढ़ चुका हूँ। नेतृत्व करते हुए, दूसरों की मदद करते हुए मैंने उन लोगों के रिकॉर्ड भी तोड़े जिन्होंने ऑक्सीजन का इस्तेमाल करके मेरे पुराने रिकॉर्ड तोड़े थे। इसके प्रमाण मौजूद हैं।

ब्रॉड पीक, मैं तुमसे कुछ नहीं माँगता, बस इतनी-सी प्रार्थना है कि मुझे सुरक्षित ऊपर जाने और सुरक्षित लौट आने देना। मैं किसी भी पर्वत को कभी कम नहीं आँकता। किसी एक को भी नहीं। जिस पल मेरा पहला क़दम बेस कैंप से आगे बढ़ता है, उसी क्षण से मैं सौ प्रतिशत समर्पित रहता हूँ। ऐसा मैंने हमेशा किया है, और हमेशा करता रहूँगा।

यह अभियान उन सभी लोगों को समर्पित है, जिन्होंने मुझे यहाँ तक पहुँचाया। मेरे समर्थकों को भी और मेरे आलोचकों को भी। आप दोनों के बिना यह आग मेरे भीतर नहीं जलती। इसलिए दिल से आप सबका धन्यवाद।

मेरा उद्देश्य कभी अपनी उपलब्धियाँ हासिल करना नहीं रहा। मेरा उद्देश्य उस संभावना का प्रतीक बनना है, जो हर इंसान के भीतर मौजूद है। मैं यह दिखाना चाहता हूँ कि आपके जीवन के अपने-अपने पहाड़—वे चाहे जैसे भी हों—फ़तह किए जा सकते हैं।


1 अगस्त 2026 | दिल्ली

अगर आपका शग़ल फ़ुटबॉल है; तो लियोनेल मेसी और पेले आपके GOAT होंगे, क्रिकेट है तो सचिन तेंडुलकर और सर डॉन ब्रैडमैन को आप GOAT मानते होंगे। इसी तरह में विश्वभर के खेलों के GOAT (Greatest of All Time) खिलाड़ियों जैसे : माइकल जॉर्डन, नोवाक जोकोविच, उसेन बोल्ट, मुहम्मद अली, माइकल शूमाकर, लुईस हैमिल्टन, टाइगर वुड्स, जैक निकलॉस, माइकल फेल्प्स, मैग्नस कार्लसन, गैरी कास्पारोव, मेजर ध्यानचंद या इन्हीं जैसे महान् एथलीट्स की सूची के एक या कई नाम आपको ज़रूर मालूम होंगे।

यह वो खिलाड़ी हैं जिन्होंने अपने खेल को हर चीज़ से पहले रखा। कुछ ऐसे भी हुए जिन्होंने खेल से अपने देश और समाज की रुढ़ि को बदल दिया। इन सभी खिलाड़ियों ने अपने खेल से लोगों में बार-बार यह भरोसा पैदा कि सिर्फ़ खेल ही नहीं, जीवन में भी हम क्या-कुछ नहीं हासिल कर सकते हैं। 

इस अमर सूची में निर्मल ‘निम्स दाई’ पुर्जा का स्थान भी बाक़ी सभी दिग्गजों के बराबर है। निम्स दाई—Mountain sport or Alpine sport के GOAT (Greatest of All Time) हैं। निम्स दाई मॉर्डन माउंटेन स्पोर्ट्स इतिहास का वह हीरो है, जिसने इसके इतिहास को दुबारा लिखे जाने के लिए मज़बूर किया। उन्होंने पर्वतारोहण के इतिहास में ऐसे काम किए, जिन्हें पहले लगभग असंभव माना जाता रहा है।

"On belay"

