कहानी : नीली
पेपर ख़त्म होने के बाद मैं और मेरा दोस्त अपने हॉस्टल की ओर बढ़ रहे थे। पेपर के लिए जाते वक़्त सब कुछ अपनी व्यवस्थित स्थिति में क्रम से चल रहा था। लेकिन यह क्या, इतनी अफ़रा-तफ़री क्यों? लोग भाग-दौड़ क
फूलचंद : जो लौटकर कभी नहीं आया
वह हमारी उम्र का था, मगर हट्टा-कट्टा बालक था। मुझे आज भी याद है—उसका बोलना, उसकी चमक से भरी आँखें! जो अनायास अपनी तरफ़ खींच लेती थीं। बिना कहे सुने उसे देखा जा सकता था। न जाने क्या था उसमें! आज सोचती
कहानी : सुरमेदानी
“माँ मरी नहीं थी। वो मेरी उन तमाम प्रेमिकाओं में ज़िंदा हुई, जिनसे मैंने प्रेम किया।” जानते हो बीकानेर में उस रात की आँखें उतनी ही अंधी और आबनूसी थी, जितने कई मनुष्य सब कुछ होते हुए भी ज़िंदगी से