कृष्ण पर अड़िल्ल

चली जाति है आयु, जगत-जंजाल में।

कहत टेरिकैं घरी-घरी, घरियाल में॥

समै चूकिकैं काम, फिरि पछताइए।

ब्रज-नागर नँदलाल सु, निसिदिन गाइए॥

नागरीदास

स्याम सुबेद कौ सार है।

आशिक-तिलक, इश्क-करतार है॥

आनंद-कंद तीन गुनतें परें।

प्रीति-प्रतीति रसिक तासों करें॥

सहचरिशरण

नंद-जसोदा, को रति, श्रीवृषभानु हैं।

इनतें बड़ो कोउ, जग में आन हैं॥

गो-गोपी-गोपादिक-पद-रज ध्याइए।

ब्रज-नागर नँदलाल सु निसिदिन गाइए॥

नागरीदास

सुत-पित-पति-तिय मोह, महादुखमूल है।

जग-मृग-तृस्ना देखि, रह्यो क्यों भूल है?

स्वपन-राज-सुख पाय, मन ललचाइए।

ब्रज-नागर नँदलाल सु, निसिदिन गाइए॥

नागरीदास

ब्रज-बृन्दावन स्याम-पियारी भूमि हैं।

तहँ फल-फूलनि-भार रहे द्रुम झूमि हैं॥

भुव दंपति-पद-अंकनि लोट लुटाइए।

ब्रज-नागर नँदलाल तू निसिदिन गाइए॥

नागरीदास

नंदीस्वर, बरसानो गोकुल गाँवरो।

बंसीबट संकेत रमत तहँ साँवरो॥

गोबर्धन राधाकुंड सु जमुना जाइए।

ब्रज-नागर नँदलाल सु निसिदिन गाइए॥

नागरीदास

अंतर कुटिल कठोर, भरे अभिमान सों।

तिन के गृह नहिं रहैं, संत सनमान सों॥

उनकी संगति भूलि, कबहूँ जाइए।

ब्रज-नागर नँदलाल सु, निसिदिन गाइए॥

नागरीदास

कृष्ण-भक्ति-परिपूरन जिनके अंग हैं।

दृगनि परम अनुराग जगमगै रंग हैं॥

उन संतन के सेवत दसधा पाइए।

ब्रज-नागर नँदलाल सु निसिदिन गाइए॥

नागरीदास

राधा-हित ब्रज तजत नहीं पल साँवरो।

नागर नित्य बिहार करत मनभावरो॥

राधा-ब्रज-मिश्रित जस रसनि रसाइए।

ब्रज-नागर नंदलाल सु निसिदिन गाइए॥

नागरीदास

संग फिरत है काल, भ्रमंत नित सीस पर॥

यह तन अति छिनभंग, धुंवें को धौं लहर॥

यातें दुरलभ साँस, वृथा गमाइए।

ब्रज-नागर नँदलाल सु, निसिदिन गाइए॥

नागरीदास

ब्रज-रस-लीला-सुनत कबहुँ अघावनो।

ब्रजभक्तन, सत-संगति प्रान पगावनो॥

‘नागरिया' ब्रजवास कृपा-फल पाइए।

ब्रज-नागर नँन्दलाल सु निसिदिन गाइए॥

नागरीदास

बँधे उलूखल लाल दमोदर हारिकैं।

बिस्व दिखायो बदन वृक्ष दिय तारिकैं॥

लीला ललित अनेक पार कित पाइए।

ब्रज-नागर नँदलाल सु निसिदिन गाइए॥

नागरीदास

मेटि महोच्छव इन्द्र कुपित कीन्हो महा।

जल बरसायो प्रलयकरन कहिए कहा॥

गिरि धरि करो सहाय सरन जिहि जाइए॥

ब्रज-नागर नन्दलाल सु निसिदिन गाइए॥

नागरीदास

कलह-कल्पना, काम-कलेस निबारनौ।

परनिंदा परद्रोह, कबहुँ बिचारनौ॥

जग-प्रपंच-चटसार, चित्त पढ़ाइए।

ब्रज-नागर नँदलाल सु, निसिदिन गाइए॥

नागरीदास

कहूँ कबहूँ चैन, जगत दुखकूप है।

हरि-भक्तन कौ संग सदा सुखरूप है॥

इनके ढिग आनंदित समैं बिताइए।

ब्रज-नागर नँदलाल सु निसिदिन गाइए॥

नागरीदास

संबंधित विषय