शायद आप जानते हों कि दुनिया में अभी 14 Eight-thousander [आठ हज़ारी] हिमाल हैं। उनके नाम सगरमाथा, के-2, कंचनजंघा, ल्होत्से, मकालू, चो ओयू, धौलागिरि प्रथम, मनास्लु, नंगा पर्वत, अन्नपूर्णा-1, जी-1 [हिडन पीक], ब्रॉड पीक, जी-2 और शिशापांगमा हैं। इस आठ हज़ार के एलिवेशन की सीमा को छूकर आगे और ऊँचाई पर बढ़ना—मौत के साथ लुका-छिपी खेलना है। 8k Elevation पर कुछ देर ठहरने को तो आप भूल ही जाइए, इस स्थिति में किसी के लिए साँस लेना भी ऐसा है, जैसे किसी बहुमंजिला इमारत की सीढियों से दौड़कर आख़िरी मंजिल पर पहुँचे शख़्स का साँस लेना। इस ऊँचाई पर आप रुक नहीं सकते। हर तरफ़ चट्टानों जैसी बर्फ़, एक-तिहाई ऑक्सीजन पर चल रहा आपका शरीर ऐसी जगह पर आपका साथ देना छोड़ने लगता है। पेट खाना पचा नहीं पाता, दिमाग़ और शरीर शांत नहीं हो पाते, जिससे नींद आना लगभग असंभव होता है।

ज़िंदगी को मौत की गहराइयों में धकेल देने वाले ये चैलेंजेस भी क्यों कुछ इंसानों का हौसला नहीं डिगा पाते! जहाँ सफलता और लौटने की कोई गारंटी नहीं और जहाँ हार का मतलब मौत है—भला कोई ऐसी जगह जाना ही क्यों चाहता है? शायद स्वयं की सीमाओं, भय और कमज़ोरियों को चुनौती देने के लिए। शायद उस अनजाने से मिलने के लिए, जिससे मिलते हुए इंसानी सभ्यता यहाँ तक पहुँची है। शायद आज़ादी का ख़याल ऐसा ही होता हो।

ख़ैर, इन सभी आठ हज़ारी हिमाल के शिखरों तक पहुँचना भी इंसानी हौसले की एक ख़ूबसूरत कहानी है, जो सुनने वालों को हमेशा आकर्षित करती है। Age of Enlightenment और बाद में Romanticism के दौरान यूरोप में हिमाल शिखरों को लेकर लोगों का दृष्टिकोण बदला। पहले उन्हें डर से देखा जाता था। वे सदियों तक वीरानी के प्रतीक के रूप में देखे गए। Mount Blanc पर 1786 की पहली सफल चढ़ाई वह रास्ता बनी, जिससे होकर आधुनिक पर्वतारोहियों ने नए पहाड़ों को फ़तह किया। लगभग 5000 मीटर की ऊँचाई से शुरु हुआ यह रास्ता, 170 साल बाद 1950 में आठ-हज़ारी शिखरों तक पहुँचा, जब अन्नपूर्णा के शिखर तक मनुष्य पहुँचे। 1964 तक आते-आते सभी चौदह आठ-हज़ारी शिखरों तक मनुष्यों ने चहलक़दमी कर दी थी। इसमें 29 मई 1953 को दुनिया के सबसे ऊँचे शिखर सगरमाथा को भी इंसानी हौसले का साक्षी होना पड़ा। इस 240 साल के इतिहास में रेनहोल्ड मेसनर वह पहले शख़्स हुए, जिन्होंने सोलह साल के समय में, सभी चौदह आठ-हज़ारी शिखरों तक ख़ुद को पहुँचाया। इन सबमें अनगिनत दुर्घटनाएँ हुईं, कुछ पर्वतारोहियों ने सफलता देखी और कुछ ने उसका विलोम देखा और वे वहीं दफ़्न रहे।

इधर निम्स दाई ने दो सौ सालों के आधुनिक पर्वतारोहण इतिहास को मानो सिर्फ़ चौदह सालों में ही जी लिया है। जिसे करने में लोगों को सालों-साल रुकना पड़ा, उसको निम्स दाई सिर्फ़ एक दशक में आकर जी गए। वह वर्ष 2012 था, जब पहली बार उन्होंने हिमालय पर क़दम रखा और अपना पहला समिट किया। वह दोबारा लौटे और 18 मई 2014 को केवल 15 दिनों की यात्रा के दौरान धौलागिरि (8,167 मीटर) पर चढ़कर, अपना पहला आठ-हज़ारी शिखर फतह किया। 13 मई 2016 को उन्होंने अपना दूसरा आठ-हज़ारी सगरमाथा भी फ़तह कर लिया।

2019 में Project Possible के तहत उन्होंने 14 आठ-हज़ारी पर्वतों पर 6 महीने 6 दिन में चढ़ाई की। इसका पिछला रिकॉर्ड Kim Chang-ho के नाम था, जिन्होंने यह काम लगभग 7 वर्ष 10 महीने में किया था। फ़िलहाल निम्स दाई का बनाया रिकॉर्ड भी तोड़ा गया—क्रिस्टिन हरिली और तेनजेन लामा शेरपा के द्वारा लगभग 3 महीने [92 दिनों] में।

2024 में निम्स दाई बिना कृत्रिम ऑक्सीजन के सभी चौदह आठ-हज़ारी पर्वतों पर सबसे तेज़ गति से चढ़ने वाले पर्वतारोही बने। इसमें उन्होंने 2 वर्ष 5 महीने लगाया। इस बार वह यही काम दोहरा रहे थे।

निम्स दाई कृत्रिम ऑक्सीजन के साथ और उसके बिना—दोनों तरह से चौदह आठ-हज़ारी पर्वतों को फ़तह करने वाले पहले व्यक्ति हैं।

पर्वतारोहियों के बीच K2 को किलर मांउटेन कहा जाता है। 2021 से पहले इतिहास में आज तक K2 को विंटर सीजन में फ़तह नहीं किया गया। निम्स ने इतिहास की इस अधूरी पंक्ति को भी भर डाला। जनवरी 2021 में उन्होंने नेपाली समिट टीम का नेतृत्व किया, जो पहली बार सर्दियों में K2 के शिखर तक पहुँची। जहाँ पूरी टीम ने नेपाल का राष्ट्रगान गाया, जो एक ऐतिहासिक क्षण बन गया। 

ऐसी और भी कितनी ही उपलब्धियाँ हैं, जो निम्स दाई के नाम रही। लेकिन इस सब के इतर, निम्स दाई और उनकी टीम ने कई बार ऊँचाई पर फँसे पर्वतारोहियों के बचाव के लिए, अपने अभियान रोके और ख़ुद को भी जोख़िम में डाला। वहीं निम्स दाई ने 2019 में एवरेस्ट की भीड़ को दिखाने वाली उनकी वायरल तस्वीर से दुनिया को यह भी बताया कि बाज़ार मुनाफ़ा कमाने के लिए किस हद तक जाता है और झूठा दिलासा देते हुए उनके भीतर हिमाल शिखरों तक पहुँचने की उम्मीद भरता है। जबकि यह काम बिल्कुल आसान नहीं, एसी कमरों की ठंडक आपको आराम देती है, लेकिन पहाड़ों की ठंडक आपको जमा देती है, शिथिल कर देती है। पहाड़ों में झूठी उम्मीद केवल बोझ से ज़्यादा कुछ नहीं होती, जिसका शिकार कोई दूसरा होता है।

निम्स दाई आपने वह सब कुछ किया, जो शायद आने वाले समय में कोई दोहरा न पाए। आपने बार-बार इस विश्वास को बल दिया कि इंसान क्या-क्या कर सकता है। वह बात कि ‘Getting to the top is optional. Getting down is mandatory.’ आपने इस बात को नए मायने दे दिए। आपने जब कहा, “Sometimes when you feel like you are fucked, you are only about 45% fucked.”, हमने समझा कि हमें अपने दिमाग़ के डर को सच नहीं समझना है, अभी तो बहुत ताक़त बची है। आपकी बात “Impossible is not a fact. It’s an opinion.” को हमने समझा कि हमें उनकी बातों में नहीं आना है और जब यह कहा, “Giving up is not in the blood, Sir.”, तो हमने जाना कि यह नहीं भूलना है कि हम कौन हैं।

शुक्रिया निम्स दाई! हिमाल आपको बुला रहे हैं, अब आपको जाना होगा...

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